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  "type": "article",
  "title": "अमेरिकी सीनेटर अब्दुल एल-सैयद ने पाकिस्तान और मिस्र को दी जाने वाली मदद पर उठाए गंभीर सवाल",
  "summary": "अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर चुने गए अब्दुल एल-सैयद ने कहा है कि वाशिंगटन को उन देशों की सैन्य और आर्थिक मदद पर फिर से विचार करना चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं। इस सूची में उन्होंने इजरायल के साथ पाकिस्तान, मिस्र और जॉर्डन का भी नाम लिया है।",
  "content": "अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में उस समय बड़ी चर्चा शुरू हो गई जब नवनिर्वाचित मुस्लिम सीनेटर ने देश की विदेश नीति और विदेशी सहायता को लेकर तीखा रुख अपनाया। अमेरिका में पहली बार मुस्लिम सीनेटर के रूप में चुने गए अब्दुल एल-सैयद ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक और सैन्य मदद पर सीधे तौर पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके इस बयान के बाद इस्लामाबाद की मुश्किलें और चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका की तरफ से मिलने वाली फंडिंग पर अब वहां के जनप्रतिनिधियों द्वारा ही कड़ी नजर रखी जा रही है।\n\nअब्दुल एल-सैयद ने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका को उन सभी देशों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता की समीक्षा करनी चाहिए, जिन पर अमेरिकी धन का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ करने का संदेह या आरोप है। खास बात यह है कि उन्होंने इस दायरे में केवल पश्चिम एशिया के देशों को ही नहीं रखा, बल्कि पाकिस्तान, मिस्र और जॉर्डन को भी समान रूप से शामिल किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका से मदद हासिल करने वाले देशों की फेरहिस्ट में अब पाकिस्तान की भूमिका और उसके तौर-तरीकों पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं।\n\nमिशिगन में चुनाव जीतकर रचा इतिहास\nडेमोक्रेटिक पार्टी से ताल्लुक रखने वाले अब्दुल एल-सैयद ने हाल ही में मिशिगन में हुए चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार माइक रोजर्स को करारी शिकस्त देकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया है। वह अमेरिकी सीनेट तक पहुंचने वाले पहले मुस्लिम सांसद बन चुके हैं। अपनी इस ऐतिहासिक जीत के तुरंत बाद उन्होंने अमेरिकी विदेश नीति, वैश्विक कूटनीति और अन्य देशों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर खुलकर अपने विचार रखे। उनका मुख्य तर्क यह है कि अमेरिकी करदाताओं यानी टैक्सपेयर्स के गाढ़े पसीने की कमाई का एक-एक पैसा ऐसे कार्यों में खर्च नहीं होना चाहिए जो वैश्विक मानदंडों और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ जाते हों।\n\nपाकिस्तान और अन्य देशों को लेकर क्या बोले सीनेटर\nएक प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थान एबीसी को दिए गए साक्षात्कार में अब्दुल एल-सैयद ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके खुद के कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में और उसके अनुकूल हों। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरी बहस को केवल एक देश या इजरायल तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनका यही दृष्टिकोण मिस्र के प्रति भी है, जहां से उनका परिवार ताल्लुक रखता है और अमेरिका आया था। इसी कड़े रुख के साथ उन्होंने पाकिस्तान और जॉर्डन का भी जिक्र किया। उनका मानना है कि जब अमेरिका किसी अन्य देश को वित्तीय मदद मुहैया कराता है और वह देश उस राशि का उपयोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ताक पर रखकर काम करने में करता है, तो इस तरह की सहायता को रोकने की शुरुआत तुरंत वहीं से की जानी चाहिए।\n\nयह बयान पाकिस्तान के लिए भूराजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों और वैश्विक संस्थाओं के सामने इस्लामाबाद को मिलने वाली भारी-भरकम आर्थिक और सैन्य मदद पर सवाल उठाता रहा है। भारत की यह चिंता हमेशा से रही है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और देशों से मिलने वाले धन का दुरुपयोग पाकिस्तान के भीतर आतंकवाद को बढ़ावा देने या अन्य अवांछित सैन्य गतिविधियों को अंजाम देने के लिए किया जाता रहा है।\n\nइजरायल को मिलने वाली सैन्य सहायता पर भी रुख\nकेवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि अब्दुल एल-सैयद ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस योजना का भी खुलकर समर्थन किया है जिसके तहत इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता में कटौती करने का प्रस्ताव है। उन्होंने कहा कि इस विशेष नीति पर राष्ट्रपति का रुख पूरी तरह से सही दिशा में है। उन्होंने अमेरिकी हथियारों की बिक्री पर भी रोक लगाने की पुरजोर मांग उठाई है। उनका तर्क है कि अमेरिका की तरफ से भेजे जाने वाले कुछ हथियारों का इस्तेमाल ऐसे अभियानों में हो रहा है जिसे उन्होंने नरसंहार और रंगभेद जैसी गंभीर श्रेणियों से जोड़ा है।