# सैन्य नियंत्रण वाले मुल्क को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नसीहत देने का कोई हक नहीं, संयुक्त राष्ट्र में बोला भारत

> संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने कानूनी मर्यादाओं पर इस्लामाबाद की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जिस व्यवस्था में सेना सर्वोच्च हो, वह वैश्विक मंचों पर उपदेश नहीं दे सकती। भारतीय राजनयिक ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की कैद और अदालती आदेशों की अनदेखी का भी हवाला दिया।

**Type:** article · **Category:** अमेरिका · **Published:** 2026-10-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/america/sainya-niyntrana-vale-mulka-ko-antararashtriya-mncha-para-nasihata-dene-ka-koi-haka-nahin-un-men-bola-india-46729 · **Language:** Hindi
**Tags:** संयुक्त राष्ट्र, भारत पाकिस्तान संबंध, आर मैथिली, इमरान खान, छठी समिति, कूटनीति

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नियम आधारित व्यवस्था की दुहाई देने वाले पड़ोसी देश को भारतीय पक्ष ने कड़ा कूटनीतिक जवाब दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में नियम कायदों और विधिक व्यवस्था विषय पर विचार विमर्श चल रहा था। इसी दौरान पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के बयानों पर आपत्ति दर्ज करते हुए भारतीय दल ने 9 अक्टूबर को अपने प्रत्युत्तर के अधिकार का उपयोग किया। भारतीय राजनयिक ने स्पष्ट किया कि जिस भूभाग में वास्तविक नियंत्रण वर्दीधारी कमान के हाथों में रहता हो, वहां से विधिक सिद्धांतों पर व्याख्यान आना स्वाभाविक रूप से विरोधाभासी है।

## संवैधानिक मर्यादा और सैन्य दखल पर सीधा प्रहार
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में काउंसलर के रूप में कार्यरत आर. मैथिली ने इस विमर्श में पक्ष रखा। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए रेखांकित किया, “यह विडंबना है कि ऐसे देश से कानून के शासन पर उपदेश सुनने को मिल रहे हैं, जिसका अपना रिकॉर्ड इसका मजाक उड़ाता है.” भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि पड़ोसी मुल्क वैश्विक पटल पर खुद को न्याय व्यवस्था का पैरोकार दिखाता है, जबकि असलियत में वहां विधिक प्रक्रियाओं का संचालन सैन्य प्रतिष्ठान के निर्देशों पर निर्भर करता है।

भारतीय पक्ष ने आगे यह भी रेखांकित किया कि जिस व्यवस्था में सैन्य अधिपतियों को स्थानीय अदालतों के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाता हो, उसे इस प्रतिष्ठित मंच पर दूसरों को पाठ पढ़ाने की नैतिक पात्रता नहीं है। यह दोहरा रवैया अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसकी विश्वसनीयता को खोखला साबित करता है।

## इमरान खान की हिरासत और नागरिक शासन की विफलता
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने पड़ोसी देश के अंदरूनी राजनीतिक संकट और न्यायिक उल्लंघनों का उदाहरण भी सामने रखा। इस क्रम में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को सलाखों के पीछे रखे जाने और उनके साथ किए जा रहे बर्ताव का प्रसंग उठाया गया। भारतीय राजनयिक ने ध्यान दिलाया कि वहां किसी भी चुनी हुई लोकतांत्रिक सत्ता को अपनी वैधानिक अवधि पूरी नहीं करने दी गई।

इसके साथ ही, एक पूर्व शासनाध्यक्ष को मनमाने तरीके से कैद में रखना और देश की शीर्ष अदालत के स्पष्ट आदेशों के बाद भी जरूरी इलाज मुहैया न कराना विधिक परंपराओं की धज्जियां उड़ाने जैसा है। भारतीय दल ने जोर देकर कहा कि ऐसी गंभीर प्रशासनिक विफलताओं के बीच किसी अन्य देश को विधि सम्मत शासन पर भाषण देना पूरी तरह अनुचित है।

## इसका आप पर असर
यह कूटनीतिक रुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में पड़ोसी देश के आक्रामक प्रचार अभियान को कमजोर करता है और भारत की सामरिक स्थिति को पुख्ता बनाता है।

