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  "type": "article",
  "title": "ब्रिटेन के गृह मंत्रालय पर ओपनएआई टूल्स के इस्तेमाल को लेकर मंडराया जांच का खतरा",
  "summary": "ब्रिटेन के गृह मंत्रालय द्वारा शरण के मामलों में ओपनएआई के तकनीकी टूल्स के कथित गुप्त उपयोग पर स्वतंत्र जांच बैठ सकती है। डिजिटल अधिकार संगठन ओपन राइट्स ग्रुप की छह महीने लंबी पड़ताल के बाद यह मामला सामने आया है।",
  "content": "ब्रिटेन के बॉर्डर और आव्रजन मामलों की निगरानी करने वाले स्वतंत्र मुख्य निरीक्षक यानी आईसीआईबीआई ने डिजिटल राइट्स नॉनप्रॉफिट ओपन राइट्स ग्रुप से इन टूल्स के बारे में और अधिक जानकारी साझा करने का अनुरोध किया है। यह कदम तब उठाया जा रहा है जब यह संस्था अगले साल के अपने निरीक्षण विषयों की सूची तैयार कर रही है। ओपन राइट्स ग्रुप की कैंपेनर सारा अल्शरीफ ने यह जानकारी दी है। इस संगठन के निष्कर्ष छह महीने लंबी चली उस गहन पड़ताल पर आधारित हैं, जिसमें ग्यारह संसदीय सवाल, दो मंत्रिस्तरीय पत्र और दस पब्लिक रिकॉर्ड्स रिक्वेस्ट शामिल थीं। इन सभी के जरिए गृह मंत्रालय से उन विवरणों को बाहर निकलवाने का प्रयास किया गया जिन्हें विभाग ने अब तक छुपाकर रखा था।\n\n \n\nशरण मामलों और नीतियों की समीक्षा के लिए एआई का प्रयोग\n\nगृह मंत्रालय द्वारा जिन तकनीकी प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है उनमें एसाइलम केस समराइजेशन और एसाइलम पॉलिसी सर्च टूल्स प्रमुख हैं। दस्तावेज बताते हैं कि ये टूल्स ओपनएआई के दो हजार तेईस के जीपीटी-फोर लार्ज लैंग्वेज मॉडल और माइक्रोसॉफ्ट फाउंड्री पर आधारित हैं। आव्रजन और कानून प्रवर्तन से जुड़ी इस एजेंसी ने इन टूल्स का परीक्षण साल दो हजार चौबीस के अंत में शुरू किया था। उस समय लेबर पार्टी की सरकार लगभग एक लाख शरण मामलों के बैकलॉग को खत्म करने के प्रयास में जुटी हुई थी, जबकि हर साल ब्रिटेन में आने वाले हजारों नए आवेदनों का प्रबंधन भी करना था। हालांकि विभाग ने पिछले साल जून तक शुरुआती फैसले का इंतजार कर रहे लोगों की संख्या को आधा करने में खासी प्रगति की है, लेकिन निर्णयों के खिलाफ अपील की संख्या में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।\n\n \n\nनिरीक्षण प्रक्रिया और अधिकारियों की प्रतिक्रिया\n\nआईसीआईबीआई ने स्पष्ट किया है कि अपनी वार्षिक निरीक्षण प्राथमिकताओं को सार्वजनिक करने से पहले यह पुष्टि नहीं की जा सकती कि कौन से विषय सक्रिय रूप से विचाराधीन हैं। हालांकि संस्था ने यह स्वीकार किया कि वह एआई टूल्स के उपयोग को लेकर जताई गई चिंताओं से भली-भांति अवगत है। साथ ही पिछले साल के उस निष्कर्ष का भी हवाला दिया गया जिसमें कहा गया था कि इस तरह के एक टूल की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता अलग-अलग मामलों में भिन्न पाई गई थी। उधर गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने ईमेल के जरिए बताया कि शरण संबंधी फैसले प्रशिक्षित केसवर्कर्स द्वारा ही लिए जाते हैं, और एआई टूल्स का इस्तेमाल केवल इंटरव्यू रिकॉर्ड्स तथा नीतिगत जानकारियों को खंगालने में सहायता के लिए होता है। उनका कहना था कि ये टूल्स अकेले निर्णय नहीं ले सकते और न ही किसी दावे पर अंतिम फैसला सुनाते हैं। विभाग स्थापित गुणवत्ता आश्वासन प्रक्रियाओं के तहत इन टूल्स के प्रदर्शन की लगातार निगरानी कर रहा है और इनके रोलआउट पर अपडेटेड मूल्यांकन प्रकाशित करने की प्रतिबद्धता भी जताई है।\n\n \n\nसटीकता पर सवाल और उच्च स्तर के जोखिम\n\nशोधकर्ताओं ने इन एआई टूल्स की सटीकता को लेकर गहरी चिंता जताई है। