अरुणाचल प्रदेश के तिराप में वन्यजीवों की निगरानी शुरू, न्यू तुपी के सामुदायिक जंगल में लगाए गए कैमरा ट्रैप अरुणाचल प्रदेश के तिराप जिले में न्यू तुपी गांव के सामुदायिक जंगल में वन्यजीवों का वैज्ञानिक डेटा तैयार करने के लिए कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। इस अभियान में ग्रामीणों और विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया है। अरुणाचल प्रदेश के तिराप जिले में जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय वन्यजीवों के दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण जमीनी कदम उठाया गया है। न्यू तुपी गांव के सामुदायिक वन क्षेत्र में जानवरों की आवाजाही को ट्रैक करने के उद्देश्य से आधुनिक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। इस पूरे अभियान की खास बात यह रही कि इसमें वन विशेषज्ञों के साथ-साथ गांव के स्थानीय निवासियों ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और तकनीकी उपकरणों की स्थापना में मदद की। न्यू तुपी के जंगलों में स्थानीय निवासियों की भागीदारी इस अभियान को तिराप स्थित गैर-लाभकारी संगठन हिंथोंग फाउंडेशन ने अंजाम दिया। एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, उपकरण लगाने और उपयुक्त जगहों की पहचान करने के लिए लगभग 15 से 20 लोग मैदान में उतरे। इस टीम में न्यू तुपी के ग्राम प्रमुख, समुदाय के वरिष्ठ नेता, युवा संगठन के अध्यक्ष, स्वयंसेवक और फाउंडेशन के एक इंटर्न शामिल रहे। इसके अलावा पूर्व तिराप उपायुक्त तथा फाउंडेशन के सलाहकार तेचु अरन भी इस संयुक्त दल का हिस्सा बने। कैमरा ट्रैप लगाने की पूरी प्रक्रिया को बहुत सावधानी से पूरा किया गया। कैमरों को जंगल के ऐसे चुनिंदा रास्तों और रणनीतिक स्थानों पर लगाया गया है, जहां जानवरों की स्वाभाविक गतिविधियों में कोई बाधा न पहुंचे। इन कैमरों के जरिए इकट्ठा की जाने वाली तस्वीरों और फुटेज से इलाके में मौजूद विभिन्न प्रजातियों की सटीक पहचान संभव होगी, जिससे भविष्य में जैव विविधता के संरक्षण के लिए एक ठोस वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करने में मदद मिलेगी। फील्ड सर्वे के दौरान मिले कई जीवों के निशान कैमरा ट्रैप लगाने के दौरान जब टीम जंगल के विभिन्न हिस्सों से गुजरी, तो उन्हें कई वन्यजीवों के प्रत्यक्ष प्रमाण मिले। सर्वेक्षण के दौरान जंगली सूअर और भौंकने वाले हिरण (बार्किंग डियर) के पैरों के ताजे निशान पाए गए। इसके अलावा पेड़ों और झाड़ियों के पास हिमालयी काले भालू के पंजों के निशान भी दिखाई दिए, जिससे इस क्षेत्र में उनकी सक्रियता का संकेत मिलता है। टीम ने जंगली सूअरों के खान-पान की जगहों की पहचान की। साथ ही कुछ दिन पहले जंगल के एक अन्य हिस्से में पैंगोलिन की मांद भी देखी गई थी। न्यू तुपी के ग्रामीणों ने यह भी जानकारी दी कि वे सुबह के वक्त नियमित रूप से हूलॉक गिब्बन की आवाजें सुनते हैं। मोरे कंजर्वेशन फाउंडेशन के फील्ड बायोलॉजिस्ट और इस कार्यक्रम के संसाधन व्यक्ति किमे ओबिन ने भी कैमरे लगाने से पहले की सुबह हूलॉक गिब्बन की पुकार खुद सुनी थी। ओबिन ने इस तकनीकी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सही स्थान चुनने तथा कैमरे लगाने में दल का मार्गदर्शन किया। संरक्षण प्रयासों को मिलेगी नई दिशा इस पूरे निगरानी कार्य के लिए आवश्यक उपकरण नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (एनसीएफ) द्वारा उपलब्ध कराए गए। इस मुहिम का नेतृत्व हिंथोंग फाउंडेशन के सह-संस्थापक और संरक्षणवादी चाजो लोवांग तथा सारा खोंगसाई कर रहे हैं। यह दोनों विशेषज्ञ पिछले करीब पांच वर्षों से इस इलाके में जैव विविधता संरक्षण से जुड़े कार्यों में सक्रिय हैं और उनके काम की सबसे बड़ी ताकत स्थानीय समुदायों की भागीदारी रही है। संस्था का मानना है कि ग्रामीणों की पारंपरिक जानकारी और जंगलों के उनके व्यावहारिक अनुभव से कैमरा ट्रैप के वैज्ञानिक आंकड़ों को पुख्ता संदर्भ मिलेगा। न्यू तुपी के जंगलों से मिलने वाली तस्वीरों और रिकॉर्ड से न केवल तिराप में मौजूद जीवों की एक स्पष्ट तस्वीर उभरेगी, बल्कि दीर्घकालिक संरक्षण