# साइंस कॉर्पोरेशन ने पहली बार स्टारगार्ड्ट बीमारी के मरीज की आंख में लगाया रोशनी लौटाने वाला चिप

> साइंस कॉर्पोरेशन ने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी आई हॉस्पिटल में स्टारगार्ड्ट बीमारी से पीड़ित मरीज में प्रिमा रेटिनल इंप्लांट सफलतापूर्वक लगाया है। मरीज ने शुरुआती रिहैबिलिटेशन सत्रों के दौरान अक्षर और पूरे शब्द पढ़ने में सफलता हासिल की।

**Type:** article · **Category:** एआई · **Published:** 2026-10-14 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/ai/science-corporation-ne-pahali-bara-stargardt-bimari-ke-marija-ki-ankha-men-lagaya-roshani-lautane-vala-chipa-47549 · **Language:** Hindi
**Tags:** साइंस कॉर्पोरेशन, मैक्स होडाक, स्टारगार्ड्ट बीमारी, प्रिमा इंप्लांट, ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस, रेटिना सर्जरी, न्यूरोटेक्नोलॉजी, दृष्टि बहाली

दृष्टिहीनता से जूझ रहे लोगों के लिए न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र से एक बड़ी चिकित्सीय सफलता सामने आई है। साइंस कॉर्पोरेशन ने अपने विशेष रेटिनल इंप्लांट प्रिमा को पहली बार स्टारगार्ड्ट बीमारी के एक मरीज की आंख में प्रत्यारोपित किया है। यह चिकित्सीय प्रक्रिया ऑस्ट्रेलिया के सिडनी आई हॉस्पिटल में चल रहे क्लीनिकल ट्रायल के तहत मई में पूरी की गई थी। सर्जरी के बाद जब मरीज का पुनर्वास शुरू हुआ, तो उसने शुरुआती सत्र में ही एक अक्षर देखा और दूसरे सत्र में एक पूरा शब्द पढ़ने में कामयाब रहा। यह उपलब्धि इस मायने में असाधारण है क्योंकि चिकित्सा विज्ञान में स्टारगार्ड्ट बीमारी को अब तक लाइलाज माना जाता रहा है।

## स्टारगार्ड्ट बीमारी और रेटिना पर इसका प्रभाव
स्टारगार्ड्ट बीमारी सीधे तौर पर आंख के बाहरी रेटिना को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। इस बीमारी में प्रकाश को महसूस करने वाली कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। हालांकि, आंख का अंदरूनी रेटिना, जो दृश्य संकेतों को मस्तिष्क तक पहुंचाने का काम करता है, अक्सर सुरक्षित रहता है। इस विकार के कारण मरीज की दृष्टि के ठीक बीच में एक अंधा धब्बा बन जाता है, जो समय बीतने के साथ-साथ बढ़ता चला जाता है। पूरी दुनिया में लगभग 1,50,000 लोग स्टारगार्ड्ट बीमारी की वजह से अपनी देखने की क्षमता पूरी तरह गंवा चुके हैं।

कंपनी के संस्थापक मैक्स होडाक ने इस तकनीक के बुनियादी सिद्धांत को समझाते हुए बताया कि रेटिना वास्तव में सेंट्रल नर्वस सिस्टम का ही एक हिस्सा है। उनके अनुसार, कॉकलियर इंप्लांट, रेटिनल प्रोस्थेसिस और मोटर प्रोस्थेसिस जैसे सभी उपकरण अलग-अलग प्रकार के ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस ही हैं। जब मस्तिष्क को एक जैविक कंप्यूटर की तरह देखा जाता है, तो दृष्टि वास्तव में ऑप्टिक नर्व से गुजरने वाला एक विद्युत प्रवाह मात्र है। यदि ऑप्टिक नर्व के माध्यम से मस्तिष्क के बाकी हिस्सों तक सही विद्युत संकेत पहुंचा दिए जाएं, तो इंसान को दोबारा देखने की क्षमता प्रदान की जा सकती है।

## प्रिमा तकनीक का कार्यप्रणाली और सर्जरी प्रक्रिया
प्रिमा उपकरण को मरीज की आंख में लगाने के लिए लगभग एक घंटे का सर्जिकल ऑपरेशन किया जाता है। इस प्रक्रिया में आंख के पिछले हिस्से में एक छोटा माइक्रोचिप स्थापित किया जाता है, जहां प्राकृतिक फोटोरिसेप्टर पूरी तरह खराब हो चुके होते हैं। ऑपरेशन के बाद मरीज को कैमरे से लैस विशेष चश्मा पहनना होता है। यह चश्मा बाहरी दुनिया के दृश्य को रिकॉर्ड करके सीधे आंख के अंदर मौजूद चिप तक वायरलेस तरीके से प्रसारित करता है। इस तरह यह इंप्लांट कृत्रिम फोटोरिसेप्टर की तरह काम करने लगता है।