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब बात किसी ऐसे व्यक्ति को वापस भेजने जैसे उच्च जोखिम भरे निर्णय की हो जो अपने देश में उत्पीड़न के डर का सामना कर रहा हो। ओपन राइट्स ग्रुप ने पाया कि एसाइलम केस समराइजेशन टूल द्वारा तैयार किए गए उन सारांशों का प्रतिशत काफी अधिक है जिन्हें उपयोग के योग्य नहीं माना गया, अक्सर ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनमें तथ्यात्मक त्रुटियां या गलत प्रस्तुतियां थीं। संगठन ने यह भी पाया कि एसाइलम पॉलिसी सर्च द्वारा तैयार सारांशों के लिए किसी प्रकार की गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था मौजूद नहीं है। अधिकारी समय बचाने के लिए इन टूल्स का सहारा लेते हैं, और सरकारी अनुमानों के मुताबिक दोनों को एक साथ इस्तेमाल करने पर प्रति मामला लगभग एक घंटे की बचत हो सकती है। केसवर्कर्स इंटरव्यू के लंबे ट्रांसक्रिप्ट्स को तेजी से देखने के लिए इनका प्रयोग करते हैं।\n\n \n\nएआई के भ्रम और अदालती मामले\n\nजुलाई के महीने में ब्रिटेन के एक न्यायाधीश ने गृह मंत्रालय पर एक मोरक्को की महिला और उसके बच्चे के शरण दावे को ठुकराने के लिए एआई द्वारा गढ़े गए दस्तावेज का हवाला देने का आरोप लगाया था। यह दावा इस आधार पर खारिज किया गया था कि उसके लिए स्वदेश लौटना सुरक्षित होगा। लेबर पार्टी की सांसद बेल रिबेइरो-अड्डी ने इस स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि हम इंसानों की जिंदगियों के साथ खेल रहे हैं और ऐसे मामलों में फैसले तथ्यों व समझ के आधार पर होने चाहिए न कि मशीनों के भरोसे। इसके अलावा शोधकर्ताओं और विधिक संगठनों को यह भी डर है कि इन मॉडल्स में मौजूद सांस्कृतिक पूर्वाग्रह की वजह से भाषा संबंधी बाधाएं पैदा हो सकती हैं और सारांशों से सांस्कृतिक बारीकियां गायब हो सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप भेदभावपूर्ण फैसले सामने आने की आशंका बनी रहती है। ओपनएआई के एक प्रवक्ता ने इस पर सफाई देते हुए मॉडल की सटीकता में सुधार के लिए चल रहे प्रयासों का जिक्र किया और यह भी बताया कि कंपनी जनवरी में जीपीटी-फोर को सेवानिवृत्त कर रही है।\n\n \n\nनियामक विसंगतियां और गोपनीयता के उल्लंघन\n\nब्रिटेन के एआई प्लेबुक के नियमों के मुताबिक सरकारी विभागों को निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले एल्गोरिदम टूल्स के बारे में पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए और जनता को इनकी जानकारी देनी चाहिए। लेकिन गृह मंत्रालय के ये केस समराइजेशन और पॉलिसी सर्च टूल्स उस सार्वजनिक सूची में शामिल नहीं हैं। शरण चाहने वालों को भी कभी यह नहीं बताया जाता कि उनके मामले में इन तकनीकी टूल्स का उपयोग किया गया है। ओपन राइट्स ग्रुप के डिजिटल जस्टिस प्रोग्राम का नेतृत्व करने वाली सारा अल्शरीफ का कहना है कि प्रवासी संगठनों और वकीलों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, इसलिए उन्हें बताना जरूरी है ताकि वे इसे चुनौती दे सकें। क्लाइटर्स के वकीलों द्वारा तैयार की गई एक स्वतंत्र कानूनी राय के अनुसार व्यक्तिगत जानकारी के गलत एआई सारांश को चुनौती न दे पाना ब्रिटेन के डेटा अधिकारों के कानूनों का उल्लंघन हो सकता है।\n\n \n\nजांच का दायरा और अन्य सरकारी प्रणालियां\n\nइन तमाम निष्कर्षों को दोनों संगठनों ने ब्रिटेन के डेटा नियामक इन्फॉर्मेशन कमिशन के पास भेज दिया है। नियामक फिलहाल इस बात की जांच कर रहा है कि गृह मंत्रालय ने ओपन राइट्स ग्रुप को यह बताने से क्यों इनकार किया कि उसके कर्मचारी इन दो एआई टूल्स का इस्तेमाल और प्रशिक्षण कैसे लेते हैं। पब्लिक लॉ प्रोजेक्ट की सीनियर रिसर्च फेलो कैरोलाइन सेलमन ने बताया कि उनकी टीम ने सरकार के भीतर ग्यारह ऐसे हाई-रिस्क एआई सिस्टम्स का पता लगाया है जो उपयोग में तो हैं लेकिन सार्वजनिक रिपॉजिटरी से गायब हैं। उन्हें इस बात की भी आशंका है कि ऐसे और भी कई टूल्स तैनात किए गए होंगे जिनके बारे में शोधकर्ताओं को तो दूर, उन लोगों को भी कोई खबर नहीं है जिन पर इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। सेलमन का कहना है कि जब तक आपको यह पता ही नहीं होगा कि कोई चीज इस्तेमाल हो रही है, तब तक आप उसके बारे में कोई सवाल नहीं उठा सकते।