योजनाएं बनाने में भी भारी मदद मिलेगी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य केवल जानवरों की गिनती करना नहीं, बल्कि गांव के लोगों में अपने वनों के प्रति संरक्षण की भावना को और ज्यादा मजबूत करना है। इसका आप पर असर इस पहल से पूर्वोत्तर के सामुदायिक वनों में वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय निगरानी का एक व्यावहारिक मॉडल स्थापित होगा। • भारत में: यह अभियान दर्शाता है कि कैसे ग्रामीण समुदायों और वैज्ञानिक संस्थाओं का तालमेल बिना सरकारी बजट पर निर्भर रहे वन्यजीवों का संरक्षण कर सकता है। पूरे देश में सामुदायिक वनों के प्रबंधन के लिए इस तरह के सहयोगात्मक मॉडल को अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। • अरुणाचल प्रदेश में: न्यू तुपी और तिराप के ग्रामीण अब शिकार जैसी गतिविधियों से हटकर अपने वनों के सक्रिय संरक्षक बन रहे हैं। क्षेत्र के दुर्लभ जीवों जैसे पैंगोलिन और हूलॉक गिब्बन के वैज्ञानिक प्रमाण मिलने से स्थानीय पर्यटन और संरक्षण फंड के नए रास्ते खुल सकते हैं। • शोधकर्ताओं के लिए: वैज्ञानिकों को दूरदराज के जंगलों से दुर्लभ हिमालयी प्रजातियों का सटीक और प्रामाणिक डेटा हासिल होगा। यह जानकारी पूर्वोत्तर भारत के जैव विविधता मानचित्र को अपडेट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। • पर्यावरण प्रेमियों के लिए: यह साबित करता है कि स्थानीय लोगों की पारंपरिक जानकारी और आधुनिक तकनीक मिलकर विलुप्तप्राय जीवों की रक्षा कर सकते हैं। आम नागरिक भी अपने नजदीकी वनों में इस तरह के नागरिक विज्ञान अभियानों से प्रेरणा ले सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ तिराप जिले के न्यू तुपी गांव में यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि सामुदायिक जंगलों में मौजूद समृद्ध वन्यजीवों का कोई प्रामाणिक वैज्ञानिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। स्थानीय भागीदारी के बिना ऐसे दूरदराज के इलाकों में शिकार रोकना और जैव विविधता को सुरक्षित रखना संभव नहीं था। • वैज्ञानिक प्रमाण का अभाव: न्यू तुपी के जंगलों में कई दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी की बात कही जाती थी, लेकिन उनके कोई ठोस फोटोग्राफिक सबूत नहीं थे। कैमरा ट्रैप स्थापित करने से अब जीवों की उपस्थिति का एक व्यवस्थित और अकादमिक डेटाबेस तैयार किया जा सकेगा। • सामुदायिक वन अधिकार: पूर्वोत्तर में बड़े वन क्षेत्र सीधे ग्रामीणों और ग्राम परिषदों के नियंत्रण में आते हैं। जब तक स्थानीय निवासी स्वयं संरक्षण कार्य में शामिल नहीं होंगे, तब तक जंगलों को बाहरी खतरों और अवैध शिकार से बचाना मुश्किल बना रहता है। • जमीनी स्तर पर जीवों की सक्रियता: सर्वेक्षण के दौरान भालू, जंगली सूअर, हिरण और पैंगोलिन के संकेत मिले, जबकि सुबह गिब्बन की आवाजें सुनी गईं। इन प्रत्यक्ष साक्ष्यों ने साबित किया कि यह क्षेत्र सघन निगरानी और तत्काल संरक्षण का हकदार है। सवाल-जवाब 1. अरुणाचल प्रदेश के किस जिले में कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं? यह अभियान अरुणाचल प्रदेश के तिराप जिले में स्थित न्यू तुपी गांव के सामुदायिक जंगल में चलाया गया है। 2. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है? इसका उद्देश्य स्थानीय वन्यजीवों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करना और ग्रामीणों की मदद से जैव विविधता संरक्षण को मजबूत बनाना है। 3. फील्ड सर्वे के दौरान किन-किन जानवरों के निशान मिले? टीम को जंगली सूअर, भौंकने वाले हिरण के पैरों के निशान, हिमालयी काले भालू के पंजों के निशान और पैंगोलिन की मांद के संकेत मिले। 4. इस पहल का नेतृत्व किस संस्था और किन व्यक्तियों ने किया? इस पहल का नेतृत्व हिंथोंग फाउंडेशन के सह-संस्थापक चाजो लोवांग और सारा खोंगसाई ने किया, जिसमें 15 से 20 ग्रामीणों ने भाग लिया। https://trendkia.com/arunachal-pradesh/arunachal-pradesh-ke-tirap-men-vanyajivon-ki-nigarani-shuru-new-tupi-ke-samudayika-jngala-men-lagae-gae-kaimara-traipa-37738 TrendKia — Har trend, sabse pehle.