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  "type": "article",
  "title": "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के वीटो से गिरा अमेरिका का प्रस्ताव, पश्चिमी सहारा मिशन का हुआ अंत",
  "summary": "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस द्वारा वीटो का इस्तेमाल किए जाने के कारण अमेरिका का पश्चिमी सहारा से जुड़ा प्रस्ताव खारिज हो गया। इस गतिरोध के चलते MINURSO शांति मिशन का कार्यकाल भी समाप्त हो गया है।",
  "content": "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के भीतर हाल ही में कूटनीति का एक कड़ा मुकाबला देखने को मिला, जहां रूस ने अमेरिका के एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर वीटो की अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए उसे रोक दिया। इस फैसले का असर फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर भी पड़ा, जो इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाना चाहते थे। यह पूरा मामला अफ्रीका के पश्चिमी सहारा क्षेत्र में तैनात संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन MINURSO के भविष्य से जुड़ा हुआ था। अमेरिका की यह मंशा थी कि इस शांति मिशन का कार्यकाल आगे भी बढ़ाया जाए, लेकिन इसके साथ ही इसकी कार्यप्रणाली को मोरक्को की वर्ष 2007 की स्वायत्तता योजना के दायरे में होने वाली वार्ताओं से जोड़ा जाए। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 11 देशों ने अपने मत डाले, इसके बावजूद रूस के एक कड़े विरोध और वीटो के कारण इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। इस घटनाक्रम के बाद से वैश्विक मंच पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जब भारी बहुमत यानी 11 देशों का समर्थन इस प्रस्ताव के साथ था, तब केवल रूस के एक अकेले वोट से यह पूरा मामला कैसे अटक गया। इसका मूल उत्तर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नियमों में निहित वीटो के विशेषाधिकार में छुपा हुआ है।\n\nसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की शक्ति का गणित\nसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल सदस्य देशों की संख्या 15 होती है। इनमें से पांच स्थायी सदस्य देश हैं, जिनके नाम अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं। इन पांचों देशों को एक विशेष अधिकार प्राप्त है, जिसे सामान्य बोलचाल में वीटो कहा जाता है। सुरक्षा परिषद के किसी भी सामान्य प्रस्ताव को पारित होने के लिए कम से कम नौ सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। हालांकि, यदि किसी अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर इन पांच स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक देश इसके विरोध में अपना वोट डाल देता है, तो वह प्रस्ताव तत्काल प्रभाव से रुक जाता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि भले ही चौदह देश किसी प्रस्ताव के समर्थन में अपनी सहमति दे दें, लेकिन यदि एक भी स्थायी सदस्य ने वीटो का प्रयोग कर दिया, तो वह प्रस्ताव कभी पास नहीं हो सकता। पश्चिमी सहारा के ताज़ा मामले में बिल्कुल यही स्थिति उत्पन्न हुई। अमेरिकी प्रस्ताव को ग्यारह देशों का मजबूत समर्थन प्राप्त हुआ था, परंतु रूस ने इस पर वीटो का इस्तेमाल कर दिया। इस प्रकार, भारी बहुमत का समर्थन मिलने के बावजूद यह प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हो सका और यही वीटो की वास्तविक कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है।\n\nअमेरिकी प्रस्ताव का मूल उद्देश्य और पश्चिमी सहारा का इतिहास\nइस पूरे भू-राजनीतिक विवाद की तह तक जाने के लिए पश्चिमी सहारा के ऐतिहासिक घटनाक्रम को समझना बेहद आवश्यक है। यह उत्तरी अफ्रीका का एक ऐसा संवेदनशील भू-भाग है, जिस पर मोरक्को अपना वैध अधिकार जताता है। इसके विपरीत, पोलिसारियो फ्रंट इस क्षेत्र के निवासियों के लिए एक स्वतंत्र और अलग देश के गठन की पुरजोर मांग करता है और उसे पड़ोसी देश अल्जीरिया का पूरा कूटनीतिक समर्थन प्राप्त है। वर्ष 1975 में स्पेन के इस क्षेत्र से पीछे हटने के बाद मोरक्को ने इसके एक बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इसके परिणामस्वरूप मोरक्को और पोलिसारियो फ्रंट के बीच लंबे संघर्ष की शुरुआत हुई। वर्ष 1991 में दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम समझौता हुआ और संयुक्त राष्ट्र ने MINURSO मिशन की स्थापना की। इस मिशन का मुख्य दायित्व युद्धविराम समझौते की निगरानी करना और एक ऐसे निष्पक्ष जनमत संग्रह के आयोजन में सहायता प्रदान करना था, जिसके माध्यम से पश्चिमी सहारा के नागरिक यह तय कर सकें कि उन्हें एक स्वतंत्र देश बनना है या फिर मोरक्को के साथ रहना है। हालांकि, मतदाता सूची में शामिल होने वाले लोगों की पात्रता को लेकर कभी भी पूर्ण सहमति नहीं बन पाई, जिसकी वजह से वह जनमत संग्रह कभी आयोजित ही नहीं हो सका।