अरुणाचल के जीरो में पक्षी प्रेमियों को दिखा दुर्लभ रेड-कॉलर्ड डव, 15 प्रजातियां दर्ज अरुणाचल प्रदेश की जीरो घाटी में आयोजित 35वें बर्ड वॉक के दौरान ऊंचाई वाले इलाके में असामान्य रूप से रेड-कॉलर्ड डव पक्षी देखा गया। इस आयोजन में पर्यावरणविदों ने कुल 15 पक्षी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की। अरुणाचल प्रदेश के निचले सुबनसिरी जिले में स्थित सुरम्य जीरो घाटी एक बार फिर पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र बन गई। पारंपरिक कृषि भूमि पिगे अजी में संपन्न हुए जीरो बर्ड वॉक के 35वें संस्करण के दौरान कुल 15 विभिन्न पक्षी प्रजातियों की पहचान की गई। इस बार के अभियान का सबसे प्रमुख आकर्षण ऊंचाई वाले क्षेत्र में रेड-कॉलर्ड डव का अचानक नजर आना रहा। अमूमन निचले मैदानी या कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दिखने वाले इस पक्षी का इतनी ऊंचाई पर पाया जाना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए काफी अप्रत्याशित और सुखद आश्चर्य लेकर आया। शरदकालीन प्रवास और दुर्लभ प्रजातियों की खोज जीरो घाटी का पिगे अजी इलाका अपनी पारंपरिक खेती के साथ-साथ मौसम बदलने पर प्रवासी पक्षियों की पसंदीदा पनाहगाह के तौर पर जाना जाता है। बदलते मौसम के इस दौर में यहां सैकड़ों परिंदे अस्थायी ठिकाना तलाशते हैं। इस बार के बर्ड वॉक के दौरान रेड-कॉलर्ड डव के अलावा अन्य महत्वपूर्ण पक्षी प्रजातियां भी कैमरे और दूरबीनों में कैद हुईं। इनमें नदर्न लैपविंग, पैसिफिक गोल्डन प्लोवर, हिमालयन बज़ार्ड और यूरेशियन स्पैरोहॉक प्रमुख रूप से शामिल रहे। पक्षी विशेषज्ञों और फील्ड गाइडों ने ऊंचाई वाले वातावरण में इन प्रजातियों की उपस्थिति पर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता जताई है। प्रकृति प्रेमियों और स्थानीय समुदाय की साझी मुहिम इस प्रकृति भ्रमण में स्थानीय प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव संरक्षणकर्ताओं और अनुभवी बर्डवॉचर्स ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों ने घाटी के समृद्ध और विविधतापूर्ण पक्षी जीवन का जायजा लिया। साथ ही, इन परिंदों के प्राकृतिक आवासों को मानवीय दखल से सुरक्षित रखने के उपायों पर जोर दिया गया। वन्यजीव प्रेमी कोज मामा और उनके सहयोगी पर्यावरण संरक्षकों द्वारा शुरू की गई यह पहल अब एक मजबूत जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। इसका प्राथमिक उद्देश्य आम नागरिकों में स्थानीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी संतुलन के प्रति संवेदनशीलता जगाना है। संस्थागत सहयोग और भावी संरक्षण की उम्मीद जीरो बर्ड वॉक के इस सफल आयोजन में अरुणाचल प्रदेश पर्यावरण एवं वन विभाग, अरुणाचल पर्यटन, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा अरुणाचल प्रदेश बर्डिंग क्लब ने स्थानीय साझेदारों के साथ मिलकर अपना पूरा सहयोग दिया। आयोजकों ने बताया कि यह सामुदायिक पहल देशी और प्रवासी दोनों तरह के पक्षियों के लिए जीरो घाटी के महत्व को वैश्विक पटल पर रेखांकित करती है। आयोजकों को विश्वास है कि इस तरह के प्रयासों से स्थानीय आबादी और विशेष रूप से युवा पीढ़ी पक्षी दर्शन तथा पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित होगी। इसका आप पर असर यह आयोजन स्थानीय पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने और पर्यावरण पर्यटन के नए अवसर खोलने की दिशा में महत्वपूर्ण है। • भारत में: देश भर के पक्षी प्रेमियों और पर्यावरण शोधकर्ताओं के लिए पूर्वोत्तर भारत के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रवासी पक्षियों के नए व्यवहार को समझने का अवसर मिला है। इससे राष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव पर्यटन और पक्षी दर्शन से जुड़ी यात्राओं को नई दिशा मिलेगी। • अरुणाचल प्रदेश में: जीरो घाटी और निचले सुबनसिरी के युवाओं के लिए प्रकृति आधारित पर्यटन तथा बर्ड गाइडिंग में स्थानीय रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं। पारंपरिक खेती वाले क्षेत्रों को बिना नुकसान पहुंचाए पक्षी संरक्षण का एक व्यावहारिक मॉडल स्थानीय समुदाय को मिला है। • शोधकर्ताओं के लिए: कम ऊंचाई पर रहने वाले पक्षी का अधिक ऊंचाई पर मिलना जलवायु