व्हाइट हाउस में टेक दिग्गजों की चुप्पी के बीच ट्रंप का फरमान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जगह कहलाएगा सुपर इंटेलिजेंस व्हाइट हाउस में शीर्ष टेक अधिकारियों के साथ बैठक के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने कार्यकारी आदेश जारी कर 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए सरकारी स्तर पर इसे 'सुपर इंटेलिजेंस' नाम दे दिया है। अमेरिकी सत्ता के शीर्ष केंद्र व्हाइट हाउस में आयोजित एक विशेष दोपहर के भोजन के दौरान तकनीकी जगत की सबसे बड़ी शब्दावली को बदलने का अभूतपूर्व प्रशासनिक कदम उठाया गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने देश के सबसे प्रभावशाली तकनीकी उद्योगपतियों की मौजूदगी में एक नया कार्यकारी आदेश जारी करते हुए स्थापित शब्दावली 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' यानी एआई को सरकारी इस्तेमाल से बाहर करने का फरमान सुनाया। इस आदेश के तहत अब अमेरिकी सरकार इस पूरी तकनीकी विधा और उद्योग को 'सुपर इंटेलिजेंस' के नाम से संबोधित करेगी। प्रशासन का स्पष्ट रुख है कि निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां भी सरकारी तंत्र के इस नए नामकरण का पालन करें और अपनी शब्दावली में बदलाव लाएं। सात दशक पुरानी वैज्ञानिक पहचान को बदलने का प्रशासनिक आदेश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द कोई हालिया खोज नहीं है, बल्कि इसका इतिहास लगभग सात दशकों पुराना है। सन 1956 में मैकार्थी ने मशीनी बुद्धिमत्ता को प्राकृतिक मानवीय बौद्धिक क्षमता से अलग रेखांकित करने के लिए इस संज्ञा को औपचारिक रूप दिया था। वर्षों से यह शब्दावली शोधकर्ताओं, कंप्यूटर वैज्ञानिकों और आधुनिक सॉफ्टवेयर कंपनियों की मूल पहचान बनी रही है। कंप्यूटर विज्ञान की किताबों, शुरुआती शोध पत्रों और आधुनिक तकनीकी ढांचों की नींव इसी नाम पर रखी गई। लेकिन वर्तमान प्रशासनिक बदलाव के तहत इस स्थापित वैज्ञानिक पहचान को अचानक अप्रासंगिक ठहराने की कोशिश की गई है। इस बदलाव की शुरुआती पृष्ठभूमि संयुक्त राष्ट्र में दिए गए एक संबोधन से जुड़ी है। 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में भाषण देते हुए राष्ट्रपति ने सबसे पहले इस बात के संकेत दिए थे कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द को विदा करना चाहते हैं। उस दौरान उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए तर्क दिया था कि 'आर्टिफिशियल' शब्द बुद्धि को जाली या नकली दिखाता है, जबकि यह तकनीक नकली नहीं है। व्हाइट हाउस में टेक दिग्गजों के साथ लंच के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए राष्ट्रपति ने दोहराया कि 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' एक फर्जी, अनुपयुक्त और गलत शब्दावली है, इसलिए इसे दुनिया के सबसे चतुर और सबसे महान लोगों की सहमति से बदला गया है। जानकारों का मानना है कि शब्दों को फर्जी करार देने की यह मानसिकता बिल्कुल उसी प्रवृत्ति से जुड़ी है जिसके चलते पूर्व में सीएनएन, पोलिटिको और एमएसनाउ जैसे मीडिया समूहों को व्हाइट हाउस से हटाया गया था। शीर्ष टेक अरबपतियों की रहस्यमयी चुप्पी व्हाइट हाउस के इस कार्यक्रम में दुनिया की सबसे मूल्यवान तकनीकी कंपनियों का नेतृत्व करने वाले चेहरे मौजूद थे। इस बैठक में जेफ बेजोस, जेन्सन हुआंग, डारियो अमोदेई, मार्क जुकरबर्ग, सुंदर पिचाई, ग्रेग ब्रॉकमैन, एलेक्स कार्प और एलन मस्क शामिल हुए। ये वे उद्योगपति हैं जिनकी कंपनियां खरबों डॉलर के पूंजीकरण पर खड़ी हैं और जिन्होंने पिछले चार वर्षों में अपने पूरे कारोबारी तंत्र को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है। उनके अपने शुरुआती जीवन में विज्ञान कथाओं से उपजी कल्पनाओं ने इसी शब्दावली के दम पर आकार लिया था। हैरानी की बात यह रही कि राष्ट्रपति के इस अप्रत्याशित सुझाव और आदेश पर कमरे में मौजूद किसी भी दिग्गज ने सार्वजनिक रूप से कोई असहमति या विरोध दर्ज नहीं कराया। 