# ईरान में शासन बदले बिना सुरक्षित नहीं हो सकता भारत-यूरोप कॉरिडोर, जॉन बोल्टन ने ट्रंप की नीति पर उठाए सवाल

> अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा कि जब तक ईरान में शासन नहीं बदलता, तब तक इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर और समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित नहीं हो सकते। उन्होंने ट्रंप प्रशासन की क्षेत्रीय रणनीति को कमजोर बताया।

**Type:** article · **Category:** अमेरिका · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/america/iran-men-shasana-badale-bina-surakshita-nahin-ho-sakata-india-europe-corridor-john-bolton-ne-trump-ki-niti-para-uthae-savala-37509 · **Language:** Hindi
**Tags:** जॉन बोल्टन, डोनाल्ड ट्रंप, ईरान, आईएमईसी, मध्य पूर्व, वैश्विक व्यापार, अमेरिकी विदेश नीति

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी को नई दिशा देने के मकसद से तैयार किए गए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की आर्थिक संभावनाओं की जहां चौतरफा चर्चा हो रही है, वहीं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने इसकी जमीनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है। जॉन बोल्टन का मानना है कि जब तक तेहरान में सत्ता परिवर्तन नहीं होता, तब तक मध्य पूर्व के समुद्री मार्गों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, वर्तमान भू-राजनीतिक हालात में इस गलियारे के जरिए बिना रुकावट व्यापार की उम्मीद करना आसान नहीं होगा।

## वर्ष 2023 में रखी गई थी कॉरिडोर की रूपरेखा
साल 2023 में औपचारिक रूप से सामने आए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को मुख्य रूप से दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है। इसमें एक ईस्टर्न कॉरिडोर है, जो भारत को अरब की खाड़ी से जोड़ता है। वहीं दूसरा नॉर्दर्न कॉरिडोर है, जिसका काम खाड़ी क्षेत्र को सीधे यूरोप से जोड़ना है। भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच इस तरह की व्यापारिक साझेदारी को रणनीतिक नजरिए से एक स्वाभाविक और तार्किक विकास माना जा रहा है।

## ट्रंप प्रशासन के पास व्यापक रणनीति की कमी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस कॉरिडोर को दिए जा रहे समर्थन और उनकी विदेश नीति की दिशा पर टिप्पणी करते हुए जॉन बोल्टन ने कड़ा रुख अपनाया। बोल्टन का कहना है कि प्रशासन के पास किसी ठोस और समग्र क्षेत्रीय रणनीति का अभाव है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान अमेरिकी नेतृत्व भू-राजनीतिक चुनौतियों को समग्रता में देखने के बजाय अलग-थलग करके आंकता है, जिससे दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीतियां कमजोर पड़ जाती हैं।

## समुद्री रास्तों के चोक पॉइंट्स पर मंडराता संकट
जॉन बोल्टन ने चेतावनी दी कि भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच नजदीकी संबंध एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन सुरक्षा की अनदेखी करके व्यापारिक सफलता हासिल नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि ईरान से उत्पन्न होने वाले खतरों के कारण अंतरराष्ट्रीय समुद्र में स्थित प्रमुख चोक पॉइंट्स पर व्यापारिक जहाजों की आवाजाही कभी भी संकट में घिर सकती है। जब तक जलडमरूमध्य सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक वैश्विक माल ढुलाई स्थिर नहीं रह सकती।

## ईरान की वर्तमान सरकार को बताया मुख्य अड़चन
मध्य पूर्व में यूरोपीय देशों और भारत की बढ़ती साझेदारी को समझदारी भरा कदम बताते हुए बोल्टन ने पूरी समस्या के केंद्र में ईरान की वर्तमान हुकूमत को रखा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मध्य पूर्व में शांति, सुरक्षा और स्थिरता के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट वहां का मौजूदा शासन है। बोल्टन का दावा है कि जब तक तेहरान की बागडोर वहां के आम नागरिकों के हाथों में नहीं आती, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती।

## हॉर्मुज और बाब अल-मन्दब पर सीधा असर
बोल्टन ने समुद्री मार्गों का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि मौजूदा दौर में केवल स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज ही नहीं, बल्कि लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य में भी सुरक्षा का गहरा संकट बना हुआ है। इस पूरे समुद्री इलाके से गुजरने वाला हर व्यापारिक जहाज संभावित खतरे के दायरे में है। ऐसे में ईरान की मौजूदा नीतियों को बदले बिना किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार कॉरिडोर का सुचारू संचालन लगभग असंभव रहेगा।

