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  "title": "अरुणाचल प्रदेश की 11000 मेगावाट की सियांग परियोजना पर असम कांग्रेस नेता देवब्रत सैकिया ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से लगाई गुहार",
  "summary": "कांग्रेस नेता देवब्रत सैकिया ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को छह पन्नों का पत्र लिखकर अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,000 मेगावाट की अपर सियांग बहुउद्देशीय परियोजना के असम के निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।",
  "content": "अरुणाचल प्रदेश में तैयार की जा रही 11,000 मेगावाट क्षमता वाली प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर चिंताएं गहराने लगी हैं। असम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता देवब्रत सैकिया ने इस विशाल पनबिजली और जल भंडारण पहल को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को एक विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा है। बुधवार को भेजे गए छह पन्नों के इस पत्र में उन्होंने आग्रह किया है कि हिमालयी क्षेत्र में बनने वाले इस विशाल ढांचे के असम के निचले इलाकों, पर्यावरण और वहां रहने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों का नए सिरे से वैज्ञानिक और स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए।\n\nपूर्वी हिमालय की भौगोलिक स्थिति और असम के सरोकार\nदेवब्रत सैकिया ने अपने ज्ञापन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि सियांग नदी अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों से बहकर असम की सीमा में प्रवेश करती है, जहां यह विशाल ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र की मुख्य रीढ़ बनती है। इस भौगोलिक वास्तविकता के कारण किसी भी बड़े बांध या जल विनियमन तंत्र का सीधा प्रभाव निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में इस स्तर की परियोजना केवल अरुणाचल प्रदेश तक सीमित मामला नहीं हो सकती, बल्कि इसमें असम के नदी तटीय समुदायों की सुरक्षा, उनकी आजीविका और पारिस्थितिक स्थिरता का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है।\n\nजलाशय क्षमता और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े सवाल\nसरकारी दस्तावेजों का हवाला देते हुए सैकिया ने रेखांकित किया कि सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना, जिसे अपर सियांग बहुउद्देशीय भंडारण परियोजना भी कहा जाता है, अभी पूर्व व्यवहार्यता चरण में दर्ज की गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में लगभग 9.2 अरब घन मीटर की उपयोगी जल भंडारण क्षमता का प्रावधान किया गया है, जिसका एक घोषित लक्ष्य बाढ़ की तीव्रता को कम करना भी है। कांग्रेस नेता ने मांग उठाई कि केवल कागजी दावों पर निर्भर रहने के बजाय असम केंद्रित एक स्वतंत्र डाउनस्ट्रीम प्रभाव आकलन तैयार किया जाए। इस अध्ययन में चरम बाढ़ के स्तर, गाद के प्रवाह, नदी तटों के कटाव, जलमार्ग की संरचना में बदलाव, आर्द्रभूमियों की स्थिति, मत्स्य पालन, खेती और नौवहन जैसे अहम पहलुओं की गहन पड़ताल होनी चाहिए।\n\nप्राकृतिक आपदाओं और बांध टूटने के जोखिम का अध्ययन\nपूर्वी हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए देवब्रत सैकिया ने बांध टूटने की स्थिति में जलप्लावन के व्यापक मॉडलिंग की मांग की है। उन्होंने कहा कि भूकंप की दृष्टि से सक्रिय क्षेत्र होने के कारण भारी बारिश, भूस्खलन, शक्तिशाली भूकंप, बुनियादी ढांचे की विफलता और आपातकालीन स्थिति में जलाशय से अचानक पानी छोड़े जाने जैसी चरम परिस्थितियों का विस्तृत विश्लेषण सामने आना चाहिए। सैकिया का तर्क है कि इसे मात्र जलविद्युत का समर्थन या विरोध करने के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि मूल सवाल यह है कि क्या ब्रह्मपुत्र की इतनी बड़ी सहायक नदी पर बिना वैज्ञानिक जांच, जन परामर्श और निचले इलाकों की सुरक्षा पुख्ता किए इतना विशाल निर्माण उचित है।