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  "type": "article",
  "title": "अरुणाचल प्रदेश में चकमा मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां, चुनाव आयोग से केंद्रीय बलों और पर्यवेक्षकों की मांग",
  "summary": "चाइल्ड डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (CDFI) ने चुनाव आयोग से अरुणाचल प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत चकमा मतदाताओं पर उठाई गई आपत्तियों की सुनवाई के दौरान सुरक्षा बल तैनात करने की अपील की है।",
  "content": "अरुणाचल प्रदेश में चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बीच चकमा मतदाताओं की नागरिकता और पात्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। इस स्थिति को देखते हुए चकमा डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (CDFI) ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) से गुहार लगाई है कि वह इस प्रक्रिया पर कड़ी नजर रखने के लिए तुरंत केंद्रीय पर्यवेक्षकों और केंद्रीय सुरक्षा बलों को मैदान में उतारे। संगठन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुनवाई के दौरान किसी भी मतदाता को डराया-धमकाया न जा सके और पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता के साथ आगे बढ़े।\n\nकितने मतदाताओं पर उठाई गई हैं आपत्तियां?\n\nसंगठन के अनुसार, राज्य के चार विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम 1,292 चकमा मतदाताओं के नाम पर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। इनमें बोर्डुमसा-डियूम निर्वाचन क्षेत्र में 413 मतदाता, मियों में 49 मतदाता, दोइमुख में 774 मतदाता और चौखाम में 56 मतदाता शामिल हैं। इन सभी मामलों में आपत्तियां यह कहते हुए दर्ज कराई गई हैं कि ये लोग भारत के नागरिक नहीं हैं, जिससे प्रभावित परिवारों के बीच गहरी चिंता फैल गई है।\n\nसुनवाई की तारीखें और सुरक्षा को लेकर आशंका\n\nनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, इन आपत्तियों पर सुनवाई दो सितंबर से डियून और बोर्डुमसा में शुरू होनी है। सीडीएफआई ने आशंका जताई है कि कार्यवाही के दौरान चकमा मतदाताओं को हिंसा या डराने-धमकाने का सामना करना पड़ सकता है। संगठन के संस्थापक सुहास चकमा ने आरोप लगाया है कि कुछ चुनिंदा व्यक्तियों ने एक साथ कई चकमा मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दाखिल की हैं, जबकि वे उन मतदाताओं को व्यक्तिगत रूप से जानते तक नहीं हैं।\n\nएक व्यक्ति द्वारा कई आपत्तियां और कानूनी इतिहास\n\nसुहास चकमा ने एक विशेष उदाहरण का हवाला देते हुए बताया कि एक अकेले व्यक्ति ने बिना किसी पूर्व जानकारी के करीब 30 चकमा मतदाताओं को गैर-भारतीय बताते हुए आपत्तियां सौंप दीं, जिससे इस पूरे अभियान के पीछे एक सुनियोजित पैटर्न का पता चलता है। उन्होंने याद दिलाया कि चकमा समुदाय के लोगों के जन्म से भारतीय नागरिक होने का मुद्दा पहले ही अदालती फैसलों से सुलझ चुका है। इस सिलसिले में उन्होंने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम चुनाव आयोग मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के 28 सितंबर 2000 के फैसले, चुनाव आयोग के तीन मार्च 2004 के आदेश (संख्या 23/अरुणाचल/2003), गौहाटी उच्च न्यायालय के 19 मार्च 2013 के फैसले और सर्वोच्च न्यायालय के 17 सितंबर 2015 के फैसले का विशेष रूप से उल्लेख किया। इन सभी फैसलों और आदेशों के तहत चकमा समुदाय के लोग पिछले 26 वर्षों से लगातार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते आ रहे हैं।\n\nतय समय सीमा के बाद भी आपत्तियां स्वीकार करने का आरोप\n\nमामले में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए संगठन ने बताया कि 49-बोर्डुमसा-डियूम निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 41-मोइत्रिपूर के 41 चकमा मतदाताओं के खिलाफ आई आपत्तियों को 22 अगस्त को स्वीकार कर लिया गया था, जबकि इसके लिए तय अंतिम समय सीमा 20 अगस्त को ही समाप्त हो चुकी थी। संगठन ने इसे स्थापित नियमों और प्रक्रियाओं का सीधा उल्लंघन करार दिया है।