\n\nइसका आप पर असर\nब्रिटेन के आव्रजन और शरण प्रणाली में एआई टूल्स के इस्तेमाल से जुड़े इस मामले का असर सीधे तौर पर उन हजारों आवेदकों पर पड़ सकता है जो देश में शरण मांग रहे हैं।\n\n• ब्रिटेन में: शरण प्रक्रियाओं में एआई के प्रयोग से निर्णयों की पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है, जिससे आवेदकों के लिए गलत फैसलों को चुनौती देना कठिन हो जाएगा।\n\n• कानूनी प्रक्रियाओं में: वकीलों और मानवाधिकार संगठनों को आव्रजन मामलों में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों की मैपिंग और जांच के लिए नए कानूनी संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है।\n\n• डेटा सुरक्षा में: इस खुलासे के बाद ब्रिटेन के डेटा नियामक द्वारा सरकारी विभागों में एल्गोरिदम के इस्तेमाल पर कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं।\n\n• नीतिगत स्तर पर: गृह मंत्रालय को अपनी लंबित फाइलों के निपटारे के लिए अपनाई जाने वाली डिजिटल कार्यप्रणाली में बदलाव करना पड़ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nगृह मंत्रालय द्वारा एआई टूल्स के इस्तेमाल और उसके बाद शुरू हुई जांच के पीछे वर्षों से जमा हुआ भारी प्रशासनिक बैकलॉग और समय बचाने की मजबूरी मुख्य कारण रही है।\n\n• मामलों का बैकलॉग: लेबर सरकार के कार्यकाल के दौरान लगभग एक लाख शरण मामलों के बैकलॉग को तेजी से निपटाने के दबाव में इन टूल्स को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शामिल किया गया था।\n\n• समय की बचत: अधिकारियों को इंटरव्यू के लंबे ट्रांसक्रिप्ट्स और देश से जुड़ी नीतियों को पढ़ने में घंटों का समय लगता था, जिसे कम करने के लिए ओपनएआई आधारित प्रणालियों का सहारा लिया गया।\n\n• पारदर्शिता की कमी: सरकारी विभागों द्वारा एआई प्लेबुक के नियमों के बावजूद अपने एल्गोरिदम टूल्स को सार्वजनिक रिपॉजिटरी में शामिल न करने से यह विवाद और गहरा गया।\n\n• मानवाधिकार चिंताएं: टूल्स में तथ्यात्मक त्रुटियों और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों की शिकायतों के बाद डिजिटल अधिकार संगठनों ने इस मामले को नियामक के सामने उठाया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गृह मंत्रालय किन एआई टूल्स का उपयोग कर रहा है?\nगृह मंत्रालय एसाइलम केस समराइजेशन और एसाइलम पॉलिसी सर्च टूल्स का उपयोग कर रहा है।\n\n2. ये टूल्स किस तकनीक पर आधारित हैं?\nये टूल्स ओपनएआई के दो हजार तेईस के जीपीटी-फोर लार्ज लैंग्वेज मॉडल और माइक्रोसॉफ्ट फाउंड्री पर आधारित हैं।\n\n3. इन टूल्स को क्यों लाया गया था?\nसरकार द्वारा शरण मामलों के बड़े बैकलॉग को तेजी से निपटाने और अधिकारियों का समय बचाने के लिए इन्हें लाया गया था।\n\n4. शोधकर्ताओं और संगठनों को क्या आपत्ति है?\nसंगठनों को इन टूल्स में तथ्यात्मक त्रुटियों, गुणवत्ता नियंत्रण की कमी और पारदर्शिता न होने पर आपत्ति है।\n\n5. इस मामले की जांच कौन कर रहा है?\nस्वतंत्र मुख्य निरीक्षक आईसीआईबीआई मामले की जांच के योजनाओं पर विचार कर रहा है और डेटा नियामक भी इसकी जांच कर रहा है।",
  "url": "https://trendkia.com/ai/uk-home-office-faces-potential-investigation-over-openai-tool-usage-52352",
  "category": "एआई",
  "publishedAt": "2026-10-27",
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