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  "type": "article",
  "title": "रूसी तेल पर 100 प्रतिशत टैरिफ की अमेरिकी चेतावनी के बीच एस जयशंकर ने मार्को रूबियो के सामने रखी भारत की दो टूक बात",
  "summary": "न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मुलाकात की और स्पष्ट किया कि 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है।",
  "content": "न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत संपन्न हुई। इस वार्ता का मुख्य केंद्र वाशिंगटन में पारित नया कानून और उससे जुड़ी 100 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ की चेतावनियां रहीं। एस जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में अमेरिकी पक्ष को अवगत कराया कि देश के 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने यह साफ संदेश दिया कि भारत अपने रणनीतिक और व्यापारिक निर्णय किसी तीसरे देश के दबाव में आकर तय नहीं करेगा।\n\nएसआरआईए कानून और आयातकों पर मंडराता दंडात्मक कर\nअमेरिकी संसद ने हाल ही में लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पारित किया है, जिसे संक्षेप में एसआरआईए के नाम से जाना जाता है। यह विधान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे व्यापक अधिकार सौंपता है जिनके तहत वे मॉस्को से कच्चा तेल अथवा प्राकृतिक गैस खरीदने वाले किसी भी मुल्क के उत्पादों पर शत-प्रतिशत तक भारी टैरिफ लागू कर सकते हैं। वर्तमान समय में नई दिल्ली और बीजिंग रूसी हाइड्रोकार्बन के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। इसी कारण इस कानूनी कदम के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक गलियारों में तीखी चर्चा छिड़ गई थी कि क्या अमेरिकी प्रशासन वास्तव में भारतीय वस्तुओं पर यह भारी वित्तीय भार थोपेगा और इसका घरेलू आर्थिक ढांचे पर क्या असर पड़ेगा।\n\nउच्चस्तरीय बैठक और नई दिल्ली का कड़ा संदेश\nअमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ आमने-सामने हुई इस बातचीत के बाद एस जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर उनकी यह बैठक हुई, जिसमें नए प्रतिबंध कानून को लेकर भारत के राष्ट्रीय हितों तथा बुनियादी चिंताओं को पूरी मजबूती से सामने रखा गया। इसके साथ ही दोनों शीर्ष राजनयिकों ने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और यूक्रेन के मौजूदा हालात पर भी गंभीर विचार-विमर्श किया। विदेश मंत्री के इस सार्वजनिक रुख ने साफ कर दिया कि भारत किसी भी तरह की धमकी अथवा प्रतिबंधों के आगे झुकने वाला नहीं है और उसकी ऊर्जा आवश्यकताएं ही विदेश नीति का मुख्य आधार बनी रहेंगी।\n\nराजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने अमेरिका को याद दिलाए जमीनी आंकड़े\nइस उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय वार्ता से ठीक पहले अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने भी इस पूरे विषय पर भारत का पक्ष बेहद मजबूती और तार्किकता के साथ प्रस्तुत किया था। विनय मोहन क्वात्रा ने दो टूक लहजे में रेखांकित किया कि ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में भारत का दृष्टिकोण पूरी तरह से जनता सबसे पहले के बुनियादी सिद्धांत पर टिका हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कच्चा तेल कहां से और किस व्यवस्था के तहत हासिल करेगा, यह पूरी तरह व्यावसायिक व्यवहार्यता, आपूर्ति की निरंतरता, बाजार की परिस्थितियों और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर निर्भर करता है।\n\nभारतीय राजदूत ने अमेरिकी नीति-निर्माताओं के समक्ष प्रासंगिक आंकड़े रखते हुए बताया कि भारत अपनी कुल घरेलू आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल बाहरी देशों से आयात करता है। इसके अतिरिक्त देश अपनी जरूरत की 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस भी विदेशी स्रोतों से खरीदता है। विनय मोहन क्वात्रा ने स्मरण कराया कि जब वैश्विक संघर्षों के चलते अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मची थी और दरें तेजी से बढ़ रही थीं, तब भारत द्वारा रूसी तेल के आयात ने घरेलू बाजार को महंगाई से बचाने के साथ-साथ समूचे वैश्विक ऊर्जा बाजार को संतुलित रखने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। यदि उस कठिन समय में भारत ने यह खरीदारी न की होती, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें अनियंत्रित होकर आसमान छूने लगतीं।\n\nसमुद्री मार्गों की सुरक्षा और खाड़ी क्षेत्र का तनाव\nविदेश मंत्रियों की इस बैठक में केवल आयात शुल्क का विषय ही नहीं उठा, बल्कि रणनीतिक समुद्री गलियारों की रक्षा पर भी गहन चर्चा हुई। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी में वाणिज्यिक तेल टैंकरों पर लगातार हो रहे हमलों ने अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की विशाल आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र के जलमार्गों पर निर्भर है, इसलिए इन समुद्री रास्तों पर आवागमन की निर्बाध सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता नई दिल्ली की प्राथमिक प्राथमिकताओं में शामिल है। दोनों नेताओं ने इस बात की समीक्षा की कि इन अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापारिक मार्गों को किस प्रकार हर हाल में सुरक्षित रखा जा सकता है।\n\nटैरिफ लागू करने की राह में अमेरिका के सामने जटिल रणनीतिक अड़चनें\nवर्तमान परिस्थितियों का विश्लेषण करने वाले रणनीतिकारों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के लिए भारत पर शत-प्रतिशत टैरिफ थोपने का कदम उठाना अत्यंत जटिल और आत्मघाती साबित हो सकता है। इसके पीछे कई ठोस भू-राजनीतिक और आर्थिक कारण मौजूद हैं\n\n• इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपरिहार्य साझेदारी: समूचे इंडो-पैसिफिक भूगोल में चीन के आक्रामक विस्तारवाद पर अंकुश लगाने के लिए वाशिंगटन को नई दिल्ली के सशक्त रणनीतिक सहयोग की अनिवार्य आवश्यकता है। ऐसे में भारत जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदार पर भारी-भरकम शुल्क थोपना रक्षा और कूटनीतिक गठबंधनों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।