लैब के परीक्षणों को छोड़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से नई दवाएं खोज रही है पोटेंशियल साइंसेज पोटेंशियल साइंसेज नामक एक नया स्टार्टअप भौतिकी के सिद्धांतों का उपयोग करके बड़े पैमाने पर रासायनिक डेटासेट तैयार कर रहा है, जिससे महंगी और लंबी लैब प्रक्रिया के बिना ही विशिष्ट बीमारियों के लिए सटीक दवाएं विकसित की जा सकें। दवाओं की खोज की लंबी और जटिल प्रक्रिया को पीछे छोड़ते हुए पोटेंशियल साइंसेज ने एक नया रास्ता अपनाया है। यह स्टार्टअप पारंपरिक प्रयोगशाला प्रयोगों पर निर्भर रहने के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भौतिकी के नियमों के जरिए सीधे तौर पर नए अणु तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। कंपनी का मुख्य उद्देश्य ऐसी उन्नत तकनीक और मॉडल विकसित करना है जो कम समय में सटीक परिणाम दे सकें। इस नई तकनीक के जरिए कंपनी का प्रयास है कि जिन अणुओं के मानव शरीर पर कारगर होने की संभावना नहीं है, उन्हें शुरुआती चरण में ही छांट लिया जाए। इस प्रक्रिया से शोधकर्ताओं को यह समझने में आसानी होती है कि विभिन्न रासायनिक तत्व इंसानी जीव विज्ञान के साथ किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं। बीती 5 नवंबर को अपनी शुरुआत करने वाले इस स्टार्टअप को सोवएआई और ट्विन पाथ वेंचर्स जैसे निवेशकों से करोड़ों डॉलर का शुरुआती वित्तपोषण प्राप्त हुआ है। हालांकि, संस्थापकों ने इस निवेश की सटीक राशि या कंपनी के कुल मूल्यांकन का खुलासा करने से इनकार कर दिया है। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह विभिन्न प्रकार की बीमारियों के इलाज के विकास को भारी गति दे सकती है। प्रयोगों के खर्च में कमी आने से दवा कंपनियों के लिए दुर्लभ बीमारियों पर काम करना भी आर्थिक रूप से सुलभ हो जाएगा, जिन पर अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। कंपनी का लक्ष्य भविष्य में अधिक व्यक्तिगत और विशिष्ट उपचार उपलब्ध कराना है, जिससे हर मरीज की अनोखी शारीरिक बनावट के अनुसार एक बार इस्तेमाल होने वाले आणविक संयोजन तैयार किए जा सकें। हालांकि, इस बात को लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है कि यह स्टार्टअप रोग से जुड़ी प्रोटीनों के साथ दवा के जुड़ने की क्षमता का अनुमान कितनी सटीक से लगा पाएगा, जिसके लिए इस तकनीक में एक बड़ा सुधार होना आवश्यक है। राइस यूनिवर्सिटी के रसायन विज्ञान के प्रोफेसर पीटर वोलाइन्स का मानना है कि इस क्षेत्र में कुछ सुधार जरूर देखने को मिलेगा, लेकिन प्रोटीन इंजीनियरिंग के मौजूदा स्तर को अभी काफी आगे जाना बाकी है। गूगल डीपमाइंड के डेमिस हसाबिस जैसे दिग्गज वैज्ञानिक मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में हो रहे विकास से भविष्य में कई बड़े वैज्ञानिक चमत्कार सामने आएंगे। पोटेंशियल साइंसेज जैसे नए स्टार्टअप्स को पूरी उम्मीद है कि चिकित्सा और औषधि निर्माण का क्षेत्र इस तकनीक से सबसे पहले बदलने वाले क्षेत्रों में शामिल होगा। वर्तमान में अधिकांश एआई ड्रग डिस्कवरी लैब्स एक ही सार्वजनिक डेटाबेस पर आधारित मॉडल विकसित कर रही हैं, जिसमें दशकों के प्रयोगों के बाद 3डी परमाणु संरचनाओं को शामिल किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं की खोज की गति को तेजी से बढ़ाने के लिए यह डेटाबेस अब भी आकार में काफी छोटा है। ब्रह्मांड में मौजूद परमाणुओं को ऐसे अणुओं में बदलने के अनगिनत रास्ते हैं जिन्हें इंसानों को दिया जा सके। दवा की खोज को एक जटिल खोज समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें यह तय करना होता है कि किसी खास बीमारी के लिए सही अणुओं की पहचान कितनी तेजी से की जा सके। इसी कमी को दूर करने के लिए पोटेंशियल साइंसेज विभिन्न रासायनिक यौगिकों के बीच होने वाली प्रतिक्रियाओं का अनुकरण करके कृत्रिम डेटा से बड़े पैमाने पर डेटाबेस तैयार कर रही है। इन विशाल डेटा भंडारों के आधार पर कंपनी और अधिक उन्नत एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने की योजना बना रही है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एमेरिटस प्रोफेसर एलन फेर्श्त का कहना है कि यदि कोशिका के भीतर के सभी अणुओं की आपसी प्रतिक्रियाओं का सटीक हिसाब लगाया जा सके, तो यह दवा विकास के पूरे स्वरूप को पूरी तरह से बदल सकता है। सोवएआई से निवेश प्राप्त करने वाले स्टार्टअप्स की सूची में पोटेंशियल साइंसेज के अलावा बेसकैंप रिसर्च, आइसोमॉर्फिक लैब्स और कस्पएआई जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस वर्ष स्थापित किए गए इस निवेश फंड के पास लगभग 80 करोड़ डॉलर की पूंजी है और यह अपनी