# कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मानवता के खात्मे का खौफ सिर्फ एक छलावा: टिमबिट गेब्रु

> प्रसिद्ध तकनीकी शोधकर्ता टिमबिट गेब्रु का तर्क है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर फैलाया जा रहा सर्वनाश का डर अरबपतियों का प्रचार तंत्र है, जो वास्तविक नुकसानों से ध्यान भटकाता है।

**Type:** article · **Category:** एआई · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/ai/ai-existential-threat-narrative-is-a-corporate-mirage-concealing-real-harms-timnit-gebru-40509 · **Language:** Hindi
**Tags:** टिमबिट गेब्रु, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, गूगल, ओपनएआई, एंथ्रोपिक, स्टोकेस्टिक पैरट्स, टेक नियमन

प्रौद्योगिकी जगत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रसार के साथ ही दो धारणाएं लगातार चर्चा के केंद्र में बनी हुई हैं, जिनमें पहली सांख्यिकीय प्रतिध्वनि यानी स्टोकेस्टिक पैरट्स और दूसरी मानवता पर मंडराता अस्तित्वगत संकट है। तकनीकी बहसों के बीच मुखर शोधकर्ता टिमबिट गेब्रु ने लंबे समय से उन दावों को चुनौती दी है जो मशीनों को सर्वशक्तिमान या मानव जाति के विनाशक के तौर पर पेश करते हैं। कुछ साल पहले गूगल में काम करते हुए उन्होंने एक संयुक्त शोध पत्र प्रस्तुत किया था, जिसमें बड़े भाषा मॉडलों के भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों और प्रशिक्षण डेटा को तोते की तरह दोहराने की प्रवृत्ति को उजागर किया गया था। उस विवाद के परिणामस्वरूप उन्हें गूगल से अलग होना पड़ा था, जिसके बाद उन्होंने निष्पक्ष तकनीकी साधन तैयार करने और तकनीक से होने वाले नुकसानों की पड़ताल के लिए एक स्वतंत्र संस्थान स्थापित किया। वे तकनीकी आदर्शवाद के सफर पर अपनी नई किताब भी ला रही हैं। हालिया महीनों में उन्होंने उस तकनीकी समूह पर कड़ा प्रहार किया है जो यह प्रचारित करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानी अस्तित्व को मिटा सकती है, जबकि उनके आलोचक उनके पुराने शोध को अप्रासंगिक बताकर खारिज करने का प्रयास कर रहे हैं।

## अस्तित्वगत संकट की अवधारणा और उसके पीछे का वित्तीय तंत्र
प्रौद्योगिकी कंपनियों में आंतरिक इस्तीफों और सार्वजनिक बयानों के जरिए बार-बार यह संदेश दिया जाता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रगति मानव जाति के लिए अस्तित्वगत खतरा बन चुकी है। एंथ्रोपिक के एक शोधकर्ता के पद छोड़ने के बाद ऐसी ही बहसें सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर तेज हो गईं। टिमबिट गेब्रु के अनुसार, इस तरह की बयानबाजी केवल एक ध्यान भटकाने वाला हथकंडा नहीं है, बल्कि समाज के लिए अत्यंत नुकसानदेह साबित हो रही है। यदि इस आख्यान के इतिहास को देखा जाए तो एलन मस्क और पीटर थिएल जैसे अरबपति निवेशक वर्ष 2013 से ही हर तीन साल के चक्र में इस तरह की चेतावनी दोहराते रहे हैं। आम लोगों को ऐसा लगता है कि कई स्वतंत्र संस्थाएं और थिंक टैंक एक साथ आकर मानवता को बचाने की अपील कर रहे हैं, परंतु इन सभी के वित्तीय तार आपस में जुड़े हुए हैं।

उदाहरण के लिए, फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट की स्थापना भौतिक विज्ञानी मैक्स टेगमार्क और स्काइप के सह-संस्थापक जान तेलिन ने की थी। जान तेलिन ने एंथ्रोपिक के शुरुआती निवेश दौर का नेतृत्व भी किया था। वही तेलिन एमईटीआर नामक उस तथाकथित स्वतंत्र लेखा परीक्षक संस्था को भी वित्तपोषित करते हैं, जिसकी एक रिपोर्ट में ओपनएआई के एजेंटों द्वारा हगिंग फेस को हैक करने की चेतावनी देकर सुर्खियां बटोरी गई थीं। इस पूरे तंत्र की हकीकत यह है कि जिन अरबपतियों ने एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों की नींव रखी और जिन्हें भविष्य में सार्वजनिक शेयर निर्गम यानी आईपीओ से सबसे भारी वित्तीय मुनाफा मिलने वाला है, वही लोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अस्तित्वगत खतरे का ढिंढोरा पीटने वाली संस्थाओं और उनकी जांच करने वाली थर्ड पार्टी एजेंसियों को पूंजी मुहैया कराते हैं।

