चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा स्टेशन लगाने की तैयारी में जुटे अमेरिका, रूस और चीन चंद्र अभियानों को निरंतर बिजली देने के मकसद से वैश्विक महाशक्तियां चांद की सतह पर परमाणु संयंत्र स्थापित करने की योजना पर तेजी से काम कर रही हैं। अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में वैश्विक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा अब केवल उपग्रहों या रोवर्स तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि चंद्रमा पर ऊर्जा के स्थायी स्रोत विकसित करने की ओर बढ़ चुकी है। भारत में अभी ऊर्जा उत्पादन के लिए पर्याप्त संख्या में परमाणु रिएक्टरों का विकास पूरा होना बाकी है, जबकि दूसरी ओर अमेरिका, चीन और रूस जैसे राष्ट्र पृथ्वी से आगे बढ़कर चंद्रमा की सतह पर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर स्थापित करने की ठोस रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। इन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा पर भेजे जाने वाले दीर्घकालिक अभियानों और भविष्य के चंद्र ठिकानों को बिना किसी रुकावट के लगातार बिजली उपलब्ध कराना है। नासा और रूस-चीन गठबंधन की अलग-अलग समयसीमा अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपनी योजना के अनुसार संभवतः वर्ष 2030 तक चंद्रमा पर अपना पहला परमाणु ऊर्जा रिएक्टर स्थापित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके समानांतर, रूस और चीन ने आपसी सहयोग से एक संयुक्त चंद्र बेस बनाने और वहां परमाणु संयंत्र तैयार करने का खाका खींचा है, जिसे वर्ष 2036 तक पूरा करने की योजना है। दोनों ही खेमे चंद्र सतह पर लंबे समय तक टिकने वाले मानव और रोबोटिक अभियानों के संचालन को सुरक्षित करने के लिए परमाणु ऊर्जा को सबसे भरोसेमंद विकल्प मान रहे हैं। चंद्र भूभाग पर संप्रभुता और अधिकार का नया सवाल सतह पर भारी बिजली संयंत्रों की स्थापना की इस होड़ ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानूनों और संप्रभुता से जुड़े कई नए विवादों को जन्म दिया है। अब यह बड़ा कूटनीतिक सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या परमाणु संयंत्र स्थापित करने के आधार पर कोई भी देश चंद्रमा के किसी खास भूभाग पर अपने विशेष अधिकार या नियंत्रण का दावा कर सकेगा। वर्तमान वैश्विक अंतरिक्ष समझौतों के बीच चंद्र संसाधनों के उपयोग और रणनीतिक नियंत्रण की इस नई दौड़ पर दुनिया भर के नीति विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं। इसका आप पर असर चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने की इस वैश्विक होड़ से भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कूटनीति के तौर-तरीके पूरी तरह बदल जाएंगे। • भारत में: घरेलू स्तर पर ऊर्जा विस्तार के बीच भारत को अपने भावी चंद्र अभियानों के लिए नए तकनीकी विकल्पों और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष संधियों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। वैश्विक मंचों पर अंतरिक्ष संसाधनों के निष्पक्ष उपयोग को लेकर भारतीय नीति निर्माताओं की भूमिका काफी अहम हो जाएगी। • अंतरिक्ष अनुसंधान पर: लंबे समय तक चलने वाले अभियानों को निरंतर बिजली मिलने से सौर ऊर्जा की सीमाओं से परे जाकर स्थायी चंद्र अनुसंधान संभव हो सकेगा। इससे वैज्ञानिकों के लिए चंद्रमा के दुर्गम अंधेरे क्षेत्रों में भी दीर्घकालिक शोध करना आसान हो जाएगा। • वैश्विक कूटनीति पर: भूभाग पर नियंत्रण को लेकर स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय नियम तय न होने पर महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक तनाव गहरा सकता है। इसके चलते संयुक्त राष्ट्र और संबंधित वैश्विक मंचों पर नए अंतरिक्ष दिशा-निर्देशों की मांग तेज होगी। • ऊर्जा नवाचार पर: बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले छोटे और सुरक्षित न्यूक्लियर रिएक्टरों की यह तकनीक भविष्य में पृथ्वी के सुदूर इलाकों में ऊर्जा आपूर्ति के काम भी आ सकती है। इससे अति-सुरक्षित कॉम्पैक्ट रिएक्टरों के निर्माण और इंजीनियरिंग को नई गति मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ चंद्र अभियानों को कई हफ्तों तक चलने वाली भीषण चंद्र रातों के दौरान जीवित रखने और भारी वैज्ञानिक उपकरणों को चौबीसों घंटे चलाने के लिए सौर ऊर्जा पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। इसी ऊर्जा संकट के स्थायी समाधान के लिए महाशक्तियां परमाणु तकनीक की ओर रुख कर रही हैं। • ऊर्जा की निरंतरता की आवश्यकता: चंद्रमा पर रातें लगभग चौदह पृथ्वी दिवसों तक खिंचती हैं, जहां अत्यधिक ठंड में सौर पैनल बिजली पैदा करने में असमर्थ रहते हैं। परमाणु रिएक्टर बिना सूर्य की रोशनी पर निर्भर रहे लगातार भारी मात्रा में ऊष्मा और बिजली प्रदान कर सकते हैं। • स्थायी चंद्र बेस की होड़: केवल अल्पकालिक चक्कर लगाने के बजाय अब देश वहां मानव युक्त बस्तियां और अनुसंधान केंद्र बनाने की तैयारी में हैं। इन ठिकानों के जीवन रक्षक तंत्र और प्रयोगशालाओं को चलाने के लिए विशाल ऊर्जा क्षमता की जरूरत है। • भू-राजनीतिक बढ़त: अंतरिक्ष में अपनी तकनीकी श्रेष्ठता साबित करने के लिए अमेरिका एक तरफ प्रयास कर रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन मिलकर संयुक्त शक्ति संतुलन बनाना चाहते हैं। पहले स्थायी ऊर्जा केंद्र स्थापित करने से संबंधित राष्ट्रों को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। सवाल-जवाब 1. अमेरिका चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर कब तक स्थापित करने की योजना बना रहा है? अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा संभवतः वर्ष 2030 तक चंद्रमा की सतह पर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर स्थापित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। 2. रूस और चीन मिलकर कब तक चंद्र रिएक्टर बनाने की तैयारी में हैं? रूस और चीन आपसी सहयोग से वर्ष 2036 तक चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा रिएक्टर तैयार करने की संयुक्त योजना पर काम कर रहे हैं। 3. चंद्र अभियानों के लिए परमाणु ऊर्जा को क्यों जरूरी माना जा रहा है? चंद्रमा पर भेजे जाने वाले दीर्घकालिक अभियानों और भविष्य के बेस को बिना रुकावट लगातार भारी मात्रा में बिजली उपलब्ध कराने के लिए परमाणु रिएक्टर आवश्यक हैं। 4. चंद्रमा पर रिएक्टर लगाने से कौन सा कानूनी सवाल उठ रहा है? इस कदम से यह सवाल खड़ा हुआ है कि क्या कोई देश परमाणु संयंत्र स्थापित करने के आधार पर चंद्रमा के किसी भूभाग पर संप्रभु अधिकार का दावा कर सकता है। https://trendkia.com/america/united-states-russia-aura-china-ki-chanda-para-nyukliyara-riektara-lagane-ki-taiyari-43040 TrendKia — Har trend, sabse pehle.