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  "type": "article",
  "title": "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी इंसानियत के लिए बड़ा खतरा, जानी-मानी प्रोफेसर ने चेताया",
  "summary": "शोधकर्ता शेरी टर्कल ने अपनी नई किताब में चेतावनी दी है कि एआई से बढ़ती अंतरंगता और मशीनों पर अत्यधिक निर्भरता समाज के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है।",
  "content": "मशीनों के साथ बढ़ती नजदीकियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर हमारी बढ़ती निर्भरता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। प्रौद्योगिकी और समाज के संबंधों पर गहराई से अध्ययन करने वाली एमआईटी की प्रोफेसर शेरी टर्कल ने अपनी नई किताब आर्टिफिशियल इंटीमेसी: हू वी बिकम व्हेन वी टॉक टू मशीनों में इसी संकट पर रोशनी डाली है। उनका यह काम समाज को आने वाले बड़े खतरों के प्रति सचेत करने का एक गंभीर प्रयास है, जिसकी तुलना मौन स्प्रिंग जैसी ऐतिहासिक किताबों से की जा रही है, जिन्होंने अतीत में दुनिया का ध्यान गंभीर संकटों की ओर खींचा था।\n\n \n\nबड़ी तकनीकी कंपनियों और सरकारी प्राथमिकताओं पर सवाल\n\nयह चेतावनी ऐसे समय में सामने आई है जब एक तरफ मल्टीट्रिलियन-डॉलर का तकनीक उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ सरकारें भी व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के हर कोने में एआई को शामिल करने के लिए पूरी तरह उत्सुक नजर आ रही हैं। इस ताकतवर व्यवस्था के सामने एक छोटी सी दिखने वाली अकादमिक हस्ती खड़े होकर उन व्यवस्थाओं पर सवाल उठा रही है जो इंसानी रिश्तों की कीमत पर तकनीक को बढ़ावा दे रही हैं। महामारी के दौर में किए गए साक्षात्कारों के दौरान यह बात खुलकर सामने आई कि किस तरह लोग अपनों की उपेक्षा करके केवल चैटबॉट की दुनिया में ही रहना पसंद करने लगे हैं।\n\n \n\nमहामारी के दौरान बदली सोच और एकांत का संकट\n\nशोध के शुरुआती चरण में एक तटस्थ जिज्ञासा के साथ शुरुआत करने वाली इस विशेषज्ञ की राय महामारी के बाद पूरी तरह बदल गई। महामारी के उस दौर में जब परिवार के लोग अपनों से जुड़ने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब कई लोग अपनी परेशानियों को भूलकर केवल चैटबॉट के साथ समय बिताने में लगे हुए थे। इस स्थिति ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि लोग राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर पूरी तरह एक आभासी दुनिया में सिमटते जा रहे हैं। आज का दौर वास्तविकता से दूर भागने का नहीं, बल्कि यथार्थ का सामना करने की मांग करता है।\n\n \n\nसोशल मीडिया से शुरू हुई थी मानसिक निर्भरता\n\nइस पूरी प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है जिसने लोगों को मानसिक रूप से इसके लिए तैयार किया। जब भी कोई व्यक्ति उदास या अकेला महसूस करता है, तो वह सबसे पहले अपने कंप्यूटर या डिवाइस की शरण में जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने लोगों को पहले अपनी भावनाओं के जरिए उलझाया और फिर उन्हें एक खास दायरे में सीमित कर दिया। अब यह नई तकनीक हमारे सामने आ चुकी है, जिसके पास पहला पुरुष यानी मैं या मेरा शब्द का उपयोग करने का कोई तार्किक आधार नहीं होना चाहिए।\n\n \n\nचैटबॉट्स द्वारा पहले पुरुष के इस्तेमाल पर प्रतिबंध की मांग\n\nविशेषज्ञों का साफ मानना है कि चैटबॉट को पहली बार यानी मैं कहकर बात करने से पूरी तरह रोक दिया जाना चाहिए। वर्षों की कड़ी मेहनत और अकादमिक साख के बाद ऐसा रुख अपनाना किसी रूढ़िवादिता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक ढलान पर बढ़ती फिसलन को रोकने की कोशिश है। आज हालात यह बन गए हैं कि पेशेवर मनोचिकित्सा का विकल्प चैटबॉट्स को माना जा रहा है। लोग यह दलील देते हैं कि चैटबॉट के जरिए वे अपने बॉस, प्रेमी या शिक्षक से बातचीत करने का अभ्यास करते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर से मिलने वाली पूर्ण स्वीकृति की गर्माहट में डूब जाता है, तो यही बातचीत उसका अंतिम गंतव्य बन जाती है।\n\n \n\nकार्यस्थल पर लूप में मानव की अवधारणा का खोखलापन\n\nदफ्तरों और कार्यस्थलों पर एआई के इस्तेमाल को लेकर भी गहरी नाराजगी व्यक्त की गई है, खासकर लूप में मानव यानी ह्यूमन इन द लूप जैसी शब्दावली पर। इस पद का वास्तविक अर्थ यह होता है कि इंसान को उत्पादक प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है और उसे केवल उन विसंगतियों या कमियों को सुधारने के लिए रखा गया है जिन्हें मशीनें नहीं पकड़ पाती हैं। यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से इसलिए विफल साबित होती है क्योंकि कंपनियों द्वारा इस प्रक्रिया में गिने-चुने लोगों को ही शामिल किया जाता है, जो किसी भी बड़े बदलाव की स्थिति में कुछ नहीं बदल सकते। वे केवल कानूनी दांव-पेच से बचने और लोगों को यह भ्रम देने के लिए वहां मौजूद होते हैं कि काम पूरी तरह मशीनों को नहीं सौंपा गया है, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट होती है।