# अरुणाचल के तवांग में मिलीं जंगली मधुमक्खियों की दुर्लभ प्रजातियां, बर्फीले पहाड़ों में परागण का नया रहस्य उजागर

> भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने तवांग के उच्च पर्वतीय इलाकों में मधुमक्खियों और भौंरों की समृद्ध विविधता दर्ज की है। अध्ययन में अल्पाइन फूलों वाले क्षेत्रों के संरक्षण को पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी बताया गया।

**Type:** article · **Category:** अरुणाचल प्रदेश · **Published:** 2026-10-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/arunachal-pradesh/arunachal-ke-tawang-men-milin-jngali-madhumakkhiyon-ki-durlabha-prajatiyan-barphile-paharon-men-paragana-ka-naya-rahasya-ujagara-44865 · **Language:** Hindi
**Tags:** तवांग, अरुणाचल प्रदेश, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, मधुमक्खियां, हिमालयी जैव विविधता, अल्पाइन पौधे

पूर्वी हिमालय की बर्फीली चोटियों और ठंडी हवाओं के बीच अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला जैव विविधता का अनोखा घर साबित हुआ है। समुद्र तल से हजारों मीटर की ऊंचाई पर जहां वनस्पति बेहद सीमित हो जाती है, वहां जंगली मधुमक्खियों और भौंरों का एक समृद्ध संसार बसता है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक गहन वैज्ञानिक अध्ययन ने साबित किया है कि ये छोटे परागणकर्ता ऊंचाई वाले कठोर पर्यावरण में भी जीवित रहने के लिए स्थानीय अल्पाइन वनस्पतियों पर गहराई से निर्भर हैं।

## सीमाई इलाकों में व्यापक फील्डवर्क
यह सर्वेक्षण नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज के अंतर्गत 15 सितंबर से 7 अक्टूबर के दौरान संचालित किया गया। अनुसंधान दल ने 2,000 मीटर से लेकर 4,700 मीटर तक की अत्यधिक ऊंचाई वाले भौगोलिक हिस्सों की पड़ताल की। इस दौरान भारत-चीन सीमा के निकटवर्ती अनेक अहम स्थानों जैसे सेला दर्रा, बुमला दर्रा, नागुला, संगेत्सर त्सो, चूमी ग्यात्से जलप्रपात और जांग में जमीनी नमूने जुटाए गए। जोधपुर स्थित भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के डेजर्ट रीजनल सेंटर की टीम ने इस खोज को अंजाम दिया, जिसमें रिसर्च एसोसिएट पूर्णिमा पाठक के नेतृत्व में प्रोजेक्ट असिस्टेंट हाबुंग एल्सा शामिल थीं।

## चार प्रमुख परिवारों की पहचान और फूलों से रिश्ता
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से चार परिवारों से जुड़ी मधुमक्खियों को चिन्हित किया, जिनमें एपिडे, मेगाचिलिडे, एंड्रिनिडे और हेलिक्टिडे शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने खासतौर पर भौंरों की गतिविधियों और उनके पराग व नेक्टर जुटाने की आदतों का बारीकी से निरीक्षण किया। ऊंचे पहाड़ों में पाए जाने वाले अल्पाइन पौधे, जो ट्री-लाइन से ऊपर कठोर बर्फीले मौसम में प्राकृतिक रूप से उगते हैं, इन कीटों के जीवन की रीढ़ हैं।

विशेष रूप से सिरसियम प्रजाति के पौधे, पेटमा मेंटो नाम से स्थानीय तौर पर पहचाना जाने वाला रोज़ कार्पेट नॉटवीड (बिस्टॉर्टा वैसीनिफोलिया) और सिसेरबिटा अल्पीना इन मधुमक्खियों के प्रमुख पोषण स्रोत बनकर उभरे। तवांग में फूलों का मौसम काफी सीमित समय के लिए रहता है, इसलिए कीटों को पूरे चक्र में विविध प्रकार के पौधों की लगातार उपलब्धता की दरकार होती है। इसके अलावा इंसानी बस्तियों के पास तैयार किचन गार्डन, कृषि फार्म और स्थानीय फूलों ने भी आवश्यक पराग आपूर्ति में अहम भूमिका निभाई।

## पर्यावरणीय खतरे और भविष्य की योजना
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक आवासों का क्षरण, मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के कारण फूलों के खिलने के समय में आ रहा असंतुलन इन परागणकर्ताओं के भोजन चक्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक केवल मधुमक्खियों को बचाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन अल्पाइन चारागाहों और जड़ी-बूटियों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है जिन पर इनका अस्तित्व टिका है। एकत्र किए गए आंकड़े आने वाले समय में पूर्वी हिमालय में विस्तृत पर्यावास मैपिंग और वैज्ञानिक निगरानी परियोजनाओं के लिए आधार रेखा का कार्य करेंगे।