\n\nमोरक्को की स्वायत्तता योजना और रूस की आपत्तियां\nमोरक्को ने वर्ष 2007 में एक व्यापक स्वायत्तता योजना पेश की थी, जिसके तहत पश्चिमी सहारा को मोरक्को की संप्रभुता के अधीन रहते हुए अपने स्थानीय प्रशासनिक मामलों में खुद शासन चलाने का अधिकार मिलना तय किया गया था। अमेरिका द्वारा लाए गए नए प्रस्ताव में इसी योजना को इस जटिल विवाद के समाधान का सबसे अधिक व्यावहारिक आधार बताया गया था। इस प्रस्ताव में MINURSO का नाम बदलकर संयुक्त राष्ट्र मिशन इन वेस्टर्न सहारा करने और उसकी कार्यशैली में महत्वपूर्ण बदलाव लाने का सुझाव भी शामिल था। इसका आशय यह था कि यह मिशन लगभग पैंतीस साल बाद भी अपनी सेवाएं जारी रखता, लेकिन इसके पुराने जनमत संग्रह वाले मूल उद्देश्य के बजाय एक संशोधित राजनीतिक भूमिका पर अधिक जोर दिया जाता। रूस का मुख्य विरोध इसी प्रावधान पर केंद्रित था। रूस का यह तर्क था कि यह प्रस्ताव मोरक्को की योजना को पहले से ही इस विवाद का एकमात्र समाधान मान रहा है, जिससे पश्चिमी सहारा के स्थानीय लोगों के आत्मनिर्णय के मौलिक अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। रूसी पक्ष के अनुसार, किसी भी एक पक्ष की निर्धारित शर्तों के आधार पर शांति समाधान थोपना बिल्कुल उचित नहीं है।\n\nफ्रांस और ब्रिटेन की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक नाराजगी\nअमेरिकी प्रस्ताव के समर्थन में फ्रांस और ब्रिटेन ने भी अपने मत डाले थे। फ्रांस ने पश्चिमी सहारा के इस पूरे मसले को मोरक्को की संप्रभुता से जुड़ा हुआ आंतरिक और बाहरी मामला बताया और खुलकर मोरक्को की स्वायत्तता योजना का समर्थन किया। ब्रिटेन ने भी वर्ष 2007 की इस योजना को इस क्षेत्रीय विवाद के दीर्घकालिक और स्थायी समाधान का सबसे अधिक भरोसेमंद तथा व्यावहारिक आधार करार दिया। रूस द्वारा वीटो किए जाने के तुरंत बाद इन दोनों यूरोपीय देशों ने अपनी गहरी नाराजगी खुलकर जाहिर की। ब्रिटेन का यह बयान सामने आया कि इस दुर्भाग्यपूर्ण फैसले से सुरक्षा परिषद के शांति प्रयासों को एक बड़ा झटका लगा है और संयुक्त राष्ट्र मिशन की मैदानी तैनाती भी खतरे में पड़ सकती है। वहीं दूसरी ओर, फ्रांस ने रूस पर खुली बातचीत और कूटनीतिक प्रक्रिया में जानबूझकर रुकावटें पैदा करने का गंभीर आरोप लगाया।\n\nरूसी प्रस्ताव का हस्र और MINURSO का अंत\nरूस ने केवल अमेरिकी प्रस्ताव को वीटो के जरिए रोककर ही इस मामले को शांत नहीं किया, बल्कि उसने अपना एक अलग स्वतंत्र प्रस्ताव भी सुरक्षा परिषद के समक्ष पेश किया। इस रूसी प्रस्ताव में MINURSO मिशन के कार्यकाल को बिना किसी बड़े फेरबदल के एक और वर्ष के लिए बढ़ाने की बात कही गई थी। रूस की मंशा यह थी कि संयुक्त राष्ट्र की पुरानी व्यवस्था को ही यथावत रूप से जारी रखा जाए और इस विवाद का समाधान केवल आपसी बातचीत के माध्यम से निकाला जाए। हालांकि, अमेरिका ने इस रूसी प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया। स्थिति यह रही कि रूस के इस प्रस्ताव को परिषद के भीतर केवल तीन देशों का समर्थन मिल पाया, जबकि ग्यारह देशों ने मतदान की प्रक्रिया से पूरी तरह दूरी बना ली। किसी भी प्रस्ताव को पारित होने के लिए कम से कम नौ वोटों की अनिवार्यता होती है। इस प्रकार, अमेरिका और रूस दोनों के ही प्रस्ताव सुरक्षा परिषद के पटल पर औंधे मुंह गिर गए। यही इस पूरे भू-राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे बड़ा और जटिल पेंच साबित हुआ। रूस ने अमेरिकी प्रस्ताव को वीटो के जरिए रोक तो अवश्य दिया, लेकिन वह संयुक्त राष्ट्र के इस शांति मिशन को बचा पाने में असफल रहा। परिणाम यह हुआ कि 31 अक्टूबर 2026 को MINURSO का निर्धारित कार्यकाल पूरी तरह समाप्त हो गया और 1 नवंबर से इसके पास अपने प्रशासनिक कार्यों को आगे जारी रखने का कोई भी नया आधिकारिक आदेश शेष नहीं रहा।