संयुक्त राष्ट्र में AI तकनीक के मालिकाना हक पर छिड़ी बहस, एस जयशंकर और ग्लोबल साउथ के नेताओं ने उठाई संप्रभुता की मांग संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत, मलेशिया और जर्मनी सहित कई देशों ने एआई तकनीक पर मुट्ठी भर अमीर देशों और कंपनियों के एकाधिकार को लेकर गहरी चिंता जताई है और डिजिटल संप्रभुता की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के भविष्य और नियंत्रण को लेकर एक बड़ा वैचारिक संघर्ष शुरू हो गया है। दुनिया भर के तमाम देशों ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि इस क्रांतिकारी तकनीक का नियंत्रण मुट्ठी भर अमीर राष्ट्रों, उनकी सरकारों या विशाल वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के पास केंद्रित होता जा रहा है। विकासशील और गरीब देशों का मानना है कि यदि इस असंतुलन को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो यह दुनिया में एक नए प्रकार के डिजिटल विभाजन और आर्थिक असमानता को जन्म देगा। भारत ने इस मंच से स्पष्ट रूप से प्रत्येक राष्ट्र के अपने संप्रभु AI मॉडल विकसित करने के अधिकार की वकालत की है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस महत्वपूर्ण सत्र में यह बहस केवल तकनीक के विकास तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें संप्रभुता, संसाधनों के दोहन और वैश्विक नीतियों में हिस्सेदारी जैसे गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दे भी खुलकर सामने आए। भारत की आवाज: संप्रभु AI मॉडल्स का निर्माण और विविधता का संरक्षण भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में अपने संबोधन के दौरान वैश्विक मंच पर भारत का दृष्टिकोण अत्यंत मजबूती से प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि AI प्रौद्योगिकी आज के युग में मानव समाज को सशक्त बनाने और वैश्विक आर्थिक समृद्धि के नए मार्ग खोलने वाली एक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति है। उन्होंने कहा कि यह तकनीक पूरी मानवता की प्रगति में एक बड़ा बदलाव लाने वाली ताकत सिद्ध हो सकती है, बशर्ते इसका लाभ सभी को समान रूप से मिले। हालांकि, इसके साथ ही भारतीय विदेश मंत्री ने इस तकनीक के दुरुपयोग और इसके संभावित खतरों के प्रति वैश्विक समुदाय को आगाह भी किया। एस. जयशंकर ने आगाह किया कि यदि AI का अनियंत्रित और अनैतिक रूप से उपयोग किया गया, तो यह पूर्वाग्रहों को और अधिक गहरा कर सकता है तथा विभिन्न समाजों और देशों के बीच मौजूद आपसी सम्मान की भावना को कमजोर कर सकता है। भारत का यह स्पष्ट मत है कि प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र को अपनी अनूठी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अपने खुद के AI मॉडल विकसित करने और उन्हें संचालित करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनका यह वक्तव्य उस व्यापक वैश्विक विमर्श की पृष्ठभूमि में आया है, जहां यह सवाल लगातार गहरा रहा है कि इस तकनीक की नियमावली तय करने का एकाधिकार किसके पास रहेगा और क्या विकासशील देशों को इस तकनीकी क्रांति के भविष्य को आकार देने में बराबर की भूमिका दी जाएगी या नहीं। डेटा सेंटर बनाम बौद्धिक नियंत्रण: ग्लोबल साउथ की चेतावनी इस बहस में मलेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने भी बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने चेतावनी दी कि विकासशील देशों को केवल ऐसे भौतिक केंद्रों में तब्दील नहीं किया जाना चाहिए जहां केवल भारी मात्रा में डेटा एकत्र और संसाधित