# अरुणाचल प्रदेश में किसानों के लिए डिजिटल पहचान अभियान शुरू, पहले चरण में छह जिलों को किया गया शामिल

> अरुणाचल प्रदेश सरकार ने एग्रीस्टैक ढांचे के तहत फार्मर आईडी अभियान शुरू किया है, जिससे छह शुरुआती जिलों में किसानों का सत्यापित रिकॉर्ड तैयार कर सरकारी योजनाओं का लाभ पारदर्शी ढंग से पहुंचाया जा सके।

**Type:** article · **Category:** अरुणाचल प्रदेश · **Published:** 2026-10-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/arunachal-pradesh/arunachal-pradesh-men-kisanon-ke-lie-dijitala-pahachana-abhiyana-shuru-pahale-charana-men-chhaha-jilon-ko-kiya-gaya-shamila-43800 · **Language:** Hindi
**Tags:** अरुणाचल प्रदेश, फार्मर आईडी, कृषि योजनाएं, एग्रीस्टैक, गेब्रियल डी वांगसु, किसान कल्याण

अरुणाचल प्रदेश सरकार ने राज्य के कृषक समुदाय का एक प्रामाणिक डिजिटल डेटाबेस तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कृषि कल्याण योजनाओं की बेहतर रूपरेखा तैयार करने और उन्हें धरातल पर सटीक रूप से लागू करने के उद्देश्य से फार्मर आईडी पहल की औपचारिक शुरुआत कर दी गई है। राज्य के कृषि मंत्री गेब्रियल डी वांगसु ने निचली दिबांग घाटी जिले के रोइंग में आयोजित एक विशेष शिविर के दौरान इस डिजिटल पहचान अभियान का उद्घाटन किया।

## एग्रीस्टैक ढांचे के तहत छह जिलों में पायलट प्रोजेक्ट
इस नई व्यवस्था को एग्रीस्टैक ढांचे के तहत धरातल पर उतारा जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर इसे पहले चरण में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया है, जिसके दायरे में छह जिले रखे गए हैं। इनमें तवांग, पक्के केसांग, निचला सुबनसिरी, पूर्वी सियांग, निचली दिबांग घाटी और नामसाई शामिल हैं। संबंधित विभागों की योजना के अनुसार, इस प्रायोगिक चरण के नतीजों और प्रगति की समीक्षा करने के बाद इस व्यवस्था को राज्य के बाकी बचे 21 जिलों में भी पूरी तरह लागू किया जाएगा।

## पारदर्शी योजना और जमीनी जरूरतों की सटीक पहचान
रोइंग में किसानों, गांव बूढ़ों, जनप्रतिनिधियों तथा कृषि विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में कृषि मंत्री ने इस व्यवस्था के दूरगामी प्रभाव रेखांकित किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रणाली के जरिए प्रशासन के पास काश्तकारों की भौगोलिक स्थिति, उनके द्वारा उगाई जाने वाली फसलों और उनकी वास्तविक जरूरतों का ठोस ब्योरा उपलब्ध होगा। जब काश्तकारों, उनके खेतों और खेती से जुड़ी गतिविधियों की पुख्ता जानकारी दर्ज होगी, तब सरकारी सहायता को अधिक लक्षित और पारदर्शी ढंग से सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाना आसान हो जाएगा। यह पहल केवल एक पहचान पत्र देने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक मजबूत कृषि सूचना तंत्र की नींव रखने का प्रयास है ताकि पात्र लाभार्थियों को किसी भी सरकारी योजना से वंचित न रहना पड़े।

## भूमि स्वामित्व पर नहीं पड़ेगा कोई कानूनी प्रभाव
इस डिजिटल कार्ड के कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए प्रशासन ने किसानों के मन में उठने वाले संभावित संशयों को भी दूर किया है। कृषि मंत्री ने जोर देकर कहा कि फार्मर आईडी किसी भी प्रकार का भूमि स्वामित्व दस्तावेज नहीं है। इस डिजिटल पहचान पत्र को रखने से किसी भी किसान को जमीन पर कोई कानूनी मालिकाना हक न तो मिलता है और न ही यह किसी दावे को स्थापित करता है। यह केवल किसान के कृषि संबंधी विवरण का एक सत्यापित रिकॉर्ड है, जिसका प्राथमिक कार्य सरकारी योजनाओं, कृषि सेवाओं और विभिन्न सबसिडी तक पहुंच को सुगम बनाना है।