\n\nवर्तमान समय में अमेरिका एक आधिकारिक समझौते के तहत इजरायल को हर साल 3.8 अरब डॉलर की भारी-भरकम सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है। यह समझौता वर्ष 2028 तक पूरी तरह से लागू रहना है। दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल के अंत तक इजरायल को मिलने वाली लगभग 4 अरब डॉलर की सालाना सैन्य सहायता को पूरी तरह समाप्त करने की योजना का सार्वजनिक ऐलान किया है। अब्दुल एल-सैयद का मानना है कि अमेरिका को अपनी विदेश नीति का संचालन करते समय एक समान और पारदर्शी पैमाना अपनाना चाहिए। यदि किसी विदेशी राष्ट्र को अमेरिकी मदद मिल रही है, तो कड़ाई से यह भी जांचा जाना चाहिए कि उस धन का वास्तविक उपयोग किस काम में किया जा रहा है।\n\nसऊदी अरब समेत इन देशों की मदद पर भी सवालिया निशान\nपाकिस्तान, मिस्र और जॉर्डन के अलावा अब्दुल एल-सैयद ने सऊदी अरब को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य मदद पर भी कड़े सवाल उठाए हैं। उनका मजबूत मानना है कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों का इस्तेमाल विदेशी युद्धों या विवादों में झोंकने के बजाय देश के भीतर की बुनियादी और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने में किया जाना चाहिए। उनका यह रुख इसलिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका दशकों से पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के तमाम देशों को लगातार आर्थिक और सैन्य सहायता पहुंचाता रहा है। एल-सैयद चाहते हैं कि इस तरह की मदद बिना किसी शर्त के यूं ही जारी रखने के बजाय इसकी सख्त जवाबदेही तय की जाए।\n\nइसका आप पर असर\nइस बयान का असर सीधे तौर पर अमेरिका की विदेशी सहायता नीतियों और कूटनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है।\n\n• अंतरराष्ट्रीय कूटनीति: अमेरिका द्वारा पाकिस्तान, मिस्र और जॉर्डन को मिलने वाली सैन्य व आर्थिक मदद की समीक्षा की मांग से वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है।\n• घरेलू राजनीति: अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों के इस्तेमाल को लेकर उठ रहे सवालों से भविष्य में विदेशी सहायता विधेयकों पर कड़े प्रतिबंध लग सकते हैं।\n• क्षेत्रीय प्रभाव: यदि वाशिंगटन प्रशासन इन देशों को दी जाने वाली फंडिंग में फेरबदल करता है, तो दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के रणनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह राजनीतिक रुख अमेरिका के नए जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं और बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं के कारण सामने आया है।\n\n• बदला हुआ नेतृत्व: मिशिगन में चुनाव जीतकर सीनेट पहुंचे अब्दुल एल-सैयद जैसे नए नेताओं ने पारंपरिक विदेश नीति के बजाय घरेलू प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर दिया है।\n• वैश्विक मानवाधिकार चिंताएं: दुनिया भर में सैन्य सहायता के दुरुपयोग और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन के मामलों को लेकर अमेरिका के भीतर लगातार जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।\n• टैक्सपेयर्स की भावनाएं: अमेरिकी नागरिकों द्वारा अपने करों का उपयोग देश के भीतर बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के पक्ष में किए जाने के दबाव के कारण यह मुद्दा प्राथमिकता में आया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अब्दुल एल-सैयद कौन हैं?\nअब्दुल एल-सैयद डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता हैं जिन्होंने मिशिगन में रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को हराकर अमेरिका की सीनेट में पहुंचने वाले पहले मुस्लिम सांसद के रूप में इतिहास रचा है।\n\n2. उन्होंने किन देशों को दी जाने वाली मदद पर सवाल उठाए हैं?\nउन्होंने इजरायल के साथ-साथ पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन और सऊदी अरब को दी जाने वाली आर्थिक और सैन्य मदद पर सवाल उठाए हैं।\n\n3. एल-सैयद का मुख्य तर्क क्या है?\nउनका तर्क है कि अमेरिकी करदाताओं का पैसा ऐसे कार्यों में इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हों और विदेशी सहायता की कड़ी जवाबदेही तय होनी चाहिए।\n\n4. इजरायल को वर्तमान में कितनी मदद मिलती है?\nअमेरिका एक समझौते के तहत इजरायल को हर साल 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है, जो 2028 तक लागू है।",
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