\n\n \n\nमानवीय बातचीत का कोई दूसरा विकल्प नहीं\n\nयह तर्क दिया जाता है कि शक्तिशाली चैटबॉट संवाद का एक नया माध्यम हो सकते हैं जो इंसानी बातचीत से बदतर नहीं बल्कि अलग है क्योंकि इनसे लोगों को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है। इसके बावजूद, कोई भी एआई कभी भी मानवीय संवाद की जगह नहीं ले सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता न तो मौत से डरती है, न बीमारी से और न ही उसे किसी प्रकार के दर्द का अहसास होता है। वह अपने बच्चों से प्रेम नहीं करती और न ही उसे इस बात की कोई परवाह होती है कि कोई आत्महत्या करता है या अपने परिवार के लिए खाना बनाता है। यदि समाज अपने बच्चों को इसी तकनीक के सहारे पालेगा या अपने सबसे अंतरंग संवाद इसी के साथ करेगा, तो हम इंसानियत से पूरी तरह अपना संपर्क खो देंगे।\n\n \n\nअकेलेपन के संकट का समाधान और भविष्य की उम्मीद\n\nआज समाज में जो अकेलापन और संवादहीनता का संकट गहराया है, उसका मुख्य कारण यह है कि हम एक-दूसरे का साथ छोड़ रहे हैं। यदि केवल एक डेटा सेंटर के संसाधनों का पुनर्उपयोग किया जाए, तो बुजुर्गों की देखभाल के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाए जा सकते हैं। हालांकि एक तरफ जहां एआई को लेकर व्यापक स्तर पर संशय और विरोध देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों लोग इनका उपयोग भी कर रहे हैं। इस पूरी मुहिम का मुख्य उद्देश्य यही है कि लोग इन अदृश्य और गहरी होती अंतरंगता की सीमाओं को पहचानें और इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें। आज के समय में विलुप्त होने के खतरों और तकनीकी विस्तार को लेकर चल रही बहसों के बीच इस बात की उम्मीद जरूर जगती है कि लोग केवल बाहरी खर्चों ही नहीं, बल्कि अपनी अंतरंगता की कीमत पर चुकानी पड़ने वाली भारी लागत को भी देखने के लिए तैयार होंगे।\n\nइसका आप पर असर\nकृत्रिम बुद्धिमत्ता और चैटबॉट्स पर बढ़ती निर्भरता हमारे दैनिक जीवन, सामाजिक संबंधों और मानसिक स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है।\n\n• मानवीय संवाद में गिरावट: मशीनों के साथ अत्यधिक जुड़ाव के कारण लोग वास्तविक जीवन के सामाजिक रिश्तों और पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर होते जा रहे हैं।\n\n• मानसिक स्वास्थ्य पर असर: पेशेवर मनोचिकित्सा के स्थान पर चैटबॉट्स का उपयोग करने से व्यक्ति की भावनात्मक समस्याएं और गहरी हो सकती हैं।\n\n• कार्यस्थल की वास्तविकता: कार्यस्थलों पर एआई के बढ़ते दखल से नौकरियों की सुरक्षा और उत्पादक प्रक्रियाओं में इंसानी भूमिका कम होती जा रही है।\n\n• एकाग्रता और निर्णय क्षमता: वर्चुअल दुनिया में अधिक समय बिताने से लोगों की वास्तविक दुनिया की समस्याओं से निपटने की क्षमता प्रभावित हो रही है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमशीनों के साथ बढ़ती इस अंतरंगता के पीछे तकनीकी कंपनियों का आक्रामक विस्तार और समाज में फैला अकेलापन मुख्य वजह रहे हैं।\n\n• महामारी का प्रभाव: कोविड-19 महामारी के दौरान लगे प्रतिबंधों और aislamiento के कारण लोगों ने डिजिटल माध्यमों और चैटबॉट्स का सहारा लेना शुरू किया।\n\n• सोशल मीडिया की भूमिका: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने लोगों को पहले से ही इस बात का आदी बना दिया था कि वे अपनी उदासी या बोरियत मिटाने के लिए स्क्रीन का रुख करें।\n\n• उद्योग का आक्रामक प्रसार: मल्टीट्रिलियन-डॉलर के तकनीक उद्योग और सरकारी समर्थन ने हर व्यक्तिगत क्षेत्र में एआई को तेजी से स्थापित किया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शेरी टर्कल की नई किताब का नाम क्या है?\nउनकी नई किताब का नाम आर्टिफिशियल इंटीमेसी: हू वी बिकम व्हेन वी टॉक टू मशीन्स है।\n\n2. शेरी टर्कल किस शैक्षणिक संस्थान से जुड़ी हैं?\nवे एमआईटी में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।\n\n3. किताब के अनुसार चैटबॉट्स को किस बात से रोका जाना चाहिए?\nकिताब में सुझाव दिया गया है कि चैटबॉट्स को पहली बार यानी मैं या मेरा शब्द का उपयोग करने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।\n\n4. लेखिका ने कार्यस्थल पर किस पद पर आपत्ति जताई है?\nउन्होंने लूप में मानव यानी ह्यूमन इन द लूप शब्दावली और उसके वास्तविक क्रियान्वयन पर कड़ी आपत्ति जताई है।\n\n5. लेखिका के अनुसार एआई मानवीय बातचीत की जगह क्यों नहीं ले सकता?\nएआई को मौत, बीमारी या दर्द का कोई डर नहीं होता और वह इंसानी भावनाओं या संबंधों की परवाह नहीं करता है।",
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  "category": "एआई",
  "publishedAt": "2026-10-16",
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    "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस",
    "शेरी टर्कल",
    "तकनीक और समाज",
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    "मानवीय संबंध",
    "मानसिक स्वास्थ्य"
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