'प्रोफाइल्स इन कावर्डिस: ए स्टडी ऑफ कोलैबोरेशन इन द ट्रंप एरा' पुस्तक के लेखक जैकब वीसबर्ग ने इस घटनाक्रम को एक क्लासिक लॉयल्टी टेस्ट यानी वफादारी की परीक्षा करार दिया है। वीसबर्ग का विश्लेषण है कि इस तरह के कदमों का मकसद यह परखना होता है कि शक्तिशाली लोग राष्ट्रपति के गुस्से से बचने और उनके साथ संबंध बनाए रखने के लिए किस हद तक झुक सकते हैं। वीसबर्ग के अनुसार, यदि इन सभी उद्योगपतियों ने सामूहिक रूप से एक साथ खड़े होकर कहा होता कि वे स्व-नियमन की शर्तों को तो स्वीकार करते हैं लेकिन नाम बदलने के इस फैसले को नहीं मानेंगे, तो राष्ट्रपति के पास पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन उद्योगपतियों की मौन स्वीकृति के चलते प्रशासनिक नेतृत्व ने यह दावा कर दिया कि इन उद्योगपतियों ने खुद आगे बढ़कर इस नाम परिवर्तन को अपना आशीर्वाद दिया है। कंपनियों की मौजूदा ब्रांडिंग और उत्पादों में एआई का दखल आधुनिक उत्पाद श्रृंखलाओं में इस नाम की जड़ें बेहद गहरी हैं। चैटजीपीटी या जेमिनी जैसी अत्याधुनिक तकनीकी प्रणालियों के सार्वजनिक रिकॉर्ड में भी ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जहां इन तकनीकी अगुआओं ने कभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द को खत्म करने की औपचारिक वकालत की हो। हालांकि एक बार सत्या नडेला ने यह विचार व्यक्त किया था कि वे एआई को 'डिफरेंट इंटेलिजेंस' कहना ज्यादा पसंद करते, लेकिन इसके बावजूद वे लगातार अपनी आधिकारिक चर्चाओं में एआई शब्द का ही उपयोग करते रहे हैं। इसी तरह मार्क जुकरबर्ग ने हाल ही में एक सुपरइंटेलिजेंस लैब की स्थापना जरूर की है, मगर उनकी कंपनी मेटा अपने अरबों वैश्विक उपयोगकर्ताओं के बीच मुख्य रूप से मेटा एआई के नाम से सेवाएं देती है और बाजार में अपने हार्डवेयर को एआई ग्लासेस के रूप में ही बेचती है। जब गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एंथ्रोपिक, मेटा, अमेज़न, ओपनएआई और एक्सएआई से यह सवाल किया गया कि क्या वे अपने शोध पत्रों, उत्पादों और संगठनात्मक पहचान से एआई शब्द को हटाने जा रहे हैं, तो किसी भी कंपनी ने इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया। न ही ओपनएआई और एक्सएआई ने अपने कॉरपोरेट नाम में बदलाव को लेकर कोई संकेत दिया है। उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि ये टेक दिग्गज राष्ट्रपति की नाराजगी से बचने के लिए न्यूनतम दिखावटी कदम उठा सकते हैं और समय बीतने का इंतजार कर रहे हैं ताकि भविष्य का कोई अन्य प्रशासन इस फैसले को समाप्त कर दे। वैज्ञानिक परिभाषाओं की उलझन और विशेषज्ञों की राय वैज्ञानिक नजरिए से 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' की जगह 'सुपर इंटेलिजेंस' शब्द को थोपना पूरी तकनीकी व्यवस्था को भ्रम में डालता है। 'सुपरइंटेलिजेंस' पुस्तक के जरिए इस अवधारणा को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाने वाले प्रसिद्ध दार्शनिक निक बोस्ट्रॉम ने इस बदलाव पर स्पष्ट असहमति जताई है। बोस्ट्रॉम के अनुसार, सुपरइंटेलिजेंस शब्द तकनीकी रूप से केवल उन विशिष्ट प्रणालियों के लिए आरक्षित है जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मानव मस्तिष्क की क्षमताओं को भी बहुत बड़े अंतर से पीछे छोड़ देती हैं। इसके विपरीत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक बेहद व्यापक श्रेणी है जिसके दायरे में सामान्य ईमेल स्पैम फिल्टर, स्पेल चेकर, बुनियादी नेविगेशन टूल, शुरुआती लार्ज लैंग्वेज मॉडल और सत्तर के