## मशीन-ईश्वर का पाखंड और नियामकीय घेराबंदी का दांव
जब किसी तकनीकी उत्पाद से अरबों डॉलर कमाने वाले लोग ही खुद यह दावा करने लगें कि उनकी बनाई चीज पूरी दुनिया को तबाह कर सकती है, तो आम जनता को उनके असली मकसद पर सवाल उठाना चाहिए। तकनीकी उद्योग के अगुवा एक तरफ तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मानवता के खात्मे की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी सांस में यह दावा भी ठोकते हैं कि यही तकनीक जलवायु परिवर्तन को रोक सकती है, विश्व शांति ला सकती है और गरीबी का समूल नाश कर सकती है। इस प्रकार मशीन-ईश्वर का एक ऐसा काल्पनिक स्वरूप तैयार किया जाता है जो चमत्कार भी कर सकता है और कयामत भी ला सकता है।

इस अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार का पहला मकसद निवेशकों को यह समझाना है कि वे इस अभूतपूर्व शक्ति में तुरंत अपनी पूंजी झोंक दें। दूसरा मकसद सरकारों को यह कहकर डराना है कि यदि उन्होंने अपनी घरेलू कंपनियों को खुली छूट नहीं दी, तो चीन जैसा कोई विरोधी देश इस जादुई शक्ति पर कब्जा कर लेगा। तीसरा और सबसे गंभीर मकसद सरकारी नियामकों को भ्रमित करना है। जब बहस इस बात पर केंद्रित कर दी जाती है कि मशीनें पूरी धरती को नष्ट कर देंगी, तो डेटा केंद्रों से होने वाला भारी कार्बन उत्सर्जन, भीषण प्रदूषण और कलाकारों के कॉपीराइट का खुला उल्लंघन जैसी वास्तविक समस्याएं छोटी और महत्वहीन दिखाई देने लगती हैं। कंपनियां नीति निर्माताओं से कहती हैं कि वे कॉपीराइट उल्लंघन के मुकदमों या डेटा संरक्षण पर समय गंवाने के बजाय काल्पनिक प्रलय पर कानून बनाएं, ताकि मौजूदा नियमों से आसानी से बचा जा सके।

विश्व मंचों पर भी यही नाटक दोहराया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के आसपास के आयोजनों में ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई जैसे शीर्ष कार्यकारी वैश्विक सहयोग और अस्तित्वगत जोखिम की दुहाई देते नजर आए। डारियो का कहना था कि गलत प्रबंधन से यह तकनीक पूरी मानवता के लिए खतरा बन सकती है, जबकि सैम ऑल्टमैन ने दावा किया कि इंसान भविष्य का नियंत्रण खो सकता है। यह पूरा व्यवहार नियामकीय घेराबंदी का प्रत्यक्ष उदाहरण है। जब वर्ष 2023 में यूरोपीय संघ ने कड़े नियम लागू किए, तो इन्हीं कंपनियों ने वहां से अपना कारोबार समेटने की धमकियां दी थीं। जब भी वास्तविक जवाबदेही तय करने वाले नियम सामने आते हैं, तो ये समूह लॉबिंग करके उन्हें कमजोर करते हैं या पलायन की चेतावनी देते हैं, लेकिन दुनिया के सामने खुद को ऐसी महाशक्तियों का निर्माता बताते हैं जिन्हें मौजूदा कानूनों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

## पारदर्शिता, डेटा चोरी और श्रमिकों के शोषण पर अंकुश की दरकार
मौजूदा कानूनों के भीतर ही तकनीकी कंपनियों को जवाबदेह ठहराने के पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। नियामकीय अधिकारियों द्वारा भ्रामक विपणन प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, क्योंकि कंपनियां अपनी क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं। इसके अतिरिक्त डेटा की पूर्ण पारदर्शिता और अनिवार्य दस्तावेजीकरण की मांग उठाई जानी चाहिए। किसी भी तकनीकी उत्पाद को बाजार में उतारने से पहले यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि प्रशिक्षण में इस्तेमाल किया गया डेटा कहां से लिया गया। टेक कंपनियां डेटा प्रलेखन के इस साधारण नियम का भी कड़ा विरोध करती हैं क्योंकि उनका समूचा ढांचा बिना अनुमति लिए गए डेटा पर टिका है।

