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  "type": "article",
  "title": "डीपफेक वीडियो और ऑडियो पर सरकार का बड़ा प्रहार, सोशल मीडिया कंपनियों को 3 घंटे में हटाना होगा फर्जी कंटेंट",
  "summary": "केंद्र सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनने वाले डीपफेक कंटेंट पर रोक लगाने के लिए कड़े नियम लागू कर दिए हैं। अब अदालती या सरकारी आदेश मिलते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी डीपफेक सामग्री 3 घंटे के भीतर हटानी होगी।",
  "content": "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक की आड़ में फैल रहे फर्जी ऑडियो, वीडियो और तस्वीरों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए गए हैं। केंद्र सरकार ने एआई द्वारा निर्मित आपत्तिजनक और भ्रामक डीपफेक सामग्री के प्रसार पर लगाम लगाने के मकसद से नए आईटी दिशानिर्देश प्रभावी कर दिए हैं। नए प्रावधानों के तहत अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया गया है, ताकि डिजिटल स्पेस में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।\n\nसामग्री हटाने के समय में 12 गुना की कटौती\nनए नियमों के लागू होने के बाद अब इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी डीपफेक कंटेंट के खिलाफ बेहद तेज कार्रवाई करनी होगी। सरकार या अदालत द्वारा किसी भी अवैध एआई जनरेटेड वीडियो, ऑडियो या टेक्स्ट सामग्री को हटाने का आदेश दिए जाने पर कंपनियों को उसे केवल 3 घंटे की समयसीमा के भीतर अपने प्लेटफॉर्म से हटाना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे पहले कंपनियों को ऐसी सामग्री हटाने के लिए 36 घंटे की मोहलत दी जाती थी। इस तरह कंपनियों को अब 12 गुना तेजी से काम करना पड़ेगा।\n\nन्यूडिटी और प्रतिरूपण पर 2 घंटे में कार्रवाई अनिवार्य\nअत्यंत संवेदनशील सामग्री के मामलों में नियम और भी अधिक कठोर बनाए गए हैं। यदि कोई डीपफेक कंटेंट किसी व्यक्ति की नग्नता, अश्लीलता या उसकी पहचान चुराकर बनाए गए फर्जी रूप यानी प्रतिरूपण से जुड़ा है, तो प्लेटफॉर्म्स को निर्देश मिलने के महज 2 घंटे के भीतर उसे इंटरनेट से गायब करना होगा। पुराने नियमों में इस प्रकार की संवेदनशील सामग्री को हटाने के लिए 24 घंटे की समयसीमा तय की गई थी। इस कदम से डिजिटल क्षेत्र में महिलाओं और आम नागरिकों की निजता को त्वरित सुरक्षा मिल सकेगी।\n\nऑटोमेटेड तकनीक, लेबलिंग और मेटाडेटा ट्रेसेबिलिटी\nकेवल शिकायत का इंतजार करने के बजाय अब सोशल मीडिया कंपनियों को एआई कंटेंट की पहचान के लिए खुद भी तकनीकी इंतजाम करने होंगे। सरकारी निर्देशों के अनुसार प्लेटफॉर्म्स को अपने सिस्टम पर ऑटोमेटेड टेक्नोलॉजी उपकरण लागू करने होंगे, जो एआई डीपफेक अपलोड होते ही उसकी पहचान कर लें और उसे फैलने से रोक दें। इसके साथ ही, एआई जनरेटेड सभी प्रकार के टेक्स्ट, ऑडियो और वीडियो के लिए स्पष्ट लेबलिंग और ट्रेसेबल मेटाडेटा को अनिवार्य बना दिया गया है। बिना स्पष्ट एआई लेबल के किसी भी एआई निर्मित सामग्री को अपलोड करने की अनुमति नहीं होगी।\n\nआईटी एक्ट की धारा 79 और सेफ हार्बर सुरक्षा का खात्मा\nइन कड़े नियमों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कानूनी सुरक्षा से जुड़ा है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को अब तक सेफ हार्बर का कानूनी संरक्षण प्राप्त था। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्लेटफॉर्म्स को केवल एक मध्यस्थ माना जाता था और उपयोगकर्ता द्वारा पब्लिश की गई किसी भी गैरकानूनी सामग्री के लिए सीधे तौर पर प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता था, बल्कि सारा कानूनी मामला कंटेंट पोस्ट करने वाले यूजर पर चलता था।\n\nहालांकि, नए नियमों के अनुसार यदि कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तय समयसीमा के भीतर डीपफेक या आपत्तिजनक सामग्री हटाने में विफल रहता है या लापरवाही बरतता है, तो उसका सेफ हार्बर संरक्षण तत्काल प्रभाव से खत्म कर दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया कंपनी को भी अपराध में भागीदार माना जाएगा और उसके खिलाफ आईटी एक्ट के तहत सीधे आपराधिक व कानूनी कार्रवाई की जाएगी।\n\nवैश्विक स्तर पर डीपफेक के खिलाफ सख्त रुख\nएआई के जरिए फर्जी तस्वीरें और आवाजें तैयार कर लोगों को ठगने और बदनाम करने की घटनाएं केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में एक गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। भारत से पहले यूरोप में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सुरक्षित और नियंत्रित इस्तेमाल को लेकर अत्यंत सख्त कानून और नियम लागू किए जा चुके हैं। भारत सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर फैलती भ्रामक जानकारी को रोकना और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह बाध्य करना है।\n\nइसका आप पर असर\nपाठकों पर प्रभाव:\n\n• भारत में: यदि आपके या किसी अन्य नागरिक के नाम पर कोई फर्जी एआई वीडियो या फोटो इंटरनेट पर पोस्ट किया जाता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अब महज 2 से 3 घंटे के भीतर उसे हटाना होगा।\n• उपयोगकर्ताओं के लिए: बिना स्पष्ट एआई लेबल या वॉटरमार्क के फर्जी एआई कंटेंट अपलोड करना या फैलाना अब कानूनी रूप से दंडनीय अपराध के दायरे में आ सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डीपफेक कंटेंट हटाने के लिए नए नियमों में क्या समयसीमा तय की गई है?\nसरकारी या अदालती आदेश पर गैरकानूनी डीपफेक सामग्री को 3 घंटे में हटाना होगा, जबकि न्यूडिटी या प्रतिरूपण से जुड़े संवेदनशील मामलों में इसे 2 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य है।\n\n2. आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत 'सेफ हार्बर' क्या है?\nसेफ हार्बर एक कानूनी सुरक्षा है जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को केवल मध्यस्थ माना जाता है और उपयोगकर्ता द्वारा पोस्ट की गई गलत सामग्री के लिए कंपनी सीधे जिम्मेदार नहीं होती।\n\n3. नियमों का पालन न करने पर सोशल मीडिया कंपनियों का क्या होगा?\nयदि कंपनियां निर्धारित समयसीमा में कंटेंट नहीं हटाती हैं, तो उनका सेफ हार्बर संरक्षण खत्म हो जाएगा और उन पर सीधे कानूनी मुकदमा चलाया जा सकेगा।\n\n4. क्या एआई जनरेटेड कंटेंट के लिए लेबल लगाना अनिवार्य है?\nहां, सभी एआई निर्मित ऑडियो, वीडियो और टेक्स्ट सामग्री पर स्पष्ट लेबलिंग और ट्रेसेबल मेटाडेटा होना अनिवार्य कर दिया गया है।",
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  "category": "एआई",
  "publishedAt": "2026-08-06",
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    "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस",
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