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  "type": "article",
  "title": "असम और मेघालय में बड़ी पर्यावरणीय कामयाबी, सौर ऊर्जा और भूमि बहाली से 11,000 से अधिक ग्रामीणों को मिला लाभ",
  "summary": "असम और मेघालय के 250 गांवों में पर्यावरण और आजीविका सुधार के लिए चलाई गई एक विशेष मुहिम के तहत 11,000 से अधिक लोगों को सीधे तौर पर लाभान्वित किया गया है।",
  "content": "पूर्वोत्तर भारत के असम और मेघालय राज्यों में पर्यावरण और आजीविका को बढ़ावा देने वाली एक विशेष मुहिम ने पिछले दो वर्षों में 11,000 से अधिक स्थानीय निवासियों तक अपनी पहुंच बनाई है। मुख्य रूप से सामुदायिक विकास पर आधारित इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण किसानों को मिला है, जो कुल लाभार्थियों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। इस पहल के तहत पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के बेहतर समन्वय से न केवल पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिली है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नया सहारा मिला है।\n\nग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी के स्मॉल ग्रांट्स प्रोग्राम के सातवें परिचालन चरण, जिसे OP7 कहा जाता है, की समाप्ति के अवसर पर जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस अभियान के तहत 17,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को उन्नत पर्यावरण प्रबंधन प्रणालियों के अंतर्गत लाया गया है। इसमें से लगभग 2,800 हेक्टेयर ऐसी बंजर या खराब हो चुकी भूमि शामिल है, जिसे पूरी तरह से पुनर्जीवित यानी बहाल कर दिया गया है। इस परियोजना की गतिविधियां असम और मेघालय के 11 जिलों में फैले 250 गांवों में सफलतापूर्वक चलाई गईं, जिससे संवेदनशील ग्रामीण आबादी को टिकाऊ कृषि और स्थानीय पारिस्थितिकी सुरक्षा के साधन मिले हैं।\n\nहरित ऊर्जा का विस्तार और स्थानीय भागीदारी\nइस चरण की एक बड़ी उपलब्धि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना रही है। इस कार्यक्रम के तहत दोनों राज्यों के दूरदराज के इलाकों में कुल 182 kW क्षमता की सौर ऊर्जा प्रणालियां स्थापित की गई हैं। स्वच्छ ऊर्जा के इस विस्तार से बिजली ग्रिड से दूर बसे ग्रामीण समुदायों को विश्वसनीय बिजली मिल रही है, जिससे पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर उनकी निर्भरता कम हुई है और स्थानीय स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है। इस परियोजना के तहत विशेष रूप से उन संवेदनशील और कम विकसित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जहां लोगों को सामूहिक योजनाएं बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।\n\nकृषि इस क्षेत्र की जीवन रेखा है और यही वजह है कि इस कार्यक्रम के लाभार्थियों में किसानों की संख्या सबसे अधिक रही है। इन सामुदायिक पहलों का लाभ उठाने वालों में 61 प्रतिशत आबादी केवल किसानों की थी। इस पूरी मुहिम का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए स्थायी आजीविका के साधन विकसित करना है। इसके साथ ही जैव विविधता का संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लचीलापन बढ़ाना और खराब हो चुकी भूमि का सुधार करना भी इस परियोजना के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है।\n\nसहयोगात्मक ढांचा और संस्थागत भागीदारी\nभारत में ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी के इस स्मॉल ग्रांट्स प्रोग्राम का क्रियान्वयन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी UNDP के साथ मिलकर किया जा रहा है। देश भर में इस अभियान के सफल संचालन के लिए द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट यानी TERI राष्ट्रीय मेजबान संस्थान के रूप में काम कर रहा है। वहीं, पूर्वोत्तर भारत की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए TISS गुवाहाटी को इस परियोजना का ज्ञान भागीदार (नॉलेज पार्टनर) बनाया गया है, ताकि स्थानीय व्यावहारिक अनुभवों का सही उपयोग किया जा सके।\n\nOP7 के तहत भारत के जिन तीन क्षेत्रों को विशेष प्राथमिकता दी गई थी, उनमें पूर्वोत्तर भारत भी शामिल था। इस क्षेत्र के अलावा देश के मध्य अर्ध-शुष्क इलाकों और तटीय क्षेत्रों को भी इस श्रेणी में रखा गया था। TISS गुवाहाटी में इस परियोजना के प्रमुख अभिनंदन सैकिया ने बताया कि इस चरण को इस तरह तैयार किया गया था जिससे कमजोर क्षेत्रों के लोगों को सशक्त बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य ग्रामीण आबादी को भागीदारी के जरिए सामूहिक योजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन के लिए सक्षम बनाना था।\n\nजमीनी नवाचार और भविष्य की राह\nइस पूरे कार्यक्रम का एक मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय स्तर पर हासिल की गई सफलताएं केवल एक सीमित दायरे में ही सिमटकर न रह जाएं। इसके बजाय, जमीनी स्तर के पारंपरिक अनुभवों को औपचारिक नीति-निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए पारंपरिक ज्ञान को स्वच्छ ऊर्जा पहलों, उपयुक्त तकनीकों और आधुनिक वैज्ञानिक नवाचारों के साथ जोड़ा जा रहा है। TERI के वरिष्ठ निदेशक दीपांकर सहारिया ने जोर देकर कहा कि इस परियोजना को केवल वित्तीय मदद देने से आगे बढ़कर काम करना चाहिए और ऐसे आत्मनिर्भर सामुदायिक मॉडल तैयार करने चाहिए जो सरकारी अनुदान समाप्त होने के बाद भी सुचारू रूप से चलते रहें।