\n\nराज्य की सहमति और स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति की मांग\nज्ञापन में राष्ट्रपति से यह भी पता लगाने का अनुरोध किया गया है कि क्या असम सरकार ने इस परियोजना को लेकर कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र, सहमति या औपचारिक पत्राचार किया है। सैकिया ने सियांग और ब्रह्मपुत्र बेसिन में प्रस्तावित सभी बड़ी परियोजनाओं के संचयी प्रभावों के खुलासे की मांग रखी। साथ ही, उन्होंने असम के साथ वर्षा, जलाशय स्तर, पानी के अंतर्प्रवाह और बहिर्प्रवाह का रियल-टाइम डेटा साझा करने तथा स्वचालित पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का सुझाव दिया। उन्होंने जलविज्ञानी, भूविज्ञानी, भूकंप विज्ञानी, बांध सुरक्षा विशेषज्ञ और पर्यावरणविदों को शामिल करते हुए एक बहुविषयक सुरक्षा समिति गठित करने की भी अपील की।\n\nइसका आप पर असर\nअरुणाचल प्रदेश की विशाल सियांग परियोजना का सीधा असर पूर्वोत्तर भारत के नदी तंत्र और निचले इलाकों के जनजीवन पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: राष्ट्रीय स्तर पर 11,000 मेगावाट की विशाल ऊर्जा क्षमता और पूर्वोत्तर जल सुरक्षा पर नीतिगत बहस तेज होगी। इससे हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों की सुरक्षा और अंतर्राज्यीय नदी प्रबंधन के कड़े नियम तय करने की मांग बढ़ेगी।\n• असम में: ब्रह्मपुत्र के निचले इलाकों में रहने वाले लाखों किसानों, मछुआरों और तटीय आबादी के लिए बाढ़, कटाव और आजीविका सुरक्षा का सवाल गहरा गया है। यदि स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन और पूर्व चेतावनी प्रणाली लागू होती है, तो नदी किनारे की बस्तियों को अचानक आने वाली आपदाओं से बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nअसम के वरिष्ठ नेता द्वारा राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग पूर्वी हिमालय में प्रस्तावित इस भारी-भरकम जलविद्युत परियोजना के संभावित दुष्प्रभावों और अंतर्राज्यीय सहमति के अभाव की चिंताओं से जुड़ी है।\n\n• भौगोलिक और पारिस्थितिक संवेदनशीलता: सियांग नदी अरुणाचल प्रदेश से निकलकर सीधे असम के मैदानी हिस्सों में ब्रह्मपुत्र बनकर बहती है, जहां भारी जल संचयन से निचले क्षेत्रों का संतुलन बिगड़ सकता है। भूकंप और भारी वर्षा वाले इस संवेदनशील जोन में 9.2 अरब घन मीटर जल भंडारण से बड़ी आपदा का डर है।\n• पारदर्शिता और सहमति पर संशय: परियोजना अभी पूर्व व्यवहार्यता चरण में है और असम के लोगों तथा राज्य सरकार की औपचारिक सहमति को लेकर स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। बिना समग्र वैज्ञानिक अध्ययन और जनता से संवाद किए प्रक्रिया आगे बढ़ाने की आशंकाओं ने इस विरोध को जन्म दिया।\n• स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट की जरूरत: अतीत में बड़े बांधों से अचानक छोड़े गए पानी और कटाव के अनुभवों को देखते हुए विशेषज्ञ निगरानी और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली की मांग को उठाया गया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. देवब्रत सैकिया ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से क्या मांग की है?\nउन्होंने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,000 मेगावाट की सियांग बहुउद्देशीय परियोजना के असम के निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर का स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन कराने की मांग की है।\n\n2. प्रस्तावित सियांग परियोजना की क्षमता और जल भंडारण कितना है?\nयह 11,000 मेगावाट क्षमता की प्रस्तावित परियोजना है, जिसमें लगभग 9.2 अरब घन मीटर की उपयोगी जल भंडारण क्षमता की योजना है।\n\n3. असम के लिए सियांग नदी का क्या महत्व है?\nसियांग नदी अरुणाचल प्रदेश से बहकर असम में प्रवेश करती है और वहां की जीवनरेखा मानी जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली का मुख्य हिस्सा बनती है।\n\n4. देवब्रत सैकिया ने बांध सुरक्षा के संबंध में क्या सुझाव दिया है?\nउन्होंने भूकंप, भूस्खलन और बांध टूटने की चरम स्थितियों का अध्ययन करने के लिए जलविज्ञानी और भूवैज्ञानिकों की एक स्वतंत्र बहुविषयक विशेषज्ञ समिति बनाने और रियल-टाइम डेटा साझा करने का सुझाव दिया है।",
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  "category": "असम",
  "publishedAt": "2026-10-01",
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