पोर्टफोलियो कंपनियों को देश के राष्ट्रीय एआई सुपरकंप्यूटर तक पहुंच प्रदान कर सकता है। सोवएआई की वेंचर्स प्रमुख जोसफिन कांत का कहना है कि रसायन विज्ञान के भौतिकी दृष्टिकोण से काम करना इस स्टार्टअप को अन्य कंपनियों से अलग पहचान देता है। बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद इस स्टार्टअप को सरकारी सहायता का लाभ मिल रहा है, हालांकि इस क्षेत्र में पहले से ही कई उद्यमी और शिक्षाविद समान चुनौतियों से निपटने में जुटे हुए हैं। दवाओं के संभावित विकल्पों की पहचान जल्दी होने मात्र से उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता की जांच में लगने वाला समय और लागत कम नहीं हो जाती है। प्रोफेसर पीटर वोलाइन्स का कहना है कि किसी दवा की वास्तविक लागत उसकी डिजाइनिंग से कहीं अधिक इस बात पर निर्भर करती है कि वह चूहों और गंभीर रूप से बीमार रोगियों पर कैसा प्रभाव डालती है। इस तकनीक के आगे बढ़ने के साथ ही स्टार्टअप्स के सामने यह जोखिम भी होगा कि प्रभावी इलाज खोजने वाले उपकरणों का दुरुपयोग करके खतरनाक रसायनों का निर्माण भी किया जा सकता है। संस्थापक हेटेम हेलाल का स्वीकार करना है कि यदि कोई तकनीक विषाक्तता को पूरी तरह कम करने के उपकरण डिजाइन कर सकती है, तो उसका उल्टा यानी इसे बढ़ाना भी संभव हो सकता है। पोटेंशियल साइंसेज के पास अभी अपनी सभी योजनाओं के स्पष्ट उत्तर नहीं हैं, और कंपनी ने अभी यह तय नहीं किया है कि अपने मॉडलों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए या नहीं। इसके बावजूद हेलाल का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से इस दिशा में प्रयास करना एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कदम है। इसका आप पर असर दवा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में एआई के उपयोग से भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की लागत कम हो सकती है और दुर्लभ बीमारियों के इलाज तेजी से बाजार में आ सकते हैं। • भारत में: देश के दवा निर्माण और अनुसंधान संस्थानों में इस प्रकार की उन्नत तकनीकों के आने से कम लागत पर नए उपचार विकसित करने में मदद मिल सकती है। • वैश्विक स्तर पर: दुनिया भर में फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए प्रयोगशाला परीक्षणों का समय घटने से विशेष और व्यक्तिगत चिकित्सा उपचारों तक आम लोगों की पहुंच आसान हो सकती है। • लागत और मूल्य: शुरुआती चरण के प्रयोगों का खर्च घटने से भविष्य में दवा विकास की कुल लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। • स्वास्थ्य सेवा: दुर्लभ और उपेक्षित बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए विशेष रूप से तैयार की जाने वाली दवाओं के विकास में तेजी आ सकती है। • अनुसंधान का दायरा: वैज्ञानिक और अकादमिक शोधकर्ताओं के लिए कंप्यूटिंग संसाधनों के उपयोग से जटिल जैविक संरचनाओं को समझना अधिक सरल हो जाएगा। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक प्रयोगशाला आधारित दवा खोज की प्रक्रिया अत्यधिक धीमी और महंगी होती है, जिसके कारण शोधकर्ताओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भौतिकी सिमुलेशन का सहारा लेना पड़ रहा है। • सीमित डेटाबेस: मौजूदा सार्वजनिक डेटाबेस का आकार बहुत छोटा होने के कारण उन्नत एआई मॉडल को प्रशिक्षित करना कठिन हो रहा था। • उच्च लागत और समय: पारंपरिक तरीकों में नए अणुओं की जांच करने में वर्षों का समय और भारी मात्रा में धन खर्च होता है। • सरकारी सहायता: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा विशेष वेंचर फंड के जरिए इस क्षेत्र में निवेश किया जा रहा है। सवाल-जवाब 1. पोटेंशियल साइंसेज ने अपनी शुरुआत कब की थी? इस स्टार्टअप की शुरुआत 5 नवंबर को हुई थी। 2. कंपनी को शुरुआती वित्तपोषण किन निवेशकों से मिला है? कंपनी को सोवएआई और ट्विन पाथ वेंचर्स सहित अन्य निवेशकों से करोड़ों डॉलर का वित्तपोषण मिला है। 3. सोवएआई किस देश का वेंचर कैपिटल फंड है? सोवएआई यूनाइटेड किंगडम सरकार का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वेंचर कैपिटल फंड है। 4. कंपनी दवाओं की खोज के लिए किस तकनीक का उपयोग कर रही है? कंपनी भौतिकी के सिद्धांतों के जरिए परमाणु और आणविक प्रतिक्रियाओं का अनुकरण कर बड़े पैमाने पर सिंथेटिक डेटा तैयार कर रही है। 5. हेटेम हेलाल कौन हैं? हेटेम हेलाल पोटेंशियल साइंसेज के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। https://trendkia.com/ai/lab-ke-parikshon-ko-chod-artificial-intelligence-se-new-davaye-khoj-rahi-hai-potential-sciences-58044 TrendKia — Har trend, sabse pehle.