मरीज की आंख में लगाया गया यह उपकरण दो मिलीमीटर गुणा दो मिलीमीटर आकार का एक बेहद महीन इंप्लांट है। सीमित आकार की वजह से इससे देखना किसी पतले स्ट्रॉ के जरिए देखने जैसा अनुभव कराता है। यह कोई बहुत बड़ा या रंगीन दृश्य क्षेत्र नहीं देता, बल्कि मरीज की केंद्रीय दृष्टि में एक मोनोक्रोम पैच तैयार करता है। यह ब्लैक एंड व्हाइट छवि काफी शार्प और उच्च कंट्रास्ट वाली होती है, जिससे मरीज एक बार में दो-तीन अक्षर आसानी से देख सकता है।

## अगली पीढ़ी के इंप्लांट और भविष्य का रोडमैप
शोधकर्ताओं का अगला मुख्य लक्ष्य इस कृत्रिम दृष्टि के दायरे को और अधिक चौड़ा करना है। दृष्टि के क्षेत्र को बड़ा करने के लिए आंख के प्राकृतिक घुमाव के अनुकूल काम करना होगा, साथ ही इलेक्ट्रोड के आकार को और छोटा करना पड़ेगा ताकि प्राकृतिक दृष्टि के स्तर की बारीकी हासिल की जा सके। मैक्स होडाक के अनुसार, अगली पीढ़ी के इस उपकरण पर तेजी से काम चल रहा है और अगले एक वर्ष के भीतर इसे इंसानों पर आजमाया जाएगा। कंपनी को उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में वे प्राकृतिक दृष्टि की स्पष्टता के बेहद करीब पहुंचने में कामयाब हो जाएंगे।

यूरोप में प्रिमा पहले से ही उन मरीजों के लिए व्यावसायिक रूप से उपलब्ध है, जिनकी दृष्टि ज्योग्राफिक एट्रोफी के कारण समाप्त हो चुकी थी। ज्योग्राफिक एट्रोफी उम्र से संबंधित मैक्युलर डिजनरेशन का एक गंभीर रूप है। कंपनी का मानना है कि उनका यह तकनीकी दृष्टिकोण केवल एक विकार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्टारगार्ड्ट जैसी कई जटिल बीमारियों के इलाज में कारगर साबित हो सकता है।

## साइंस कॉर्पोरेशन की स्थापना और व्यापक न्यूरोलॉजिकल लक्ष्य
मैक्स होडाक ने न्यूरालिंक छोड़ने के बाद 2021 में साइंस कॉर्पोरेशन की स्थापना की थी। शुरुआत में कंपनी ने न्यूरल इंजीनियरिंग और एडवांस्ड ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक विकसित करने की व्यापक योजनाएं तैयार की थीं। हालांकि, अन्य जटिल परियोजनाओं पर काम शुरू करने से पहले कंपनी यह साबित करना चाहती है कि उसके बुनियादी तरीके सुरक्षित और प्रभावी हैं। इसी रणनीति के तहत दृष्टिबाधित लोगों की रोशनी लौटाने को पहली व्यावसायिक प्राथमिकता बनाया गया है।

कंपनी का मुख्य ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस सेंसर खोपड़ी के अंदर स्थापित किया जाएगा और मस्तिष्क की बाहरी सतह पर टिका रहेगा। यह दृष्टिकोण न्यूरालिंक से बिल्कुल अलग है, जहां इलेक्ट्रोड सीधे मस्तिष्क के ऊतकों के अंदर प्रविष्ट कराए जाते हैं। कंपनी का अनुमान है कि यह डिवाइस ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित मरीजों में न्यूरोलॉजिकल गतिविधियों की निरंतर निगरानी करने जैसी कई गंभीर समस्याओं के समाधान में मददगार साबित हो सकता है।

## स्ट्रोक और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों का समाधान
कंपनी अपनी पहली गोपनीय क्लीनिकल दिशा की घोषणा जल्द करने जा रही है, जो एक जानी-मानी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी से जुड़ी है। इसके अलावा स्ट्रोक के मरीजों के इलाज पर भी गहरा ध्यान दिया जा रहा है। जब किसी व्यक्ति को स्ट्रोक होता है, तो मस्तिष्क का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर मृत हो जाता है। यदि गहरी दिमागी संरचनाओं के दो अलग-अलग क्षेत्रों में नए संबंध स्थापित कर दिए जाएं, तो मस्तिष्क में पूरी तरह से नए कॉर्टिकल क्षेत्र जोड़ना संभव हो सकता है। पारंपरिक इलेक्ट्रोड के जरिए ऐसा कर पाना कभी मुमकिन नहीं था।

कंपनी का मानना है कि आने वाले समय में 60 या 70 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते अधिकांश लोगों को किसी न किसी प्रकार के बीसीआई की जरूरत महसूस होगी। इसका मकसद पूरी तरह स्वस्थ 40 वर्ष के युवाओं के लिए उपकरण बनाना नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ लोगों की सेहतमंद जिंदगी की अवधि को विस्तार देना है। दीर्घकालिक दृष्टिकोण से कंपनी का अंतिम मिशन यह समझना है कि जैविक मस्तिष्क किस तरह मन का निर्माण करता है और अंततः इंजीनियर्ड ब्रेन का निर्माण कैसे किया जा सकता है।