\n\nमोरक्को के राजा द्वारा उठाए गए कदम और प्रशासनिक निर्देश\nसंयुक्त राष्ट्र शांति मिशन का आधिकारिक कार्यकाल समाप्त होने के ठीक बाद, मोरक्को के राजा मोहम्मद VI ने देश के शीर्ष सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की और उन्हें इस नई जमीनी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार रहने का स्पष्ट निर्देश दिया। रबात स्थित शाही महल में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान राजा ने अपनी तीन मुख्य प्राथमिकताओं को रेखांकित किया, जिनमें मोरक्को की क्षेत्रीय अखंडता की सुदृढ़ रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा की बहाली और पश्चिमी सहारा क्षेत्र में निवास करने वाले सभी नागरिकों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल था। राजा ने देश के गृह मंत्रालय को यह विशेष निर्देश दिया कि वह MINURSO के समन्वय कार्यालय के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों के साथ संपर्क साधे और इस शांति मिशन की क्रमिक वापसी तथा इसके तमाम संसाधनों को वहां से हटाने की पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से संभाले। इस पूरी वापसी की प्रक्रिया में मिशन से जुड़े हुए सभी कर्मचारियों, उनके आधिकारिक वाहनों और अन्य सामरिक सुविधाओं को वापस ले जाना शामिल है। इसके साथ ही मोरक्को की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि वह क्षेत्र में युद्धविराम के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करना जारी रखेगा और इस भू-भाग पर चल रही किसी भी महत्वपूर्ण विकास परियोजना के कार्यों को बिल्कुल नहीं रोकेगा।\n\nइसका आप पर असर\nसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के वीटो और पश्चिमी सहारा मिशन के समाप्त होने से भू-राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय कूटनीति पर गहरा असर पड़ा है।\n\n• अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर: इस गतिरोध से संयुक्त राष्ट्र की शांति स्थापना की भूमिका और सुरक्षा परिषद की निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल खड़े हुए हैं। भविष्य के अंतरराष्ट्रीय मिशनों में महाशक्तियों के बीच टकराव बढ़ने की आशंका है।\n• मोरक्को और क्षेत्र में: मोरक्को ने युद्धविराम जारी रखने और विकास कार्य न रोकने की घोषणा की है, जिससे स्थानीय स्तर पर तात्कालिक स्थिरता बनी रहेगी। हालांकि, राजनीतिक समाधान टलने से अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कूटनीतिक गतिरोध संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच पश्चिमी सहारा के भविष्य को लेकर वैचारिक और रणनीतिक मतभेदों के कारण पैदा हुआ। अमेरिका मोरक्को की स्वायत्तता योजना को समाधान का आधार बनाना चाहता था, जबकि रूस ने इसे एक पक्षीय शर्त मानकर खारिज कर दिया।\n\n• वीटो का अधिकार: सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों को किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोकने का असीमित अधिकार प्राप्त है, जिसके तहत रूस ने 11 देशों के समर्थन के बावजूद अमेरिकी प्रस्ताव को खारिज कर दिया।\n• राजनीतिक असहमति: रूस का तर्क था कि मोरक्को की योजना को प्राथमिकता देने से स्थानीय आबादी के आत्मनिर्णय के अधिकार का हनन होता है, जिससे दोनों पक्षों के बीच आम सहमति नहीं बन सकी।\n• प्रस्तावों की असफलता: अमेरिका और रूस दोनों के प्रस्तावों को परिषद में आवश्यक नौ मत नहीं मिल पाए, जिससे MINURSO मिशन का कार्यकाल बिना किसी नए आदेश के समाप्त हो गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कितने स्थायी सदस्य हैं?\nसुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं, जो अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं।\n\n2. रूस ने अमेरिका के किस प्रस्ताव को वीटो किया?\nरूस ने पश्चिमी सहारा में MINURSO मिशन के कार्यकाल को मोरक्को की 2007 की स्वायत्तता योजना से जोड़ने वाले अमेरिकी प्रस्ताव को वीटो कर दिया।\n\n3. MINURSO मिशन का कार्यकाल कब समाप्त हुआ?\nMINURSO मिशन का कार्यकाल 31 अक्टूबर 2026 को समाप्त हो गया।\n\n4. मोरक्को के राजा ने क्या निर्देश दिए?\nराजा मोहम्मद VI ने क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र मिशन की वापसी की प्रक्रिया को संभालने के निर्देश दिए।",
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