\n• वैश्विक तेल बाजार में उछाल और अमेरिकी मुद्रास्फीति: यदि भारत अचानक रूसी आपूर्ति से पीछे हटता है, तो विश्व बाजार में कच्चे तेल की दरें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को तुरंत पार कर सकती हैं। कच्चे तेल में आने वाली इस भीषण तेजी से स्वयं अमेरिकी घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें अनियंत्रित हो जाएंगी, जिससे वहां महंगाई का नया संकट खड़ा हो जाएगा।\n• स्वतंत्र विदेश नीति का दृढ़ ढांचा: भारत ने पिछले कई वर्षों में निरंतर यह सिद्ध किया है कि वह किसी भी महाशक्ति अथवा बाह्य दबाव के सामने अपने रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांतों से पीछे नहीं हटता और सदैव अपने 140 करोड़ नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखता है।\n\nइसका आप पर असर\nअमेरिकी प्रतिबंध कानून और टैरिफ की धमकियों के बीच भारत द्वारा अपने रुख पर अड़े रहने से घरेलू ईंधन दरों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सीधा असर पड़ता है।\n\n• भारत में ईंधन की कीमतें: देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में अचानक भारी उछाल आने का जोखिम टला हुआ है। सरकार द्वारा सस्ता रूसी कच्चा तेल निरंतर खरीदने से घरेलू उपभोक्ताओं पर अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि का सीधा बोझ नहीं पड़ा है।\n• आयात और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: देश के 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा आपूर्ति बिना किसी रुकावट के सामान्य रूप से जारी रहेगी। आयात बिल नियंत्रण में रहने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार स्थिर बना रहता है और मुद्रास्फीति पर दबाव कम होता है।\n• निर्यातकों के लिए स्थिति: भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी व्यापार नियमों और संभावित टैरिफ फैसलों पर करीबी नजर बनाए रखनी होगी। यदि अमेरिका किसी श्रेणी में दंडात्मक कर लागू करता है तो उससे जुड़े उद्योगों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव करना पड़ सकता है।\n• वैश्विक तेल बाजार का संतुलन: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से बची हुई हैं। भारतीय खरीद वैश्विक बाजार में आपूर्ति बनाए रखती है जिससे आम उपभोक्ताओं के दैनिक बजट पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह घटनाक्रम अमेरिकी संसद द्वारा पारित नए प्रतिबंध कानून और भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के आपसी टकराव के कारण उत्पन्न हुआ है। वाशिंगटन रूस के राजस्व स्रोतों पर चोट करना चाहता है, जबकि नई दिल्ली अपनी भारी आयात निर्भरता के चलते किफायती विकल्पों को प्राथमिकता देती है।\n\n• एसआरआईए कानून का पारित होना: अमेरिकी संसद ने लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट को मंजूरी दी है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा खरीदने वाले मुल्कों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की असीमित शक्तियां प्रदान करता है।\n• भारत की व्यापक आयात निर्भरता: देश अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है। किसी भी बाहरी प्रतिबंध के सामने झुकना घरेलू अर्थव्यवस्था और 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा स्थिरता के लिए घातक साबित हो सकता है।\n• वैश्विक बाजार स्थिरीकरण में भारत की भूमिका: अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के समय भारत ने रूसी तेल खरीदकर बाजार में अचानक आने वाली गंभीर किल्लत को टाला था। यदि यह खरीदारी रोकी गई तो वैश्विक आपूर्ति बाधित होगी और स्वयं पश्चिमी देशों में ईंधन दरें बेकाबू हो सकती हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. एसआरआईए कानून क्या है और यह राष्ट्रपति को क्या अधिकार देता है?\nयह अमेरिकी संसद द्वारा पारित एक प्रतिबंध कानून है जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है।\n\n2. न्यूयॉर्क बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने क्या रुख अपनाया?\nएस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो को स्पष्ट किया कि 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है और भारत अपने फैसले किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं लेगा।\n\n3. राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने भारत की तेल निर्भरता पर क्या आंकड़े रखे?\nउन्होंने बताया कि भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस दूसरे देशों से आयात करता है।\n\n4. जयशंकर और रूबियो की बैठक में समुद्री सुरक्षा से जुड़े किन रास्तों पर चर्चा हुई?\nदोनों नेताओं ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी में तेल टैंकरों पर हो रहे हमलों और उन समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा पर चर्चा की।\n\n5. यदि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर दे तो वैश्विक बाजार पर क्या असर हो सकता है?\nविशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे अमेरिका सहित दुनिया भर में ईंधन महंगा हो जाएगा।",
  "url": "https://trendkia.com/america/rusi-tela-para-100-pratishata-tairipha-ki-us-chetavani-ke-bicha-s-jaishankar-ne-marco-rubio-ke-samane-rakhi-india-ki-do-tuka-bata-37285",
  "category": "अमेरिका",
  "publishedAt": "2026-09-23",
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    "भारत अमेरिका संबंध",
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