वॉशिंगटन और जेरूसलम के चुनावी झटकों के बीच ईरान नीति और मध्य पूर्व तनाव पर बढ़ा नया संकट अमेरिका और इजरायल में हालिया चुनावी नतीजों के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के सामने राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है, जिससे आठ महीने से जारी ईरान संघर्ष के भावी रणनीतिक कदमों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अमेरिका और इजरायल में हाल में संपन्न हुए चुनाव परिणामों ने दोनों देशों के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के सामने बेहद जटिल परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं। एक तरफ जहां अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन अपनी स्पष्ट बहुमत खो चुका है। ईरान के खिलाफ सैन्य अभियानों और हवाई हमलों को अंजाम देने वाले इन दोनों प्रमुख राष्ट्रों के भीतर उपजे इस राजनीतिक फेरबदल के कारण आठ महीने से चले आ रहे युद्ध के भविष्य और आगे की रणनीतियों को लेकर वैश्विक स्तर पर नई बहस छिड़ गई है। संसद पर विपक्ष का नियंत्रण और अमेरिकी विदेश नीति पर बढ़ता दबाव अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के घोषित नतीजों के अनुसार डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों प्रमुख सदनों, यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी मतदाताओं ने ईरान के खिलाफ जारी युद्ध और उसके कारण उपजे आर्थिक संकट के प्रति अपना कड़ा असंतोष व्यक्त करते हुए यह जनादेश दिया है। हालांकि, अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था के तहत डोनाल्ड ट्रंप अभी भी देश के कमांडर-इन-चीफ पद पर बने हुए हैं, जिससे सैन्य अभियानों और विदेश नीति के क्रियान्वयन का मूल अधिकार उनके पास ही सुरक्षित है। इसके बावजूद, अब डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस जांच प्रक्रियाओं, बजटीय आवंटन पर रोक, और कड़े कानून बनाकर प्रशासन की नीतियों पर कड़ा दबाव बनाने में सक्षम हो गई है, भले ही वह सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाइयों को रोकने का आदेश न दे सके। इजरायल में त्रिशंकु जनादेश और नई सरकार का अनिश्चित गणित दूसरी ओर, इजरायल में 27 अक्टूबर को आयोजित हुए संसदीय चुनाव के नतीजों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति को काफी उलझा दिया है। 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद नेसेट में बहुमत का आंकड़ा 61 सीटों का है, जिसे हासिल करने में नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन पूरी तरह विफल रहा। इसके साथ ही, गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन भी सरकार बनाने के आवश्यक आंकड़े को हासिल नहीं कर सका है। इस त्रिशंकु स्थिति के बीच इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने आधिकारिक रूप से चुनाव परिणामों को स्वीकार करते हुए नई सरकार के गठन की संभावनाओं पर विभिन्न राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया आरंभ कर दी है। फिलहाल, नई व्यवस्था बनने तक बेंजामिन नेतन्याहू केवल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। आर्थिक तंगी, ईंधन की कीमतें और जनता की नाराजगी मध्य पूर्व में लगभग आठ महीनों से जारी अमेरिकी-इजरायली संघर्ष का व्यापक दुष्प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की दरों में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आम जनता को पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की भारी कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार बढ़ते जीवन-यापन के खर्च और महंगाई की मार से नागरिक अत्यधिक परेशान हैं, जिसे अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की हार का एक मुख्य कारण माना जा रहा है। इजरायल में जारी राजनीतिक अनिश्चितता और गठबंधन वार्ताओं के अंतिम दौर से भी तेहरान के प्रति भावी कूटनीतिक दृष्टिकोण प्रभावित होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। दोहा कूटनीति, होर्मुज का प्रस्ताव और ईरान की सख्त चेतावनी इस बीच कूटनीतिक मोर्चे पर भी कुछ महत्वपूर्ण गतिविधियां देखी जा रही हैं। कतर की राजधानी दोहा में चल रही वार्ताओं के दौरान ईरान ने यह प्रस्ताव रखा है कि यदि अमेरिका उसकी निर्धारित शर्तों को स्वीकार कर लेता है, तो वह मात्र दो दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा व्यापार के लिए खोल सकता है और शांति वार्ता को फिर से शुरू कर सकता है। इस संदर्भ में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न कूटनीतिक स्तरों पर बातचीत की प्रक्रिया जारी है और अमेरिका शांतिपूर्ण समाधान के लिए तैयार है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने भी कूटनीति का मार्ग चुनने की अपनी मंशा व्यक्त की है। हालांकि, कूटनीतिक पहलों के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर मोजेतबा खामेनेई ने एक सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि अमेरिका या इजरायल द्वारा पुनः कोई सैन्य हमला किया जाता है, तो ईरान बिना किसी भौगोलिक सीमा के कड़ा जवाब देगा। वॉशिंगटन और जेरूसलम में बदले राजनीतिक परिदृश्य ने तेहरान के साथ समझौते का दबाव तो बढ़ाया है, लेकिन युद्ध का अंत दोनों देशों के नेताओं की नई मजबूरियों पर निर्भर करेगा। इसका आप पर असर मध्य पूर्व में आठ महीने से जारी युद्ध और अमेरिका-इजरायल के राजनीतिक परिदृश्य में आए बदलाव का सीधे तौर पर आम नागरिकों की जेब और दैनिक खर्चों पर प्रभाव पड़ेगा। • पेट्रोल और ईंधन दरें: खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से भारत समेत वैश्विक बाजारों में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। यदि दोहा वार्ता के माध्यम से होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा खुलता है, तो आने वाले हफ्तों में ईंधन के दामों में राहत मिल सकती है। • रसोई और यात्रा बजट: ईंधन महंगा रहने से परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिससे दैनिक उपभोग की वस्तुओं, सब्जियों और विमान या बस यात्रा का किराया प्रभावित होगा। उपभोक्ताओं को अगले कुछ महीनों तक अपने मासिक बजट को सतर्कता से प्रबंधित करना होगा। • वैश्विक बाजार और निवेश: युद्ध और राजनीतिक अनिश्चितता के कारण शेयर बाजारों और म्यूचुअल फंड्स में अस्थिरता बनी रह सकती है। निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर बनाए रखनी चाहिए। • घरेलू मुद्रास्फीति पर असर: कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयात बिल को बढ़ाती हैं, जिससे रुपये की विनिमय दर और देश में सामान्य महंगाई दर पर सीधा असर पड़ता है। ऐसा क्यों हुआ वाशिंगटन और जेरूसलम में आए राजनीतिक बदलाव तथा मध्य पूर्व में कूटनीतिक मोड़ के पीछे कई प्रमुख कारण और पृष्ठभूमि जिम्मेदार रहे हैं। • युद्ध जनित महंगाई से जनाक्रोश: आठ महीने लंबे संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और ईंधन की कीमतें बढ़ीं, जिससे उपजी महंगाई ने अमेरिकी मतदाताओं में सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ असंतोष पैदा किया और रिपब्लिकन पार्टी को मध्यावधि चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। • इजरायल में त्रिशंकु जनादेश: इजरायल के 27 अक्टूबर के संसदीय चुनाव में न तो प्रधानमंत्री नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को 120 सदस्यीय नेसेट में 61 का बहुमत मिला और न ही गादी आइजनकोट के विपक्षी गठबंधन को बहुमत मिला, जिससे नई सरकार के गठन पर गतिरोध कायम हुआ। • आर्थिक व कूटनीतिक दबाव: नाकेबंदी और आर्थिक संकट के बीच ईरान ने दोहा वार्ता में दो दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने और अमेरिका से शर्त आधारित शांति वार्ता शुरू करने की कूटनीतिक पेशकश की। • संसदीय निगरानी का खतरा: अमेरिका में डेमोक्रेट्स द्वारा कांग्रेस के दोनों सदनों हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर नियंत्रण हासिल करने के बाद अब राष्ट्रपति प्रशासन पर विदेश नीति की समीक्षा और बजटीय दबाव बढ़ गया है। • सैन्य तनाव और चेतावनी: कूटनीतिक बातचीत के समानांतर, सुप्रीम लीडर मोजेतबा खामेनेई द्वारा नए हमलों की स्थिति में बिना भौगोलिक सीमा के कड़े जवाब की चेतावनी ने संघर्ष के पुनः भड़कने की आशंका को बनाए रखा है। सवाल-जवाब 1. अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में किस पार्टी ने कांग्रेस पर कब्जा किया है? डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। 2. क्या अमेरिकी कांग्रेस ईरान के खिलाफ युद्ध को सीधे रोक सकती है? नहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कमांडर-इन-चीफ के रूप में सैन्य फैसले लेते हैं, लेकिन कांग्रेस सुनवाई, बजट नियंत्रण और कानूनों के जरिए प्रशासन पर दबाव बना सकती है। 3. इजरायल के संसदीय चुनाव में बहुमत का क्या आंकड़ा था और क्या नेतन्याहू को बहुमत मिला? 120 सदस्यीय नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटों की आवश्यकता थी, लेकिन प्रधानमंत्री नेतन्याहू का गठबंधन और गादी आइजनकोट का विपक्षी गठबंधन दोनों ही बहुमत पाने में विफल रहे। 4. ईरान ने दोहा वार्ता में शांति के लिए क्या प्रस्ताव रखा है? ईरान ने प्रस्ताव दिया है कि यदि अमेरिका उसकी शर्तें मानता है, तो वह दो दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य खोल सकता है और शांति वार्ता फिर शुरू कर सकता है। 5. ईरान के सुप्रीम लीडर मोजेतबा खामेनेई ने क्या चेतावनी दी है? सुप्रीम लीडर मोजेतबा खामेनेई ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका या इजरायल फिर हमला करते हैं, तो ईरान बिना किसी भौगोलिक सीमा के जवाब देगा। https://trendkia.com/america/washington-aura-jerusalem-ke-chunavi-jhatakon-ke-bicha-iran-niti-aura-madhya-purva-tanava-para-barha-naya-snkata-57898 TrendKia — Har trend, sabse pehle.