इसके अलावा डेटा क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों का शोषण एक अत्यंत कड़वी हकीकत है जिसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। जब कॉर्पोरेट जगत सुपरइंटेलिजेंस की हवाई बातें करता है, तब वास्तव में दुनिया भर में करोड़ों कम वेतन पाने वाले कर्मचारी दिन-रात बैठकर डेटा लेबल करने और चैटबॉट्स के पीछे मानवीय ऑपरेटर बनकर जवाब देने का श्रम करते हैं। हाल ही में मेटा के म्यूज चैटबॉट को लेकर यह बात सामने आई कि कई उपयोगों में स्क्रीन के पीछे वास्तव में इंसान ही जवाब टाइप कर रहे थे। यदि इन कंपनियों को कॉपीराइट सामग्री चुराने से रोक दिया जाए, डेटा का पारदर्शी हिसाब देने को बाध्य किया जाए और श्रमिकों के शोषण पर पाबंदी लगा दी जाए, तो इनका मौजूदा वित्तीय मॉडल ढह जाएगा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अनियंत्रित दौड़ अपने आप धीमी होकर वास्तविक नियंत्रण में आ जाएगी।

## स्टोकेस्टिक पैरट्स की अवधारणा और आधुनिक भाषा मॉडलों की सीमाएं
वर्ष 2021 में प्रकाशित 'ऑन द डेंजर्स ऑफ स्टोकेस्टिक पैरट्स' शोध पत्र में यह विस्तार से समझाया गया था कि बड़े भाषा मॉडल किस प्रकार काम करते हैं। इंटरनेट के अथाह पाठ्य डेटा पर प्रशिक्षित किए गए ये मॉडल केवल इस सांख्यिकीय संभावना की गणना करते हैं कि किसी दिए गए वाक्य के बाद अगला शब्द या अक्षर कौन सा आने की सबसे अधिक उम्मीद है। क्लॉड या चैटजीपीटी जैसे आधुनिक चैटबॉट इसी आधारभूत संरचना पर चलते हैं। जब यह शोध लिखा गया था, तब चैटजीपीटी आम जनता के लिए जारी नहीं हुआ था, परंतु बड़े से बड़े मॉडल बनाने की अंधी होड़ शुरू हो चुकी थी। ओपनएआई ने तब जीपीटी-2 को यह कहकर रोकने का प्रयास किया था कि यह तकनीक जारी करने के लिहाज से बहुत खतरनाक है।

स्टोकेस्टिक पैरट का सीधा अर्थ है बिना समझे केवल दोहराने की क्रिया। जब कोई प्रणाली व्याकरण की दृष्टि से एकदम सटीक और धाराप्रवाह वाक्य उत्पन्न करती है, तो इंसानों में यह भ्रम पैदा होता है कि उस मशीन के पीछे कोई सचेत मस्तिष्क सोच रहा है। शोध पत्र में एक उदाहरण दिया गया था जहां एक फिलिस्तीनी व्यक्ति के अरबी में लिखे 'शुभ प्रभात' संदेश का अनुवाद एल्गोरिदम ने 'उन पर हमला करो' के रूप में कर दिया था। चूंकि वाक्य विन्यास सही था, इसलिए किसी ने उस भयानक गलती पर तुरंत संदेह नहीं किया। जब लोग स्वचालित प्रणालियों पर अंधविश्वास करने लगते हैं, तो वे उनकी गंभीर गलतियों को भी सच मान लेते हैं।

एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक जैक क्लार्क ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि स्टोकेस्टिक पैरट का विचार एक वैचारिक वायरस था जिसने शोधकर्ताओं को भटका दिया और इसके कारण आधुनिक मॉडलों की क्षमताओं को कम करके आंका गया। हालांकि, यह तर्क पूरी तरह बेबुनियाद है क्योंकि भाषा मॉडलों की मौलिक परिभाषा कभी नहीं बदली है। भले ही मॉडलों के ऊपर रीइन्फोर्समेंट लर्निंग या स्वायत्त एजेंटों के आवरण चढ़ा दिए जाएं, उनका आंतरिक ढांचा वही सांख्यिकीय पैटर्न मिलान ही रहता है। जब लोग इन टूल्स पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं, तो मेडिकल जांच में स्तन कैंसर का गलत पक्ष दर्ज करने जैसी जानलेवा गलतियां सामने आती हैं। भाषा मॉडल शब्दों का अर्थ नहीं समझते, इसलिए उनसे तथ्यात्मक सटीकता की गारंटी नहीं मिल सकती। गूगल के एआई ओवरव्यू में भी कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं को लेकर गलत निर्देश दिखने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं, जिसे भाषाविद् एमिली एम बेंडर भी वर्षों से रेखांकित करती रही हैं।