## डोनाल्ड ट्रंप पहले जता चुके हैं कॉरिडोर को समर्थन
दूसरी तरफ, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस कॉरिडोर के पक्ष में मजबूती से अपनी बात रख चुके हैं। ट्रंप का कहना रहा है कि ईरान के आक्रामक रुख ने दुनिया को साफ दिखा दिया है कि मध्य पूर्व के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को ईरानी चेकपॉइंट्स के प्रभाव से दूर ले जाना बेहद जरूरी है। इसी सोच के तहत ट्रंप प्रशासन ने इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर और पाइपलाइन जैसे ऊर्जा निकासी के वैकल्पिक रास्तों का पुरजोर समर्थन किया है, ताकि वैश्विक व्यापार को सुरक्षित रखा जा सके।

## इसका आप पर असर
मध्य पूर्व के व्यापारिक समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर उठे सवाल वैश्विक माल ढुलाई लागत और ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित कर सकते हैं।

- **भारत में:** मध्य पूर्व से कच्चे तेल के आयात और यूरोप को होने वाले भारतीय निर्यात के समुद्री मार्ग सुरक्षित न रहने पर घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। आयात पर निर्भर उद्योगों को लंबे या महंगे वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ सकता है।
- **वैश्विक निवेशकों के लिए:** प्रमुख व्यापारिक समुद्री मार्गों पर लगातार बने तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियों का बीमा प्रीमियम ऊंचा बना रह सकता है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में सामान पहुंचने में देरी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
- **ऊर्जा बाजार के लिए:** हॉर्मुज और बाब अल-मन्दब जैसे संवेदनशील चोक पॉइंट्स पर जोखिम बढ़ने से कच्चे तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अचानक उछाल आ सकता है। ऊर्जा आयातक देशों को अपनी रणनीतिक भंडारण योजनाओं पर नए सिरे से ध्यान देना होगा।
- **कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर:** भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप आर्थिक गलियारे की प्रगति में सुरक्षा गारंटी एक अहम पैमाना बनेगी। बुनियादी ढांचा तैयार कर रही बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भू-राजनीतिक जोखिमों का पहले से वित्तीय आकलन करना पड़ेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह बयान मध्य पूर्व के अहम समुद्री रास्तों पर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर उठ रही आशंकाओं और अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में मतभेद के चलते सामने आया है।

- **सीधा कारण:** पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन का आकलन है कि तेहरान में सरकार बदले बिना मध्य पूर्व के समुद्री चोक पॉइंट्स पर व्यापार पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को ठोस क्षेत्रीय रणनीति से रहित बताया।
- **भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि:** लाल सागर और अरब की खाड़ी से जुड़े संवेदनशील जलडमरूमध्य जैसे बाब अल-मन्दब और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज लगातार सैन्य तनाव और हमलों की जद में रहे हैं। इससे वैश्विक शिपिंग लेन पर वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को लगातार जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।
- **नीतिगत मतभेद:** राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस कॉरिडोर और तेल पाइपलाइनों के जरिए व्यापार को ईरानी नियंत्रण वाले चेकपॉइंट्स से दूर ले जाने का समर्थन कर रहे हैं, जबकि आलोचकों का मानना है कि केवल वैकल्पिक रास्ते बनाना पर्याप्त नहीं है जब तक कि बुनियादी सुरक्षा चुनौती का समाधान न हो।

## सवाल-जवाब

### 1. जॉन बोल्टन ने इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को लेकर क्या चेतावनी दी?
उन्होंने कहा कि जब तक ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं होता, तब तक मध्य पूर्व के समुद्री मार्ग और यह व्यापारिक कॉरिडोर सुरक्षित नहीं रह सकते।

### 2. इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की शुरुआत कब हुई थी?
इस आर्थिक गलियारे की रूपरेखा वर्ष 2023 में पेश की गई थी।

### 3. इस कॉरिडोर के दो मुख्य हिस्से कौन से हैं?
इसमें एक ईस्टर्न कॉरिडोर है जो भारत को खाड़ी से जोड़ता है, और दूसरा नॉर्दर्न कॉरिडोर है जो खाड़ी क्षेत्र को यूरोप से कनेक्ट करता है।

### 4. बोल्टन ने ट्रंप प्रशासन की नीति पर क्या सवाल उठाए?
बोल्टन ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास कोई ठोस क्षेत्रीय रणनीति नहीं है और वह भू-राजनीतिक मुद्दों को अलग-थलग करके देखता है।

### 5. बोल्टन ने किन दो प्रमुख समुद्री जलडमरूमध्य का जिक्र किया?
उन्होंने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज और लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य में सुरक्षा खतरों का जिक्र किया।

### 6. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इस कॉरिडोर पर क्या रुख रहा है?
ट्रंप ने कहा कि ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को ईरानी चेकपॉइंट्स से दूर ले जाने की जरूरत है और उनका प्रशासन इस कॉरिडोर व पाइपलाइनों का जोरदार समर्थन करता है।

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