\n\nइन महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों पर हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित एक दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में विस्तृत चर्चा की गई। इस सम्मेलन में असम, मेघालय और दिल्ली के 150 से अधिक प्रगतिशील किसानों, जमीनी कार्यकर्ताओं, 22 सहयोगी NGO के प्रतिनिधियों और विषय विशेषज्ञों ने भाग लिया। TERI में इस कार्यक्रम के राष्ट्रीय समन्वयक मनीष कुमार पांडेय ने बताया कि इन छोटे स्तर के व्यावहारिक प्रोजेक्ट्स को अधिक संस्थागत और वित्तीय मदद दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि इन्हें बड़े स्तर पर लागू किया जा सके। अब इस अभियान के आगामी आठवें परिचालन चरण, जिसे OP8 कहा जाता है, में भी टिकाऊ आजीविका और स्थानीय स्तर पर संचालित पर्यावरण अनुकूल समाधानों को ही मुख्य केंद्र बिंदु बनाया जाएगा।\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार दर्शाता है कि कैसे स्थानीय स्तर पर मिलने वाले पर्यावरण अनुदान ग्रामीण समुदायों के जीवन को बेहतर बना सकते हैं और पारंपरिक खेती को अधिक टिकाऊ बना सकते हैं।\n\n• भारत भर में: इस मॉडल की सफलता यह दिखाती है कि कैसे पारंपरिक ज्ञान को नवीकरणीय ऊर्जा के साथ जोड़कर भारत अपने राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। यह अन्य राज्यों के लिए विकेंद्रीकृत पर्यावरण बहाली परियोजनाओं को डिजाइन करने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।\n• असम और मेघालय में: इन दोनों राज्यों के 11 चयनित जिलों के किसानों को अपनी कृषि भूमि की उत्पादकता में सुधार होने से सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। इसके अलावा स्थापित की गई सौर ऊर्जा प्रणालियों से बिजली की बचत होगी और सुदूर गांवों में कृषि कार्यों के लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह उपलब्धि भारत के संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्रों के सुधार के लिए तैयार की गई एक व्यवस्थित पारिस्थितिकी बहाली परियोजना के सातवें चरण के सफलतापूर्वक संपन्न होने के कारण संभव हुई है।\n\n• पूर्वोत्तर क्षेत्र पर रणनीतिक ध्यान: इस क्षेत्र को इसकी जलवायु संवेदनशीलता और समृद्ध जैव विविधता के कारण OP7 ढांचे के तहत विशेष प्राथमिकता दी गई थी। इससे असम और मेघालय के अविकसित क्षेत्रों में सीधे संसाधनों को पहुंचाने में मदद मिली।\n• संस्थागत समन्वय: यह परियोजना केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, UNDP जैसे अंतर्राष्ट्रीय निकायों, TERI जैसे अनुसंधान संस्थानों और TISS गुवाहाटी जैसे स्थानीय ज्ञान भागीदारों के बीच बेहतर तालमेल के कारण सफल रही है।\n• सामुदायिक भागीदारी मॉडल: ऊपर से थोपे गए नियमों के बजाय, इस कार्यक्रम ने सहभागी नियोजन पर भरोसा किया जिसमें पारंपरिक स्वदेशी कृषि पद्धतियों को सौर ऊर्जा जैसे आधुनिक उपकरणों के साथ जोड़ा गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. असम और मेघालय में 'GEF-स्मॉल ग्रांट्स प्रोग्राम' की मुख्य उपलब्धि क्या है?\nपिछले दो वर्षों में इस कार्यक्रम से 11,000 से अधिक लोगों को लाभ मिला है, जिनमें 61 प्रतिशत किसान हैं। इसके अलावा 17,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि का बेहतर प्रबंधन किया गया है।\n\n2. इस अभियान के तहत कितनी भूमि बहाल की गई और कितने गांव शामिल किए गए?\nइस पहल के तहत असम और मेघालय के 11 जिलों के 250 गांवों को कवर किया गया और 2,800 हेक्टेयर खराब हो चुकी भूमि को पूरी तरह से ठीक (बहाल) किया गया है।\n\n3. इस चरण के दौरान कितनी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई?\nस्थानीय समुदायों की मदद करने और जलवायु अनुकूलन क्षमता बढ़ाने के लिए कुल 182 kW क्षमता के सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए गए हैं।\n\n4. भारत में इस कार्यक्रम को लागू करने वाले प्रमुख संगठन कौन से हैं?\nयह कार्यक्रम पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा UNDP के साथ मिलकर चलाया जा रहा है, जिसमें TERI राष्ट्रीय मेजबान और TISS गुवाहाटी पूर्वोत्तर का ज्ञान भागीदार है।\n\nप्रेरणा और सबक\nयह पहल दर्शाती है कि कैसे सामुदायिक नेतृत्व वाली पर्यावरण बहाली और टिकाऊ योजनाएं ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों की तस्वीर बदल सकती हैं।\n\n• जमीनी नेतृत्व को सशक्त बनाना: वास्तविक स्थिरता तब आती है जब बाहरी ताकतों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय समुदायों को खुद अपने संसाधनों और जमीन का प्रबंधन करने की अनुमति दी जाती है।\n• परंपरा और आधुनिकता का मेल: सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के साथ मिलाने से अधिक मजबूत और स्थानीय रूप से स्वीकार्य समाधान तैयार होते हैं।\n• आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना: किसी भी परियोजना को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए जिससे आत्मनिर्भर सामुदायिक मॉडल बन सकें, जो सरकारी या बाहरी वित्तीय मदद खत्म होने के बाद भी सुचारू रूप से चल सकें।",
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  "category": "असम",
  "publishedAt": "2026-09-14",
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    "सामुदायिक परियोजनाएं"
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