## तर्क क्षमता का अभाव और शोध की वास्तविक कसौटी
उद्योग जगत में रिकर्सिव इंटेलिजेंस और मशीनों के खुद से सोचने के जो बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वे तकनीकी रूप से भ्रामक नामकरण से अधिक कुछ नहीं हैं। मशीन लर्निंग जैसे शब्द केवल एक आकांक्षा को दर्शाते हैं, मशीन की वास्तविक चेतना को नहीं। एप्पल में मशीन लर्निंग रिसर्च के प्रमुख सामी बेंगियो और उनकी टीम द्वारा किए गए विस्तृत शोध बताते हैं कि जब तथाकथित तार्किक परीक्षणों यानी बेंचमार्क में मामूली सा बदलाव किया जाता है, तो इन मॉडलों की समूची तर्क क्षमता ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है।

कंपनियां जब किसी मॉडल द्वारा क्रमिक टोकन प्रिंट करने की प्रक्रिया को चेन-ऑफ-थॉट रीजनिंग का फैंसी नाम दे देती हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि मशीन वास्तव में विचार कर रही है। वह केवल प्रशिक्षित पैटर्न के अनुसार अगले शब्द उगल रही होती है। मौजूदा समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि स्वतंत्र शोधकर्ताओं को मॉडलों के प्रशिक्षण डेटा, कोड और मूल्यांकन तंत्र तक कोई पहुंच नहीं दी जाती। जब कंपनियां अपने मॉडलों को उसी डेटा पर प्रशिक्षित करती हैं जिस पर उनका परीक्षण होना है, तो यह परीक्षा से पहले उत्तर रट लेने जैसा होता है। वैज्ञानिक प्रामाणिकता केवल कंपनियों की प्रेस विज्ञप्तियों या नेताओं द्वारा उनकी नकल करने से तय नहीं हो सकती, बल्कि उसके लिए संपूर्ण डेटा और कार्यप्रणाली का पारदर्शी ऑडिट जरूरी है। वास्तविक सोच, समझ और तर्क केवल मानवीय चेतना का हिस्सा हैं, मशीनों का नहीं।

## सामूहिक प्रतिरोध और वैकल्पिक तकनीकी भविष्य की उम्मीद
तकनीकी उद्योग के दिग्गजों की रोजमर्रा की भ्रामक बहसों और दावों का खंडन करते रहना मानसिक रूप से थका देने वाला काम बन जाता है। इससे कहीं अधिक सार्थक यह है कि उन वैकल्पिक तकनीकों के निर्माण पर ध्यान लगाया जाए जो वास्तव में समाज के लिए उपयोगी हों। इसी सोच के तहत तैयार की गई एआई रेसिस्ट लिस्ट उन लोगों और पहलों को संकलित करती है जो कॉरपोरेट नैरेटिव, डेटा केंद्रों की मनमानी, पर्यावरण विनाश और श्रम शोषण के खिलाफ डटकर खड़े हैं।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में छोटे समूह और गैर-सरकारी संगठन ऐसे स्थानीय साधन विकसित कर रहे हैं जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते, डेटा की चोरी नहीं करते और अपने समुदायों की वास्तविक मदद करते हैं। वास्तविक उम्मीद मानवीय संकल्प और सामूहिक शक्ति में है, जिसके बल पर हानिकारक प्रणालियों पर रोक लगाई जा सकती है और समाज के लिए एक न्यायसंगत तकनीकी भविष्य की रूपरेखा तैयार की जा सकती है।

## इसका आप पर असर
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर फैलाए जा रहे काल्पनिक खतरों के शोर के बीच आम उपभोक्ताओं और कामगारों पर वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पड़ रहे हैं।