## इसका आप पर असर
रेटिनल माइक्रोचिप तकनीक का सफल प्रत्यारोपण उन लाखों दृष्टिबाधित मरीजों के लिए नई आशा लेकर आया है जो अब तक लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे थे।

- **मरीजों के लिए लाभ:** यह तकनीक स्टारगार्ड्ट और ज्योग्राफिक एट्रोफी से पीड़ित मरीजों को दोबारा पढ़ने और आकृतियों को पहचानने की क्षमता देती है। इससे गंभीर रूप से दृष्टिहीन लोग रोजमर्रा के कामों में आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
- **इलाज की प्रक्रिया:** मरीज को केवल एक घंटे की सर्जरी से गुजरना होता है जिसमें आंख के पीछे दो मिलीमीटर का चिप लगाया जाता है। इसके बाद कैमरा लगे चश्मे और रिहैबिलिटेशन सत्रों के जरिए मरीज की पढ़ने की क्षमता को दोबारा सक्रिय किया जाता है।
- **तकनीकी सीमाएं:** वर्तमान में यह इंप्लांट केवल ब्लैक एंड व्हाइट और सीमित क्षेत्र की दृष्टि प्रदान करता है। मरीजों को रंगीन या चौड़े कोण की दृष्टि के लिए अगली पीढ़ी के चिप्स का इंतजार करना होगा।
- **भविष्य की उपलब्धता:** यूरोप में यह तकनीक ज्योग्राफिक एट्रोफी के लिए पहले से स्वीकृत है, जबकि अन्य देशों में क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं। आने वाले पांच वर्षों में इसके व्यापक रूप से उपलब्ध होने की संभावना है।

## ऐसा क्यों हुआ
स्टारगार्ड्ट बीमारी आनुवंशिक कारणों से आंख के बाहरी रेटिना की प्रकाश संवेदी कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, जिससे केंद्रीय अंधापन पैदा होता है। साइंस कॉर्पोरेशन ने इस स्थायी अंधेपन को दूर करने के लिए क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की जगह एक कृत्रिम इलेक्ट्रॉनिक सेंसर स्थापित किया है।

- **कोशिकाओं का क्षरण:** इस बीमारी में बाहरी रेटिना के फोटोरिसेप्टर धीरे-धीरे मर जाते हैं, जिससे मरीज की केंद्रीय दृष्टि पूरी तरह खत्म हो जाती है। हालांकि, अंदरूनी रेटिना और मस्तिष्क तक जाने वाली ऑप्टिक नर्व पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
- **इलेक्ट्रिकल सिग्नलिंग:** मस्तिष्क दृष्टि को केवल विद्युत संकेतों के रूप में समझता है। कंपनी ने पाया कि यदि कृत्रिम चिप द्वारा ऑप्टिक नर्व को सही विद्युत संकेत दिए जाएं, तो मस्तिष्क दोबारा चित्र देखने में सक्षम हो जाता है।
- **क्लिनिकल ट्रायल:** यूरोप में ज्योग्राफिक एट्रोफी पर सफल परीक्षणों के बाद वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को स्टारगार्ड्ट बीमारी पर आजमाने का फैसला किया। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी आई हॉस्पिटल में चल रहे ट्रायल के तहत पहला सफल ऑपरेशन संपन्न हुआ।

## सवाल-जवाब

### 1. स्टारगार्ड्ट बीमारी क्या है और यह आंख को कैसे प्रभावित करती है?
स्टारगार्ड्ट बीमारी आंख के बाहरी रेटिना की प्रकाश संवेदी कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, जिससे दृष्टि के केंद्र में एक अंधा धब्बा बन जाता है जो समय के साथ बढ़ता है।

### 2. प्रिमा इंप्लांट को आंख में लगाने में कितना समय लगता है?
इस इंप्लांट को आंख के पिछले हिस्से में लगाने के लिए लगभग एक घंटे की सर्जिकल प्रक्रिया की जाती है।

### 3. सर्जरी के बाद मरीज को दुनिया कैसे दिखाई देती है?
मरीज को कैमरा लगे चश्मे के जरिए सीमित क्षेत्र में हाई-कंट्रास्ट ब्लैक एंड व्हाइट दृश्य दिखता है, जो एक स्ट्रॉ के जरिए देखने जैसा अनुभव कराता है।

### 4. मरीज ने रिहैबिलिटेशन सत्रों में क्या प्रगति दिखाई?
मरीज ने अपने पहले पुनर्वास सत्र में एक अक्षर देखा और दूसरे सत्र में एक पूरा शब्द पढ़ने में सफलता प्राप्त की।

### 5. पूरी दुनिया में कितने लोग स्टारगार्ड्ट बीमारी से प्रभावित हैं?
पूरी दुनिया में लगभग 1,50,000 लोग स्टारगार्ड्ट बीमारी के कारण अपनी देखने की क्षमता गंवा चुके हैं।

### 6. साइंस कॉर्पोरेशन की स्थापना कब और किसने की थी?
इस कंपनी की स्थापना मैक्स होडाक ने न्यूरालिंक छोड़ने के बाद वर्ष 2021 में की थी।

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