और वास स्थल के बदलावों पर नए वैज्ञानिक अध्ययन की जमीन तैयार करता है। फील्ड शोधकर्ता अब इस इलाके में मौसम परिवर्तन के समय पक्षियों के बदलते रास्तों पर बारीक नजर रख सकेंगे। • स्थानीय किसानों के लिए: पारंपरिक पिगे अजी खेतों में पक्षियों की बढ़ती आमद से कृषि भूमि की पारिस्थितिकी बेहतर होती है। किसान अपनी सदियों पुरानी कृषि पद्धतियों को संरक्षित रखते हुए पर्यावरण संरक्षण के साझीदार बन रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ जीरो घाटी में दुर्लभ पक्षी की मौजूदगी और विविध प्रजातियों का दिखना मुख्य रूप से शरद ऋतु के मौसमी बदलाव और सुरक्षित पारंपरिक कृषि क्षेत्र की उपलब्धता के कारण हुआ है। • शरदकालीन मौसमी बदलाव: तापमान में गिरावट आने के कारण कई प्रवासी पक्षी अपने मूल प्रजनन क्षेत्रों से सुरक्षित और अनुकूल स्थानों की ओर रुख करते हैं। इसी प्राकृतिक चक्र के दौरान जीरो घाटी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण पारगमन पड़ाव साबित होती है। • पारंपरिक कृषि भूमि का अनुकूल परिवेश: पिगे अजी क्षेत्र में की जाने वाली पारंपरिक खेती के कारण परिंदों को प्रचुर मात्रा में भोजन और सुरक्षित ठिकाना मिलता है। बिना अत्यधिक रसायनों और छेड़छाड़ के प्रबंधित यह इलाका पक्षियों को प्राकृतिक रूप से आकर्षित करता है। • असामान्य ऊंचाई पर मौजूदगी: रेड-कॉलर्ड डव का अमूमन निचले इलाकों में देखा जाना आम है, लेकिन मौसमी हवाओं या भोजन की खोज में पक्षी कभी-कभार ऊंचाई वाले रास्तों पर पहुंच जाते हैं। हालांकि इसकी सटीक वजह पर अभी विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण होना बाकी है। सवाल-जवाब 1. जीरो बर्ड वॉक का कौन सा संस्करण आयोजित किया गया था? यह जीरो बर्ड वॉक का 35वां संस्करण था, जो शरद ऋतु के दौरान आयोजित किया गया। 2. इस बर्ड वॉक के दौरान कुल कितनी पक्षी प्रजातियां दर्ज की गईं? इस आयोजन के दौरान शोधकर्ताओं और पक्षी प्रेमियों ने कुल 15 पक्षी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की। 3. इस आयोजन का सबसे असामान्य और मुख्य आकर्षण क्या रहा? निचले इलाकों में पाए जाने वाले रेड-कॉलर्ड डव पक्षी को एक ऊंचाई वाले स्थान पर असामान्य रूप से देखा जाना इसका मुख्य आकर्षण रहा। 4. यह बर्ड वॉक किस खास जगह पर आयोजित किया गया था? यह अरुणाचल प्रदेश के निचले सुबनसिरी जिले में जीरो घाटी के पिगे अजी पारंपरिक कृषि क्षेत्र में आयोजित किया गया था। 5. रेड-कॉलर्ड डव के अलावा वहां कौन से अन्य पक्षी देखे गए? अन्य पक्षियों में नदर्न लैपविंग, पैसिफिक गोल्डन प्लोवर, हिमालयन बज़ार्ड और यूरेशियन स्पैरोहॉक शामिल थे। 6. जीरो बर्ड वॉक की शुरुआत किसने की थी? इसकी शुरुआत वन्यजीव प्रेमी कोज मामा और अन्य स्थानीय प्रकृति प्रेमियों ने मिलकर की थी। 7. इस आयोजन को किन सरकारी विभागों और संस्थाओं का सहयोग मिला? इसे अरुणाचल प्रदेश पर्यावरण एवं वन विभाग, अरुणाचल पर्यटन, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा अरुणाचल प्रदेश बर्डिंग क्लब का सहयोग मिला। प्रेरणा और सबक कोज मामा और उनके साथी प्रकृति प्रेमियों द्वारा शुरू की गई यह सामुदायिक पहल दर्शाती है कि सीमित संसाधनों में भी पर्यावरण की बड़ी रक्षा की जा सकती है। • सामुदायिक पहल की शक्ति: जब स्थानीय नागरिक अपने परिवेश की जिम्मेदारी खुद लेते हैं, तो वह एक स्थाई संरक्षण मॉडल बन जाता है। किसी सरकारी आदेश की प्रतीक्षा किए बिना शुरू किया गया यह बर्ड वॉक आज 35वें पड़ाव पर पहुंच चुका है। • अपनी जड़ों और परंपरा का सम्मान: पिगे अजी जैसी पारंपरिक कृषि भूमियों को नष्ट किए बिना प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर संरक्षण संभव है। हमारी पुरानी जीवनशैली में ही पर्यावरण बचाने के सूत्र छिपे हुए हैं। • नई पीढ़ी को जोड़ने का महत्व: प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति युवाओं में रुचि जगाना ही किसी भी संरक्षण प्रयास को दीर्घकालिक सफलता दिला सकता है। युवा जब पक्षियों को पहचानेंगे, तभी वे उनके जंगलों और आवासों की रक्षा करेंगे। https://trendkia.com/arunachal-pradesh/arunachal-ke-ziro-men-pakshi-premiyon-ko-dikha-durlabha-red-collared-dove-15-prajatiyan-darja-53895 TrendKia — Har trend, sabse pehle.