दशक के वे शतरंज इंजन भी आते हैं जो उस समय के सर्वश्रेष्ठ मानव खिलाड़ियों की बराबरी तक नहीं कर पाते थे। ऐसे सामान्य और बुनियादी तकनीकी औजारों को सुपरइंटेलिजेंट कहना वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह अटपटा और अनुचित है। इसके अलावा विशेषज्ञों का तर्क है कि 'सुपर इंटेलिजेंस' शब्द आम लोगों के मन में तकनीकी नियंत्रण और सुरक्षा को लेकर मूल शब्द से कहीं ज्यादा बड़ा डर पैदा करता है। कड़े नियमों से बचने का सौदा और भविष्य के सवाल इस पूरे प्रकरण का दूसरा पहलू नियमन और निगरानी से जुड़ा है। बैठक में शामिल कंपनियों को कड़े सरकारी कानूनी प्रतिबंधों के बजाय अपनी नीतियों का स्व-नियमन करने की महत्वपूर्ण रियायत मिल गई। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्वतंत्र अस्तित्व का दावा करने वाले इन कॉर्पोरेट दिग्गजों ने नीतिगत छूट के बदले अपनी गरिमा और बौद्धिक स्वतंत्रता का समझौता कर लिया। दूसरी ओर कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने ट्रंप के फैसले के विपरीत रुख अपनाते हुए अपने स्वयं के कार्यकारी आदेश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द के प्रयोग को जारी रखने की बात कही है। व्यावहारिक धरातल पर समस्या यह नहीं है कि लोग मशीनी बुद्धिमत्ता को नकली समझते हैं। हकीकत यह है कि यह तकनीक इतनी प्रभावी और वास्तविक प्रतीत होती है कि आम इंसान कई बार यह पहचान नहीं पाता कि सामने वाला मॉडल है या कोई जीवित व्यक्ति। ऐसे में पारदर्शी लेबलिंग और वॉटरमार्किंग जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की जानी चाहिए थीं, जिनसे प्रशासन दूर भागता दिखाई देता है। जब उद्योगपति एक बुनियादी वैज्ञानिक नाम की रक्षा करने की रीढ़ नहीं दिखा सके, तो जनता के लिए यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि वे मुनाफा कमाने की होड़ और वित्तीय दबावों के बीच सुरक्षा मानकों को प्राथमिकता देते हुए स्वैच्छिक नियमों का ईमानदारी से पालन करेंगे। इसका आप पर असर अमेरिकी सरकार द्वारा 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' की जगह 'सुपर इंटेलिजेंस' शब्दावली थोपने और टेक कंपनियों को स्व-नियमन की छूट मिलने से वैश्विक तकनीकी उपभोक्ताओं और डेवलपर्स पर सीधा असर पड़ेगा। • उपभोक्ताओं पर प्रभाव: सामान्य डिजिटल सेवाओं और गैजेट्स में अचानक 'सुपर इंटेलिजेंस' ब्रांडिंग दिखाई देने से तकनीकी जटिलता को लेकर उपयोगकर्ताओं में भ्रम बढ़ सकता है। बुनियादी टूल्स और शक्तिशाली मॉडलों के बीच भेद करना आम यूजर के लिए अधिक कठिन हो जाएगा। • डेवलपर्स और शोधकर्ताओं पर: वैश्विक शोध पत्रों और तकनीकी मानकों में 70 वर्षों से चली आ रही शब्दावली के विभाजन से नीतिगत कागजी कार्रवाई बढ़ जाएगी। अमेरिकी सरकारी अनुबंधों के लिए काम करने वाली तकनीकी टीमों को अपनी फाइलिंग और शब्दावली में अनिवार्य बदलाव करने पड़ेंगे। • तकनीकी सुरक्षा और विनियमन पर: कंपनियों को सख्त कानूनी जवाबदेही के बदले स्वैच्छिक स्व-नियमन की छूट मिलने से सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र जांच कमजोर हो सकती है। डीपफेक, वॉटरमार्किंग और डेटा प्राइवेसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कंपनियों पर बाहरी सरकारी दबाव कम हो जाएगा। • वैश्विक तकनीकी बाजार में: अमेरिकी संघीय तंत्र और कैलिफोर्निया जैसे बड़े राज्यों के बीच शब्दावली और नियमों के टकराव से कॉरपोरेट नीतियां उलझेंगी। