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  "title": "विक्रम-1 की उड़ान से पहले सिंगापुर के उच्चायोग ने स्काईरूट एयरोस्पेस को दी शुभकामनाएं",
  "summary": "स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट के 18 जुलाई को होने वाले पहले प्रक्षेपण से पहले सिंगापुर के भारत स्थित उच्चायोग ने कंपनी को शुभकामनाएं दी हैं और इसे दोनों देशों के बढ़ते अंतरिक्ष सहयोग का प्रतीक…",
  "content": "भारत में स्काईरूट एयरोस्पेस के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट प्रक्षेपण से ठीक दो दिन पहले सिंगापुर के भारत स्थित उच्चायोग ने इस मिशन को लेकर खुलकर समर्थन जताया है। उच्चायोग ने इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते अंतरिक्ष सहयोग के लिए एक बड़ा पल बताया है।\n\nएक्स पर सिंगापुर के उच्चायोग का संदेश\nशुक्रवार को एक्स पर पोस्ट करते हुए उच्चायोग ने लिखा, \"सिंगापुर-भारत के रिश्ते अब सितारों तक पहुंच रहे हैं!\" पोस्ट में बताया गया कि स्काईरूट एयरोस्पेस को सिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फंड जीआईसी और टेमासेक का समर्थन हासिल है, और यह कंपनी भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च करने जा रही है। उच्चायोग ने लिखा, \"जीआईसी और टेमासेक के समर्थन से स्काईरूट भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च करने जा रहा है।\" पोस्ट में यह भी जोड़ा गया कि उच्चायोग विक्रम-1 की सफलता की कामना कर रहा है। इस पोस्ट में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इन-स्पेस, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह और स्काईरूट के संस्थापकों को टैग किया गया, साथ ही मिशन आगमन और स्पेसटेक हैशटैग भी इस्तेमाल हुए। पोस्ट के आखिर में एचसी वोंग का नाम दर्ज है।\n\nक्या है मिशन आगमन\nयह शुभकामना संदेश ऐसे समय आया है जब विक्रम-1, यानी भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट, लॉन्च के लिए तैयार है। इसे हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने बनाया है। इस रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान, जिसे \"मिशन आगमन\" नाम दिया गया है, 18 जुलाई को सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से रवाना होने वाली है। 24 मीटर ऊंचा यह रॉकेट पहली बार किसी भारतीय निजी कंपनी को अपने खुद के बनाए लॉन्च वाहन से सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करने का मौका देगा, वह भी बिना किसी सरकारी रॉकेट या लॉन्च कार्यक्रम की मदद के। विक्रम-1 पूरी तरह हल्के कार्बन-कम्पोजिट ढांचे से बना है और इसे तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज तथा एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल से ऊर्जा मिलती है। इसे 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट में 60 डिग्री के झुकाव के साथ स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसके पेलोड में बेंगलुरु स्थित कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा तैयार लैब में उगाया गया \"डायमंड लोटस\" भी शामिल है।\n\nइन-स्पेस ने बताई निजी क्षेत्र की रफ्तार\nइन-स्पेस के टेक्निकल डायरेक्टर राजेश जोथी ने बताया कि यह लॉन्च दिखाता है कि 2020 में हुए अंतरिक्ष क्षेत्र सुधारों के बाद भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र कितनी तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा, \"हम निजी क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी देख रहे हैं। हमने मुश्किल से पांच-छह स्टार्टअप कंपनियों से शुरुआत की थी और आज हमारे पास 400 से ज्यादा स्टार्टअप हैं। यह सब सरकार के 2020 के अंतरिक्ष सुधारों की वजह से हुआ, जिसके बाद 2022 में इन-स्पेस का गठन हुआ। हमारे प्रधानमंत्री का विजन अब लागू हो रहा है और हमें अंतरिक्ष नीति का नतीजा दिख रहा है।\" जोथी ने आगे कहा कि अगर यह लॉन्च सफल रहा तो इससे भारत की व्यावसायिक लॉन्च क्षमता को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने कहा, \"स्काईरूट अपना पहला लॉन्च व्हीकल लॉन्च करने जा रहा है, जो अपनी तरह का पहला होगा। सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि भारत के बाहर भी सिर्फ एक या दो देशों के पास ही इतना छोटा सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल है। अगर यह सफल होता है तो इससे स्मॉल सैटेलाइट मार्केट और स्मॉल लॉन्च व्हीकल मार्केट, दोनों को बढ़ावा मिलेगा।\"\n\nस्काईरूट का आठ साल का सफर\nस्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर नागा भरत डाका ने बताया कि कंपनी की शुरुआत करीब आठ साल पहले इस मकसद से हुई थी कि भारत से किफायती और भरोसेमंद रॉकेट बनाए जा सकें। उन्होंने कहा, \"हमने करीब आठ साल पहले स्काईरूट की शुरुआत इस लक्ष्य के साथ की थी कि भारत से दुनिया के लिए किफायती और भरोसेमंद रॉकेट बनाए जाएं और दुनियाभर के सैटेलाइट ऑपरेटरों को किफायती, भरोसेमंद और ऑन-डिमांड लॉन्च एक्सेस सॉल्यूशन दिए जाएं। हमारी और हमारी पूरी टीम की मेहनत आज इस ऐतिहासिक पल में बदल रही है।