## डेटा सुरक्षा और मैपिंग में सहयोग की अपील
पहल को सफल बनाने के लिए सूचनाओं की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और डेटा सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया है। कृषि मंत्री ने किसानों से पंजीकरण प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि खेतों की सटीक मैपिंग और आंकड़े जुटाने के लिए गांवों में पहुंच रहे विभागीय क्षेत्रीय सर्वेक्षकों को पूरा सहयोग दिया जाए, जिससे राज्य भर का कृषि ढांचा अधिक सुदृढ़ और पारदर्शी बन सके।

## इसका आप पर असर
अरुणाचल प्रदेश के किसानों को अब सरकारी योजनाओं और कृषि लाभों का पारदर्शी व सीधा लाभ मिल सकेगा।

- **अरुणाचल प्रदेश में:** छह चिन्हित जिलों के किसानों का सत्यापन कर उन्हें डिजिटल आईडी दी जा रही है। किसान अपने नजदीकी पंजीकरण शिविरों में पहुंचकर विभागीय सर्वेक्षकों की मदद से विवरण दर्ज करा सकते हैं।
- **योजनाओं के लाभ में:** इस व्यवस्था से खाद, बीज और कृषि सबसिडी का वितरण सीधे पात्र किसानों तक पहुंचेगा। बिचौलियों पर रोक लगने से असली काश्तकारों को तय समय पर सरकारी सहायता मिल सकेगी।
- **भूमि अधिकारों पर:** इस आईडी का जमीन की कानूनी मिल्कियत या पट्टे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। किसान अपनी जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद के बिना बेझिझक यह पहचान पत्र बनवा सकते हैं।
- **बाकी 21 जिलों में:** पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद शेष जिलों में भी पंजीकरण शुरू किया जाएगा। अन्य जिलों के किसान अपने क्षेत्रीय कृषि कार्यालय से आगामी चरणों की जानकारी ले सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
राज्य में कृषि कल्याण योजनाओं के वितरण को पारदर्शी बनाने और पात्र किसानों तक सीधी सहायता पहुंचाने के लिए यह पहल शुरू की गई है। सटीक और प्रामाणिक डेटा की कमी के कारण योजनाओं के नियोजन में आने वाली दिक्कतों को दूर करना इसका मुख्य उद्देश्य है।

- **एग्रीस्टैक की भूमिका:** केंद्र सरकार के एग्रीस्टैक ढांचे के तहत राज्यों में किसानों का डिजिटल डेटा तैयार किया जा रहा है। इसी तकनीकी पहल को आगे बढ़ाते हुए अरुणाचल प्रदेश सरकार ने स्थानीय स्तर पर इसे लागू किया है।
- **सत्यापित डेटा की आवश्यकता:** कौन सा किसान किस क्षेत्र में कौन सी फसल उगा रहा है, इसका सटीक ब्योरा न होने से मदद बांटने में कठिनाई होती थी। सत्यापन आधारित रिकॉर्ड बनने से कृषि विभाग वास्तविक जरूरत के अनुसार योजनाएं बना सकेगा।
- **पायलट चरण की रणनीति:** पूरे राज्य में एक साथ लागू करने से पहले प्रणाली की कार्यकुशलता जांचने के लिए छह जिलों का चयन किया गया है। इन छह जिलों के नतीजों के आधार पर बाकी 21 जिलों के लिए कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

## सवाल-जवाब

### 1. अरुणाचल प्रदेश में फार्मर आईडी पहल की शुरुआत किसने की?
इस पहल का शुभारंभ राज्य के कृषि मंत्री गेब्रियल डी वांगसु ने निचली दिबांग घाटी जिले के रोइंग में किया।

### 2. पहले चरण में किन जिलों को शामिल किया गया है?
पायलट चरण में तवांग, पक्के केसांग, निचला सुबनसिरी, पूर्वी सियांग, निचली दिबांग घाटी और नामसाई सहित छह जिलों को शामिल किया गया है।

### 3. यह व्यवस्था किस तकनीकी ढांचे के तहत लागू की जा रही है?
यह डिजिटल पहचान अभियान एग्रीस्टैक ढांचे के तहत संचालित किया जा रहा है।

### 4. क्या फार्मर आईडी मिलने से जमीन का कानूनी मालिकाना हक मिल जाता है?
नहीं, कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया है कि यह आईडी केवल एक सत्यापित रिकॉर्ड है और यह जमीन पर कोई कानूनी मालिकाना हक नहीं देती।

### 5. शेष 21 जिलों में यह कार्यक्रम कब लागू होगा?
पायलट प्रोजेक्ट के छह जिलों में प्रगति और परिणामों की समीक्षा के बाद इसे बाकी 21 जिलों में विस्तारित किया जाएगा।

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