- **तकनीकी विश्वसनीयता:** स्वास्थ्य और कानूनी सलाह के लिए चैटबॉट्स पर अत्यधिक निर्भरता जानलेवा साबित हो सकती है। उपयोगकर्ताओं को स्वचालित प्रणालियों से प्राप्त जानकारी को बिना मानवीय पुष्टि के कभी अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए।
- **गोपनीयता और डेटा सुरक्षा:** टेक कंपनियां बिना पूर्व सूचना या सहमति के आम लोगों के डिजिटल डेटा का दोहन कर रही हैं। अपनी व्यक्तिगत जानकारी को ऑनलाइन साझा करते समय अत्यधिक सावधानी बरतने की सख्त जरूरत है।
- **श्रम और रोजगार:** डेटा लेबलिंग और आउटसोर्सिंग के नाम पर कामगारों का आर्थिक शोषण लगातार बढ़ रहा है। श्रमिकों को उचित मजदूरी और सुरक्षित कार्य परिस्थितियों के लिए संगठित होने की आवश्यकता है।
- **पर्यावरणीय लागत:** विशाल डेटा केंद्रों के निर्माण से स्थानीय बिजली और जल संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। आम नागरिकों को पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा नीतियों और पारदर्शी बुनियादी ढांचे की मांग करनी चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता उद्योग के अरबपति और शीर्ष अधिकारी अस्तित्वगत खतरे का आख्यान इसलिए गढ़ रहे हैं ताकि वे वित्तीय लाभ कमा सकें और मौजूदा कानूनों से बच सकें।

- **वित्तीय प्रोत्साहन:** तकनीकी कंपनियों के निवेशक और संस्थापक अपने आगामी शेयर निर्गम यानी आईपीओ के मूल्यांकन को कई गुना बढ़ाना चाहते हैं। असीम शक्ति का भ्रम पैदा करके वे वेंचर कैपिटल और सरकारी खजाने से भारी निवेश आकर्षित करते हैं।
- **नियामकीय घेराबंदी:** काल्पनिक प्रलय की बहस छेड़कर कंपनियां कॉपीराइट चोरी और डेटा गोपनीयता के मौजूदा कानूनों को निष्प्रभावी बनाना चाहती हैं। वे नीति निर्माताओं को भविष्य के काल्पनिक खतरों में उलझाकर वर्तमान जवाबदेही से बच निकलती हैं।
- **प्रतिस्पर्धा पर अंकुश:** वैश्विक खतरे का हौव्वा खड़ा करके स्थापित टेक कंपनियां ओपन-सोर्स मॉडलों और विदेशी प्रतिस्पर्धियों पर सख्त प्रतिबंध लगाने का दबाव बनाती हैं। इससे बाजार में उनका एकाधिकार सुरक्षित रहता है और स्वतंत्र नवाचार बाधित होता है।
- **संरचनात्मक सीमाएं:** भाषा मॉडल केवल सांख्यिकीय संभावनाओं पर आधारित होते हैं और उनमें सोचने या तर्क करने की कोई क्षमता नहीं होती। अपनी तकनीकी सीमाओं और लगातार हो रही तथ्यात्मक गलतियों को छिपाने के लिए वे खुद को भविष्य की महाशक्ति के रूप में पेश करते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. टिमबिट गेब्रु कौन हैं और वे क्यों चर्चा में रही हैं?
टिमबिट गेब्रु एक प्रमुख एआई शोधकर्ता हैं जिन्होंने गूगल में भाषा मॉडलों के पूर्वाग्रहों को उजागर किया था। गूगल छोड़ने के बाद उन्होंने निष्पक्ष तकनीक के विकास और तकनीकी नुकसानों की जांच के लिए स्वतंत्र संस्थान की स्थापना की।

### 2. स्टोकेस्टिक पैरट्स का क्या अर्थ है?
यह बड़े भाषा मॉडलों के लिए इस्तेमाल किया गया रूपक है, जिसका अर्थ है कि मॉडल बिना किसी वास्तविक समझ के केवल अपने प्रशिक्षण डेटा के भाषाई पैटर्न को सांख्यिकीय आधार पर दोहराते हैं।

### 3. गेब्रु एआई से जुड़े अस्तित्वगत खतरे के विमर्श को खतरनाक क्यों मानती हैं?
उनका मानना है कि यह आख्यान अरबपति निवेशकों द्वारा गढ़ा गया है ताकि वे कॉपीराइट उल्लंघन, डेटा चोरी, श्रम शोषण और पर्यावरणीय नुकसान जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका सकें।

### 4. क्या आधुनिक एआई मॉडलों में सोचने या तर्क करने की वास्तविक क्षमता है?
शोध के अनुसार एआई मॉडलों में वास्तविक सोच या तर्क क्षमता नहीं होती। मामूली परीक्षण बदलाव पर उनके नतीजे बिखर जाते हैं, जिससे साबित होता है कि वे केवल रटे हुए पैटर्न प्रस्तुत करते हैं।

### 5. तकनीक कंपनियों को जवाबदेह बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
कंपनियों पर भ्रामक प्रचार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, पूर्ण डेटा पारदर्शिता, अनिवार्य प्रलेखन और डेटा श्रमिकों के शोषण पर रोक लगाने जैसे बुनियादी नियम लागू किए जाने चाहिए।

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