- **राजनयिक स्तर पर:** वैश्विक मंचों पर द्विपक्षीय मुद्दों के अनर्गल इस्तेमाल को रोकने के लिए ठोस प्रतिरोध दर्ज कराया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत का पक्ष मजबूत रहता है और अनुचित दबाव नहीं बनता।
- **नागरिक समझ के लिए:** आम पाठकों को यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि किस प्रकार विधिक सिद्धांतों की आड़ में राजनीतिक विमर्श को भटकाया जाता है। यह सीमा पार के राजनीतिक संकट और शासन प्रणाली के असंतुलन की हकीकत को उजागर करता है।
- **अंतरराष्ट्रीय नीति पर:** संयुक्त राष्ट्र की समितियों में बिना आधार के आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर कड़ा कूटनीतिक विराम लगता है। भविष्य में इस तरह की बयानबाजी करने से पहले संबंधित पक्षों को अपनी कमजोरियों का अहसास रहेगा।
- **पड़ोसी देशों के रिश्ते पर:** औपचारिक संवाद के अभाव में भी दोनों पक्षों के कूटनीतिक रुख में तल्खी बरकरार रहने के संकेत मिलते हैं। इससे निकट भविष्य में सामान्य कूटनीतिक वार्ताओं की संभावना सीमित बनी रहती है।

## ऐसा क्यों हुआ
संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में वैधानिक विषयों पर चल रही चर्चा के दौरान पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन पर भारत को आपत्ति दर्ज करानी पड़ी। जवाब में भारतीय पक्ष ने पड़ोसी देश में सेना के प्रभाव, कमजोर नागरिक शासन और न्यायिक आदेशों की उपेक्षा को उजागर करते हुए यह पलटवार किया।

- **प्रत्युत्तर का अधिकार:** समिति में कानूनी शासन विषय पर चर्चा के दौरान पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने टिप्पणियां की थीं। इसके बाद 9 अक्टूबर को भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रत्युत्तर देने के अपने राजनयिक अधिकार का प्रयोग किया।
- **सैन्य प्रभुत्व की जमीनी हकीकत:** पड़ोसी देश में सेना हमेशा से नीतिगत फैसलों और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती रही है। वहां सैन्य अधिकारियों को घरेलू अदालतों की जवाबदेही से छूट मिली होने का मुद्दा भारत ने पुरजोर तरीके से उठाया।
- **नागरिक नेतृत्व की अस्थिरता:** इतिहास गवाह है कि वहां कोई भी निर्वाचित प्रधानमंत्री अपना संवैधानिक कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। इस राजनीतिक अस्थिरता ने भारत को कूटनीतिक जवाब देने का पुख्ता आधार प्रदान किया।
- **इमरान खान की कानूनी स्थिति:** पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की लंबी गिरफ्तारी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी मेडिकल सुविधा न मिलने का ताजा मामला अंतरराष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया।

## सवाल-जवाब

### 1. संयुक्त राष्ट्र में भारत ने पाकिस्तान के किस बयान पर आपत्ति जताई?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून के शासन पर पाकिस्तान द्वारा दी गई टिप्पणियों और उपदेशों पर कड़ी आपत्ति जताई।

### 2. भारत की तरफ से यह कड़ा जवाब किस राजनयिक ने दिया?
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की काउंसलर आर. मैथिली ने भारत के प्रत्युत्तर के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह जवाब दिया।

### 3. यह कूटनीतिक बहस किस तारीख को हुई थी?
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने 9 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति की बैठक के दौरान यह पलटवार किया।

### 4. भारतीय राजनयिक ने पड़ोसी देश की व्यवस्था के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि यह विडंबना है कि ऐसा देश उपदेश दे रहा है जहां सेना ही शासन और कानून तय करती है तथा सैन्य शासक अपनी अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहते हैं।

### 5. भारत ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के मामले का उल्लेख क्यों किया?
भारत ने उदाहरण दिया कि एक पूर्व प्रधानमंत्री को मनमाने ढंग से जेल में रखकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद चिकित्सा से वंचित रखना कानून के शासन का मजाक उड़ाना है।

### 6. भारत ने पड़ोसी देश की सरकारों के कार्यकाल को लेकर क्या टिप्पणी की?
भारतीय प्रतिनिधि ने रेखांकित किया कि वहां किसी भी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया गया है।

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