\n\nऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भ\n\nचुनाव आयोग ने अपने तीन मार्च 2004 के आदेश में चकमा मतदाताओं के नाम शामिल न किए जाने की समस्या को स्पष्ट रूप से नस्लीय भेदभाव करार दिया था। आयोग का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 325 के तहत यह प्रावधान है कि किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या इनमें से किसी एक आधार पर किसी भी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसके बावजूद अरुणाचल प्रदेश में पात्र चकमा लोगों के नाम इसलिए छोड़े जा रहे हैं क्योंकि वे चकमा जनजाति या नस्ल से ताल्लुक रखते हैं, जो संवैधानिक आदेश का खुला उल्लंघन है।\n\nछात्र संघ की समिति और सुरक्षा की मांग\n\nसीडीएफआई ने इस पूरी प्रक्रिया को ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन (AAPSU) द्वारा 14 जुलाई को गठित उस समिति से भी जोड़ा है, जिसे मतदाता सूची से गैर-नागरिकों की प्रविष्टियों की पहचान कर उन्हें हटाने का जिम्मा सौंपा गया था। सुनवाई के दौरान चकमा और हाजोंग समुदायों की सुरक्षा पर चिंता जताते हुए संगठन ने 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले चकमाओं के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करने के निर्देश दिए गए थे।\n\nप्रशासन से कड़े कदम उठाने की अपील\n\nफाउंडेशन ने निर्वाचन आयोग से मांग की है कि सभी आपत्तियों की जांच व्यक्तिगत रूप से और पूरी तरह कानून के दायरे में की जाए, ताकि किसी भी मतदाता को केवल उसकी चकमा पहचान के आधार पर सूची से बाहर न किया जाए। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी बाहरी संगठन या व्यक्ति को आपत्तियों के सत्यापन और निपटान की सांविधिक प्रक्रिया में दखलंदाजी करने की अनुमति न मिले। अंत में, संगठन ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि वे सुनवाई के दौरान पर्याप्त केंद्रीय बल तैनात करें ताकि चकमा और हाजोंग समुदायों के लोगों को किसी भी प्रकार के दबाव, भय या जबरदस्ती का सामना न करना पड़े।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: यह मामला देश भर में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रियाओं और अल्पसंख्यकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े कानूनी नियमों पर बड़ा असर डालता है।\n\nअरुणाचल प्रदेश में: राज्य के चकमा और हाजोंग समुदायों के लिए यह सीधा उनकी नागरिकता, सुरक्षा और मतदान के अधिकार से जुड़ा संवेदनशील मामला है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सीडीएफआई ने चुनाव आयोग से क्या मुख्य मांग की है?\nसीडीएफआई ने चकमा मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियों की सुनवाई के दौरान केंद्रीय पर्यवेक्षकों और केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करने की मांग की है।\n\n2. अरुणाचल प्रदेश में कितने चकमा मतदाताओं पर आपत्तियां उठाई गई हैं?\nअरुणाचल प्रदेश के चार विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम 1,292 चकमा मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं।\n\n3. चकमा मतदाताओं की नागरिकता से जुड़ा मामला किस अदालत के फैसले से सुलझा था?\nयह मुद्दा दिल्ली उच्च न्यायालय, गौहाटी उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से स्पष्ट किया जा चुका है।\n\n4. सुनवाई किस तारीख से शुरू होने वाली है?\nचकमा मतदाताओं की आपत्तियों पर सुनवाई दो सितंबर से डियून और बोर्डुमसा में शुरू होनी है।",
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  "category": "अरुणाचल प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-08-24",
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    "चकमा मतदाता",
    "अरुणाचल प्रदेश",
    "निर्वाचन आयोग",
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