असम के ओरंग नेशनल पार्क में पहली बार देखा गया भारतीय मोर असम के ओरंग नेशनल पार्क में वन्यजीव प्रेमियों और वन कर्मियों ने पहली बार भारतीय मोर की मौजूदगी दर्ज की है। इस नई खोज से पार्क की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। असम के ओरंग नेशनल पार्क में पहली बार भारतीय मोर यानी पावो क्रिस्टाटस की आधिकारिक रूप से पुष्टि की गई है। इस नई प्रजाति के जुड़ने से संरक्षित क्षेत्र के जैव विविधता रिकॉर्ड में एक और नाम शामिल हो गया है। इस सुंदर पक्षी की मौजूदगी की पुष्टि वन्यजीव फोटोग्राफर नजीब अहमद और सिनेमैटोग्राफर चंदन सैकिया द्वारा खींची गई तस्वीरों के जरिए हुई है, जिन्होंने पार्क के भीतर इसकी स्पष्ट तस्वीरें कैमरे में कैद कीं। वन कर्मियों की नजरों में आया था पक्षी तस्वीरें सामने आने से पहले पार्क के फ्रंटलाइन वन कर्मियों ने रोमारी और हजारीबाग एंटी-पोचिंग कैंप के पास कई दिनों तक एक अज्ञात पक्षी को देखा था जो भारतीय मोर से काफी मिलता-जुलता था। कर्मचारियों के इस शुरुआती संदेह के बाद ही फोटोग्राफरों ने इस पर ध्यान केंद्रित किया और आखिरकार इसकी आधिकारिक पुष्टि करने में सफलता हासिल की। इससे पहले ओरंग नेशनल पार्क के भीतर इस प्रजाति का कोई भी आधिकारिक दस्तावेज या रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। वन अधिकारियों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया ओरंग नेशनल पार्क के कार्यकारी निदेशक प्रदीपा बरुआ ने इस नए रिकॉर्ड के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दर्ज की गई हर नई प्रजाति असम के संरक्षित पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य और विविधता के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। उन्होंने राज्य की जैव विविधता को बेहतर ढंग से समझने में योगदान देने के लिए फ्रंटलाइन वन स्टाफ, वन्यजीव फोटोग्राफरों और प्रकृति प्रेमियों की भूमिका की भी सराहना की। आसपास के क्षेत्रों में स्थिति और भविष्य की निगरानी इससे पहले इस प्रजाति को उदलगुड़ी जिले के नूनोई वन्यजीव अभयारण्य में भी दर्ज किया जा चुका है। ओरंग पार्क में इस पक्षी के मिलने से पक्षी प्रेमियों, शोधकर्ताओं और वन्यजीव प्रेमियों के बीच काफी उत्साह का माहौल है। वन अधिकारियों ने इस क्षेत्र में लगातार निगरानी जारी रखने की योजना बनाई है ताकि इस प्रजाति की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। पार्क का पारिस्थितिकी तंत्र और भारतीय मोर का आवास भारतीय मोर आमतौर पर जंगलों के किनारों, घास के मैदानों और अन्य खुले आवासों में पाए जाते हैं। ओरंग नेशनल पार्क में इसकी पक्की मौजूदगी दर्ज होने से पार्क के घास के मैदानों, आर्द्रभूमि और वन पारिस्थितिक तंत्र में पहले से मौजूद प्रजातियों की विविधता में और इजाफा हो गया है। वन्यजीव विभाग और विशेषज्ञ आने वाले समय में इस क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को और तेज करने पर विचार कर रहे हैं। इसका आप पर असर ओरंग नेशनल पार्क में भारतीय मोर के मिलने से असम के वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन क्षेत्रों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। • भारत में: देश के विभिन्न संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीवों की नई प्रजातियों के मिलने से पारिस्थितिक अनुसंधान और संरक्षण नीतियों को मजबूत करने में मदद मिलती है। इससे पर्यावरणविदों को जीवों के प्रवास पैटर्न को समझने का नया अवसर मिलता है। • असम में: स्थानीय स्तर पर ओरंग नेशनल पार्क में पर्यटकों और पक्षी प्रेमियों की आवाजाही बढ़ने की संभावना है। इससे क्षेत्र में प्रकृति पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिल सकता है। ऐसा क्यों हुआ ओरंग नेशनल पार्क में भारतीय मोर की उपस्थिति का कारण आवास का विस्तार और वन क्षेत्रों की बेहतर सुरक्षा स्थिति है। • पर्यावरणीय अनुकूलन: भारतीय मोर आमतौर पर खुले घास के मैदानों और जंगलों के किनारों पर रहना पसंद करते हैं, जो ओरंग पार्क के पारिस्थितिकी तंत्र से मेल खाते हैं। • बढ़ी हुई निगरानी: पार्क के भीतर एंटी-पोचिंग कैंपों के पास फ्रंटलाइन स्टाफ की नियमित गश्त और सतर्कता के कारण इस अज्ञात पक्षी की पहचान संभव हो पाई। • आसपास के क्षेत्र से आवाजाही: इस प्रजाति को पहले पास के उदलगुड़ी जिले के नूनोई वन्यजीव अभयारण्य में भी दर्ज किया गया था, जिससे संकेत मिलता है कि पक्षी प्राकृतिक रूप से नए क्षेत्रों में पहुंचे हैं। सवाल-जवाब 1. ओरंग नेशनल पार्क में किस नए पक्षी को पहली बार दर्ज किया गया है? ओरंग नेशनल पार्क में पहली बार भारतीय मोर को आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया है। 2. इस पक्षी की मौजूदगी की पुष्टि किसने की? इसकी पुष्टि वन्यजीव फोटोग्राफर नजीब अहमद और सिनेमैटोग्राफर चंदन सैकिया ने तस्वीरें खींचकर की। 3. वन कर्मियों ने पक्षी को सबसे पहले कहाँ देखा था? वन कर्मियों ने रोमारी और हजारीबाग एंटी-पोचिंग कैंप के पास इस अज्ञात पक्षी को देखा था। 4. ओरंग नेशनल पार्क के कार्यकारी निदेशक कौन हैं? ओरंग नेशनल पार्क के कार्यकारी निदेशक प्रदीपा बरुआ हैं। 5. इससे पहले असम में यह प्रजाति कहाँ दर्ज की गई थी? यह प्रजाति पहले उदलगुड़ी जिले के नूनोई वन्यजीव अभयारण्य में दर्ज की गई थी। https://trendkia.com/assam/assam-ke-orang-national-park-men-pahali-bara-dekha-gaya-indian-peafowl-39926 TrendKia — Har trend, sabse pehle.