किया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्लोबल साउथ को केवल डेटा सेंटर और अन्य सहायक ढांचागत सुविधाएं स्थापित करने की भूमि के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता, जबकि इस तकनीक से जुड़े मुख्य नीतिगत फैसले और रणनीतिक नियंत्रण पश्चिमी देशों या मुट्ठी भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालयों में बंद रहें। मलेशियाई विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने बैठक में कड़े शब्दों में कहा, "ग्लोबल साउथ सिर्फ डेटा सेंटर लगाने की जगह नहीं बन सकता, जबकि एआई से जुड़े फैसले कहीं और लिए जाएं." उन्होंने चिंता व्यक्त की कि विकासशील देशों को केवल उपभोक्ता और बाजार के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने मांग की कि इन देशों को इस नई तकनीक के विकास, डिजाइनिंग और शोध कार्य में भी समान भागीदार बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, मोहम्मद हाजी हसन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि विशाल डेटा केंद्रों के संचालन के लिए अत्यधिक मात्रा में स्वच्छ पानी, भारी बिजली और मूल्यवान भूमि की आवश्यकता होती है। यदि इन संसाधनों के दोहन का पूरा बोझ विकासशील देशों के पर्यावरण और जनता पर डाला जा रहा है, तो इस तकनीक से होने वाला वास्तविक आर्थिक लाभ भी स्थानीय स्तर पर साझा होना चाहिए, न कि इसका अधिकांश हिस्सा विदेशी कंपनियों के खातों में जाना चाहिए। आज कुछ गिने-चुने निजी निगमों के पास वैश्विक आबादी के संवाद, काम, लेन-देन और सूचना प्राप्ति के तरीकों पर अभूतपूर्व नियंत्रण है, जो वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। अधिकारों का केंद्रीकरण और नियमों की कमी: जर्मनी और बेलीज के सरोकार यूरोप की ओर से जर्मनी ने भी AI के मालिकाना हक के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने रेखांकित किया कि वैश्विक स्तर पर AI से जुड़े अधिकांश बौद्धिक संपदा अधिकार और पेटेंट केवल दो बड़े देशों की कंपनियों के पास ही सिमटे हुए हैं। उन्होंने वैश्विक बिरादरी से अपील की कि जब किसी तकनीक की ताकत वैश्विक स्तर पर प्रभावी हो जाती है, तो उसके नियमन की जिम्मेदारी भी वैश्विक और साझा होनी चाहिए। जोहान वाडेफुल ने सबसे शक्तिशाली और उन्नत AI मॉडलों के सुरक्षित उपयोग के लिए एक साझा अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सचेत किया कि तकनीक की विकास दर वैश्विक नीति-निर्माताओं की गति से कहीं अधिक तेज है। जोहान वाडेफुल ने चेतावनी देते हुए कहा, "एआई हमारे संस्थानों के साथ तालमेल बिठाने का इंतज़ार नहीं कर रहा है." उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों को अपनी कार्यप्रणाली में तेजी लानी होगी ताकि वे इस बदलती तकनीकी वास्तविकता के साथ कदम से कदम मिला सकें। दूसरी ओर, बेलीज के प्रधानमंत्री जॉन ब्रिसेन्यो ने इस बात पर जोर दिया कि यदि AI के संचालन के लिए संतुलित नियम बनाए जाते हैं, तो इससे लोक कल्याणकारी सेवाओं को अत्यधिक प्रभावी बनाया जा सकता है और शिक्षा तथा सूचना तक आम लोगों की पहुंच को सुगम बनाया जा सकता है। लेकिन इसके विपरीत, नियमों के अभाव में यह तकनीक वैश्विक असमानता को और अधिक बढ़ा देगी, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को सुरक्षा जोखिमों में डाल देगी, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर छीन लेगी और गरीब देशों को पूरी तरह से उन विदेशी तकनीकों और कानूनों पर निर्भर बना देगी जिन्हें उनकी सहमति या भागीदारी के बिना तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सीमाएं पार करने वाली इस तकनीक को केवल किसी एक देश के स्थानीय कानूनों के माध्यम से नियंत्रित करना असंभव है। इंसानी नियंत्रण और वित्तीय समानता: सिंगापुर, सऊदी अरब और कैमरून सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने इस ऐतिहासिक तकनीकी बदलाव को समकालीन युग की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण चुनौती करार दिया। उन्होंने दुनिया भर की सरकारों से विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान, डिजिटल बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण और मानव कौशल के विकास में भारी निवेश करने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे पुख्ता सुरक्षा मानक और प्रोटोकॉल विकसित करने पर बल दिया जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि इस तकनीक का अंतिम नियंत्रण हमेशा इंसानों के हाथ में ही रहे। इसी क्रम में, सऊदी अरब ने AI क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्रों का एक नेटवर्क स्थापित करने के अपने प्रयासों का विवरण साझा किया। उन्होंने रियाद में एआई रिसर्च और एथिक्स सेंटर की स्थापना का उल्लेख करते हुए नैतिक मानकों के विकास पर जोर दिया। वहीं, अफ्रीकी देश कैमरून ने इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया कि तकनीकी विकास का लाभ किसी वर्ग विशेष तक सीमित न रहकर पूरी मानव जाति को मिलना चाहिए। कैमरून ने तकनीक तक पहुंच के इस मुद्दे को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सुधार की मांगों के साथ जोड़ा, ताकि विकासशील देशों को आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर आगे बढ़ने के लिए एक समान धरातल प्राप्त हो सके। ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट: व्यावहारिक क्रियान्वयन की डगर इस पूरे वैश्विक मंथन के केंद्र में संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2024 में अपनाया गया ऐतिहासिक 'ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट' (वैश्विक डिजिटल समझौता) रहा। इस समझौते का मूल उद्देश्य डिजिटल अंतर को कम करना, वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना और एक ऐसे सुरक्षित तथा मानव-केंद्रित डिजिटल भविष्य का निर्माण करना है जो मानवाधिकारों का सम्मान करता हो। हालांकि, इस समझौते के बावजूद वैश्विक नेताओं के बीच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। चुनौती यह है कि इन घोषित वैश्विक सिद्धांतों और नैतिक दिशानिर्देशों को ऐसे व्यावहारिक और कानूनी रूप से बाध्यकारी नियमों में कैसे बदला जाए, जिन्हें वास्तव में धरातल पर लागू कराया जा सके। अमीर और गरीब देशों के बीच की यह खाई केवल तकनीक की नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था के संचालन की है, जिसे सुलझाने के लिए अभी एक लंबी कूटनीतिक यात्रा तय करनी होगी। इसका आप पर असर संयुक्त राष्ट्र में चल रही इस बहस का सीधा प्रभाव दुनिया भर के आम नागरिकों पर डिजिटल अधिकारों, रोजगार और गोपनीयता के रूप में पड़ेगा। • डिजिटल संप्रभुता: यदि भारत जैसे देश अपने स्वयं के AI मॉडल विकसित करते हैं, तो आम नागरिकों को उनकी स्थानीय भाषाओं और संस्कृति के अनुकूल डिजिटल सेवाएं मिलेंगी। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आपको अंग्रेजी या पश्चिमी मानकों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी। • रोजगार सुरक्षा: वैश्विक स्तर पर कड़े नियमों के अभाव में स्वचालन के कारण कई क्षेत्रों में नौकरियों का नुकसान हो सकता है। सरकारें अब स्थानीय श्रम बाजार को सुरक्षित रखने के लिए नए सुरक्षात्मक कानून बना सकती हैं। • डेटा गोपनीयता: डेटा केंद्रों को स्थानीय स्तर पर नियंत्रित करने की मांग से नागरिकों का व्यक्तिगत डेटा देश के भीतर ही सुरक्षित रहेगा। इसका मतलब है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां आपकी संवेदनशील जानकारी को बिना अनुमति के विदेशी सर्वर पर नहीं भेज सकेंगी। • लागत और पहुंच: विकासशील देशों में तकनीक के समान वितरण से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती और सुलभ हो जाएंगी। इससे ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी आधुनिक तकनीक का सीधा लाभ मिलेगा। ऐसा क्यों हुआ संयुक्त राष्ट्र में यह टकराव इसलिए हुआ क्योंकि वर्तमान में AI तकनीक और उसके बौद्धिक संपदा अधिकारों पर कुछ ही अमीर देशों और कॉर्पोरेट दिग्गजों का नियंत्रण है। विकासशील देशों को डर है कि वे इस नई औद्योगिक क्रांति में केवल कच्चे माल यानी डेटा के आपूर्तिकर्ता बनकर रह जाएंगे, जबकि सारा मुनाफा बाहरी ताकतें ले जाएंगी। • तकनीकी एकाधिकार: वैश्विक स्तर पर वर्तमान में अधिकांश AI पेटेंट केवल दो प्रमुख देशों की मुट्ठी भर कंपनियों के पास केंद्रित हैं। इस अत्यधिक केंद्रीकरण ने अन्य देशों के भीतर डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक स्वावलंबन को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है। • बुनियादी ढांचे का पर्यावरणीय बोझ: डेटा सेंटरों को संचालित करने के लिए अत्यधिक पानी और बिजली की आवश्यकता होती है, जिसका सारा भौतिक बोझ विकासशील देशों पर पड़ता है। इन देशों को लगता है कि वे पर्यावरण और संसाधनों का नुकसान उठा रहे हैं, जबकि इसका मुख्य आर्थिक लाभ पश्चिमी कंपनियों को मिल रहा है। • नियामक गतिहीनता: अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उस गति से नियम बनाने में असमर्थ रही हैं जिस गति से AI तकनीक का विकास हो रहा है। इस नीतिगत शून्यता के कारण विकासशील देशों को डर है कि विदेशी कानून उन पर थोपे जा सकते हैं। सवाल-जवाब 1. संयुक्त राष्ट्र में भारत ने एआई (AI) को लेकर क्या रुख अपनाया? भारत ने प्रत्येक संप्रभु देश द्वारा अपनी प्राथमिकताओं और आवश्यकताओं के अनुसार अपना खुद का एआई मॉडल विकसित करने के अधिकार का पुरजोर समर्थन किया है। 2. मलेशिया ने डेटा सेंटरों के संदर्भ में क्या चेतावनी दी? मलेशिया ने चेतावनी दी कि विकासशील देशों को केवल डेटा सेंटर स्थापित करने की जगह नहीं बनाया जाना चाहिए, जबकि एआई से जुड़े मुख्य फैसले कहीं और लिए जा रहे हों। 3. जर्मनी के अनुसार एआई पेटेंट की वर्तमान स्थिति क्या है? जर्मनी के अनुसार, दुनिया में अधिकांश एआई पेटेंट केवल दो बड़े देशों की कंपनियों के पास केंद्रित हैं, जिससे इस तकनीक पर एकाधिकार का खतरा बढ़ गया है। 4. संयुक्त राष्ट्र का 'ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट' क्या है? यह 2024 में अपनाया गया एक वैश्विक समझौता है जिसका उद्देश्य देशों के बीच डिजिटल अंतर को कम करना और सुरक्षित तथा मानव-केंद्रित तकनीक को बढ़ावा देना है। 5. एआई के अनियंत्रित विकास से बेलीज ने क्या खतरे बताए? बेलीज के अनुसार, नियमों के बिना एआई असमानता बढ़ा सकता है, बुनियादी ढांचे को खतरे में डाल सकता है और बड़े पैमाने पर नौकरियां छीन सकता है। https://trendkia.com/america/united-nations-men-ai-takanika-ke-malikana-haka-para-chhiri-bahasa-s-jaishankar-aura-global-south-ke-netaon-ne-uthai-snprabhuta-ki-39326 TrendKia — Har trend, sabse pehle.