\"\n\nइसका आप पर असर\nयह सिर्फ कूटनीतिक शुभकामना नहीं है, बल्कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए इसके असली मायने हैं।\n\n• भारत में: अगर विक्रम-1 का प्रक्षेपण सफल रहता है तो यह साबित होगा कि कोई भारतीय निजी कंपनी अपना खुद का ऑर्बिटल रॉकेट बना और उड़ा सकती है, जिससे 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप में निवेश और नौकरियां बढ़ने की उम्मीद है।\n• श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) में: 18 जुलाई को मिशन आगमन का प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन स्पेस सेंटर अब सिर्फ इसरो के ही नहीं बल्कि निजी कंपनियों के रॉकेट लॉन्च का भी केंद्र बनता जा रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सिंगापुर के उच्चायोग ने स्काईरूट के मिशन को लेकर क्या कहा?\nउसने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, \"सिंगापुर-भारत के रिश्ते अब सितारों तक पहुंच रहे हैं!\" और कहा कि वह स्काईरूट एयरोस्पेस के भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च के प्रयास का समर्थन कर रहा है तथा विक्रम-1 की सफलता की कामना करता है।\n\n2. विक्रम-1 कब और कहां से लॉन्च होगा?\nविक्रम-1 18 जुलाई को सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से \"मिशन आगमन\" के तहत लॉन्च होने वाला है।\n\n3. विक्रम-1 को किसने बनाया है?\nइसे हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने बनाया है।\n\n4. विक्रम-1 का महत्व क्या है?\nयह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट है और पहली बार किसी भारतीय निजी कंपनी को बिना किसी सरकारी रॉकेट कार्यक्रम की मदद के अपने खुद के लॉन्च वाहन से सैटेलाइट कक्षा में स्थापित करने का मौका देगा।\n\n5. विक्रम-1 की तकनीकी खासियतें क्या हैं?\nयह 24 मीटर ऊंचा है, कार्बन-कम्पोजिट ढांचे से बना है, तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल से चलता है, और 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट में 60 डिग्री झुकाव के साथ स्थापित कर सकता है।\n\n6. विक्रम-1 पर कौन-कौन से पेलोड जा रहे हैं?\nइसके पेलोड में बेंगलुरु स्थित कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा तैयार लैब में उगाया गया \"डायमंड लोटस\" शामिल है।\n\n7. स्काईरूट एयरोस्पेस को कौन से निवेशकों का समर्थन है?\nसिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फंड जीआईसी और टेमासेक इसके प्रमुख समर्थकों में शामिल हैं।\n\n8. भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र कितना बढ़ा है?\nइन-स्पेस के टेक्निकल डायरेक्टर राजेश जोथी के मुताबिक, 2020 के अंतरिक्ष सुधारों और 2022 में इन-स्पेस के गठन के बाद यह पांच-छह स्टार्टअप से बढ़कर 400 से ज्यादा स्टार्टअप तक पहुंच गया है।\n\n9. स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना कब हुई और इसकी तरफ से किसने बात की?\nस्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना करीब आठ साल पहले हुई थी, और इसके सह-संस्थापक व चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर नागा भरत डाका ने कंपनी के मकसद के बारे में बताया।\n\n10. यह लॉन्च स्मॉल सैटेलाइट मार्केट के लिए क्यों अहम है?\nराजेश जोथी के मुताबिक अगर यह लॉन्च सफल रहा तो इससे स्मॉल सैटेलाइट मार्केट और स्मॉल लॉन्च व्हीकल मार्केट दोनों को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि भारत के बाहर सिर्फ एक-दो देशों के पास ही इतना छोटा सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल है।\n\nप्रेरणा और सबक\nभारत के पहले निजी ऑर्बिटल लॉन्च की कोशिश तक पहुंचने में स्काईरूट एयरोस्पेस के सफर से कुछ सीख मिलती है।\n\n• एक साफ लक्ष्य तय करें और उस पर टिके रहें: नागा भरत डाका के मुताबिक स्काईरूट की शुरुआत करीब आठ साल पहले एक खास मकसद, यानी भारत से किफायती और भरोसेमंद रॉकेट बनाने के इरादे से हुई थी, और कंपनी विक्रम-1 के प्रक्षेपण तक इसी लक्ष्य पर कायम रही।\n• शुरुआत से ही वैश्विक सोच रखें: स्काईरूट का इरादा सिर्फ भारतीय ग्राहकों तक सीमित नहीं था, बल्कि कंपनी दुनियाभर के सैटेलाइट ऑपरेटरों को किफायती, भरोसेमंद और ऑन-डिमांड लॉन्च सॉल्यूशन देना चाहती थी।\n• लंबा समय लगे तो भी ऐतिहासिक मुकाम मिल सकता है: आठ साल की मेहनत अब विक्रम-1 की पहली उड़ान में बदल रही है, जो बताता है कि मुश्किल तकनीकी लक्ष्य हासिल करने में अक्सर महीनों नहीं बल्कि सालों का समय लगता है।\n• नीतिगत बदलावों का फायदा उठाएं: इन-स्पेस के राजेश जोथी ने बताया कि 2020 के सरकारी अंतरिक्ष सुधारों और 2022 में इन-स्पेस के गठन ने निजी क्षेत्र को पांच-छह स्टार्टअप से बढ़कर 400 से ज्यादा स्टार्टअप तक पहुंचाने में मदद की, और स्काईरूट जैसी कंपनियां इस मौके का फायदा उठाने की स्थिति में थीं।\n• पूरी टीम को श्रेय दें, सिर्फ संस्थापकों को नहीं: डाका ने इस मुकाम को अपनी अकेली उपलब्धि नहीं बल्कि \"हमारी और हमारी पूरी टीम की मेहनत\" का नतीजा बताया।",
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  "category": "एशिया",
  "publishedAt": "2026-07-17",
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