## इसका आप पर असर
पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र में जंगली मधुमक्खियों की यह खोज पर्यावरण संतुलन और स्थानीय बागवानी दोनों पर सीधा असर डालती है।

- **भारत में:** हिमालयी क्षेत्र में परागणकर्ताओं की सुरक्षा से देश की जैविक विविधता और औषधीय पादप संपदा को दीर्घकालिक सुरक्षा मिलेगी। राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मापने के लिए यह डेटा महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार तैयार करेगा।
- **अरुणाचल प्रदेश में:** तवांग और आसपास के किसानों के सेब, कीवी और किचन गार्डन की फसलों की बेहतर पैदावार सीधे तौर पर इन जंगली परागणकर्ताओं की मौजूदगी पर टिकी है। स्थानीय वनस्पतियों और अल्पाइन चारागाहों को नुकसान पहुंचने पर ग्रामीण इलाकों में कृषि उत्पादन घट सकता है।
- **पर्यावरण संरक्षण:** ऊंचाई वाले इलाकों में अनियंत्रित मानवीय निर्माण और पर्यटन गतिविधियों पर नियमन आवश्यक हो जाता है। अल्पाइन फूलों को बचाने के लिए स्थानीय प्रशासन को हरित बफर जोन की दिशा में कदम उठाने होंगे।
- **पारंपरिक ज्ञान:** पेटमा मेंटो जैसे स्थानीय औषधीय व जंगली पौधों के संरक्षण से जनजातीय ज्ञान और स्थानीय पारिस्थितिकी को नया बल मिलेगा। ग्रामीण समुदाय अपने आसपास के प्राकृतिक फूलों को सुरक्षित रखकर मधुमक्खियों के पोषण में योगदान दे सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
तवांग के 4,700 मीटर ऊंचे इलाकों में परागणकर्ताओं की इस विविधता को समझने के लिए भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने विशेष अभियान चलाया। जलवायु परिवर्तन और सीमित पुष्पन अवधि के कारण इन क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति दर्ज करना आवश्यक हो गया था।

- **सीमित मौसमी चक्र:** अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित पर्वतीय ढलानों में फूलों के खिलने की अवधि काफी छोटी होती है। जीवित रहने के लिए भौंरों और मधुमक्खियों को इस अल्पकालिक समय में विविध पुष्प प्रजातियों के दोहन की अनुकूलता विकसित करनी पड़ी।
- **विशिष्ट अल्पाइन आवास:** ट्री-लाइन से ऊपर पाई जाने वाली विशेष वनस्पतियां जैसे सिरसियम और पेटमा मेंटो इन कीटों को अत्यंत विपरीत मौसम में भी पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराती हैं। इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों ने इन प्रजातियों को अत्यधिक ठंड में पनपने में मदद की।
- **बस्तियों की निकटता:** इंसानी रिहायशों के आसपास लगने वाले बगीचों और खेतों ने प्राकृतिक चारागाहों के साथ मिलकर भोजन के वैकल्पिक स्रोत प्रदान किए। इस मिश्रित उपलब्धता ने विषम ऊंचाई पर भी मधुमक्खियों की चार परिवारों की मौजूदगी को संभव बनाया।

## सवाल-जवाब

### 1. तवांग में यह वैज्ञानिक सर्वेक्षण किस संस्था ने किया?
यह अध्ययन भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के जोधपुर स्थित डेजर्ट रीजनल सेंटर की टीम द्वारा किया गया।

### 2. फील्डवर्क किन ऊंचाइयों और तारीखों के बीच संपन्न हुआ?
यह शोध 15 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच समुद्र तल से 2,000 से 4,700 मीटर की ऊंचाई पर संचालित हुआ।

### 3. तवांग में मधुमक्खियों के कौन से चार परिवार दर्ज किए गए?
वैज्ञानिकों ने एपिडे, मेगाचिलिडे, एंड्रिनिडे और हेलिक्टिडे नामक चार परिवारों की पहचान की।

### 4. भौंरों के मुख्य भोजन के रूप में कौन से पौधे सामने आए?
सिरसियम प्रजातियां, पेटमा मेंटो (रोज़ कार्पेट नॉटवीड) और सिसेरबिटा अल्पीना उनके प्राथमिक आहार पाए गए।

### 5. अध्ययन दल का नेतृत्व किसने किया?
रिसर्च एसोसिएट पूर्णिमा पाठक ने टीम का नेतृत्व किया, जिसमें प्रोजेक्ट असिस्टेंट हाबुंग एल्सा सहयोगी थीं।

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