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार और अमेरिकी सरकारी तंत्र के लिए अलग-अलग संचार नीतियां रखनी पड़ सकती हैं। ऐसा क्यों हुआ यह नीतिगत बदलाव राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप की निजी प्राथमिकताओं, तकनीकी उद्योग पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की रणनीति और टेक कंपनियों द्वारा सख्त नियमों से बचने की कोशिशों के चलते हुआ। • शब्दावली को लेकर राष्ट्रपति का व्यक्तिगत दृष्टिकोण: राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से तर्क दिया कि 'आर्टिफिशियल' शब्द बुद्धि को फर्जी या अवास्तविक दर्शाता है, जो उन्हें अनुचित लगता है। इसी आधार पर उन्होंने 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में भाषण के दौरान पहली बार इस नाम को बदलने का विचार रखा था। • राजनीतिक वफादारी की परीक्षा: राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शक्तिशाली कॉरपोरेट हस्तियों के सामने एक अजीबोगरीब मांग रखकर यह परखा गया कि क्या वे प्रशासनिक नाराजगी के डर से झुकने को तैयार हैं। अरबपतियों के मौन रहने से प्रशासन को अपनी सर्वोच्चता साबित करने का मंच मिल गया। • सख्त कानूनों से बचने का कॉरपोरेट समझौता: टेक कंपनियों ने भारी सरकारी बंदिशों और सख्त कानूनी नियमों से बचने के लिए नाम परिवर्तन के इस विचार का विरोध नहीं किया। इसके बदले में उन्हें अपनी प्रणालियों का स्व-नियमन करने की महत्वपूर्ण आजादी मिल गई। • वैज्ञानिक परिभाषाओं की अनदेखी: कंप्यूटर विज्ञान में 1956 से स्थापित 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' और विशिष्ट 'सुपरइंटेलिजेंस' के बीच के बुनियादी अंतर को नजरअंदाज करके यह कार्यकारी आदेश जारी किया गया। विशेषज्ञों द्वारा सवाल उठाए जाने के बावजूद प्रशासनिक फैसले को प्राथमिकता दी गई। सवाल-जवाब 1. व्हाइट हाउस के कार्यकारी आदेश में क्या निर्देश दिया गया है? कार्यकारी आदेश के अनुसार सरकारी स्तर पर 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है और इसके स्थान पर 'सुपर इंटेलिजेंस' का उपयोग अनिवार्य किया गया है। 2. व्हाइट हाउस लंच में कौन-कौन से प्रमुख टेक दिग्गज मौजूद थे? बैठक में जेफ बेजोस, जेन्सन हुआंग, डारियो अमोदेई, मार्क जुकरबर्ग, सुंदर पिचाई, ग्रेग ब्रॉकमैन, एलेक्स कार्प और एलन मस्क शामिल हुए थे। 3. राष्ट्रपति ने 'आर्टिफिशियल' शब्द पर क्या आपत्ति जताई थी? उन्होंने कहा कि 'आर्टिफिशियल' शब्द बुद्धिमत्ता को नकली या जाली बनाता है, जबकि यह तकनीक वास्तविक है, इसलिए इसे फर्जी और अनुपयुक्त शब्द माना गया। 4. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से निक बोस्ट्रॉम ने इस बदलाव पर क्या कहा? निक बोस्ट्रॉम के अनुसार, सुपरइंटेलिजेंस केवल इंसानी दिमाग को पीछे छोड़ने वाली प्रणालियों के लिए होता है, जबकि स्पैम फिल्टर और साधारण प्रोग्राम्स को यह कहना पूरी तरह अनुचित है। 5. कंपनियों ने इस आदेश का विरोध क्यों नहीं किया? विश्लेषकों का मानना है कि टेक कंपनियों ने सख्त सरकारी नियमों से बचने और स्व-नियमन की रियायत हासिल करने के लिए प्रशासनिक नाराजगी से बचते हुए चुप्पी साधे रखी। 6. क्या टेक कंपनियों ने अपने उत्पादों से एआई शब्द हटाने पर सहमति दी है? गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेज़न, ओपनएआई और एक्सएआई जैसी कंपनियों ने अपने उत्पादों या रिसर्च पेपर्स से एआई हटाने के सवाल पर कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया है। 7. कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम का इस पर क्या रुख रहा? कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने अपने आदेश के जरिए ट्रंप प्रशासन के रुख का विरोध करते हुए 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' शब्द के प्रयोग की स्वतंत्रता का समर्थन किया। https://trendkia.com/ai/vhaita-hausa-men-teka-diggajon-ki-chuppi-ke-bicha-trump-ka-pharamana-artificial-intelligence-ki-jagaha-kahalaega-super-intelligenc-42011 TrendKia — Har trend, sabse pehle.