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  "type": "article",
  "title": "असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने केंद्र से की कृषि कर्ज नीति में क्षेत्रीय बदलाव की मांग",
  "summary": "असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि पूर्वोत्तर की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कृषि वित्तीय ढांचा तैयार किया जाए और संस्थागत कर्ज वितरण को सुगम बनाया जाए।",
  "content": "देश के कृषि क्षेत्र में आमदनी बढ़ाने और समग्र विकास को गति देने के लिए एक समान नीति के बजाय क्षेत्रीय जरूरतों पर आधारित वित्तीय व्यवस्था की आवश्यकता रेखांकित की गई है। असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि कृषि कर्ज नीतियों को राज्यों की जमीनी हकीकत के अनुसार ढाला जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पादन के तौर-तरीके, भौगोलिक परिस्थितियां और वित्तीय जरूरतें पूरी तरह अलग हैं, इसलिए पूरे देश के लिए एक ही पैमाना लागू करना कारगर साबित नहीं हो सकता।\n\nराष्ट्रीय सम्मेलन में क्षेत्रीय वास्तविकताओं पर जोर\nकेंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों तथा वित्त मंत्रियों की उपस्थिति में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में यह विषय उठाया गया। विकसित भारत के लक्ष्य की ओर अग्रसर वित्तीय परिचर्चा के दूसरे दिन कृषि क्षेत्र के बदलाव पर केंद्रित सत्र में भाग लेते हुए असम के वित्त मंत्री ने पूर्वोत्तर क्षेत्र की संभावनाओं और चुनौतियों को सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के कुल कार्यबल का लगभग 40 से 46 प्रतिशत हिस्सा खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है, जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। इस व्यापक निर्भरता को देखते हुए उत्पादकता, मूल्य संवर्धन, बेहतर बाजार पहुंच और किसानों की कमाई में मजबूती लाना बेहद आवश्यक है।\n\nजमीन के मालिकाना हक की बाधाएं और किसान पहचान पत्र\nपूर्वोत्तर राज्यों में औपचारिक वित्तीय तंत्र और संस्थागत कर्ज के वितरण में मौजूद असमानताओं का उल्लेख करते हुए असम के वित्त मंत्री ने छोटे उत्पादकों की परेशानियां गिनाईं। बटाईदारों, पट्टे पर खेती करने वाले किसानों, वन अधिकार अधिनियम के लाभार्थियों, सरकारी जमीन पर जोत करने वाले काश्तकारों और छोटे चाय बागान मालिकों को अक्सर जमीन के पक्के पट्टे या स्पष्ट मालिकाना हक के अभाव में बैंकों से ऋण प्राप्त करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए असम में किसान पहचान पत्र यानी फार्मर आईडी का वितरण शुरू किया गया है। यह व्यवस्था जमीन के दस्तावेजों की बंदिशों से जूझ रहे वंचित किसान वर्गों तक लक्षित संस्थागत सहायता पहुंचाने में काफी सहायक साबित हो सकती है।\n\nउत्पादन केंद्रों के पास प्रसंस्करण इकाइयों की जरूरत\nकृषि उपज के उत्पादन से लेकर प्राथमिक प्रसंस्करण, सुरक्षित भंडारण, विपणन और निर्यात तक पूरी मूल्य श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही गई है। कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, परिवहन और मार्केटिंग सुविधाएं स्थापित करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी फसलों की कटाई वाले क्षेत्रों के निकट प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करना है। ऐसी फसलें जो कटाई के महज दो से पांच दिनों के भीतर खराब होने लगती हैं, उनके लिए स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाई उपलब्ध होना निर्णायक होता है। स्थानीय सुविधाएं न होने पर किसानों को जल्दबाजी में कम दामों पर उपज बेचनी पड़ती है या बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है।\n\nअगरवुड, अदरक और हल्दी के लिए समर्पित निर्यात ढांचा\nअसम के अगरवुड क्षेत्र की बड़ी आर्थिक क्षमता का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि यदि इसे अनुकूल नीतियां मिलें तो किसानों को भारी आर्थिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने कहा कि असम के अगरवुड क्षेत्र में अपार आर्थिक संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने मांग की कि इसके लिए नियामकीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, व्यापक गुणवत्ता परीक्षण सुविधाएं विकसित की जाएं, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित हों और विदेशी बाजारों तक सीधी पहुंच के लिए सुदृढ़ निर्यात गलियारे तैयार किए जाएं। इसके साथ ही असम के पहाड़ी इलाकों में पैदा होने वाली प्रीमियम गुणवत्ता की अदरक और हल्दी के लिए प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय एयर कार्गो सहित विशेष निर्यात तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया गया।\n\nआपदाओं के बीच त्वरित सहायता तंत्र की पुकार\nपूर्वोत्तर क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता की चर्चा करते हुए बाढ़, सूखे और कीटों के प्रकोप से होने वाले नुकसान का हवाला दिया गया। इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं और आकस्मिक संकट के समय किसानों को सहारा देने के लिए त्वरित कार्रवाई तथा वास्तविक समय में हस्तक्षेप करने वाली प्रणाली तैयार करना बेहद जरूरी है। कृषि वित्तपोषण और संपूर्ण कृषि तंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच निरंतर सहयोग को आधारशिला बताया गया है।\n\nइसका आप पर असर\nकृषि वित्तपोषण और स्थानीय प्रसंस्करण को लेकर उठाए गए इन कदमों से किसानों और कृषि आधारित कारोबारियों के लिए कर्ज व बाजार के रास्ते आसान हो सकते हैं।\n\n• पूर्वोत्तर में: असम में फार्मर आईडी वितरण से उन पट्टेदारों और छोटे उत्पादकों को बैंक से कर्ज मिलना आसान होगा जिनके पास जमीन का मालिकाना हक नहीं है। इससे बिना दस्तावेज वाले किसानों को साहूकारों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।\n• भारत में: यदि केंद्र सरकार क्षेत्रीय जरूरतों के अनुरूप कृषि कर्ज नीति बनाती है, तो विभिन्न राज्यों के किसानों को अपनी स्थानीय फसल के अनुसार संस्थागत ऋण मिल सकेगा। इससे देश के 40 से 46 प्रतिशत कृषि कार्यबल को सीधे औपचारिक बैंकिंग से जुड़ने का मौका मिलेगा।\n• फसल बर्बादी पर रोक: कटाई केंद्रों के समीप प्रसंस्करण इकाइयां बनने से दो से पांच दिनों में खराब होने वाली फल और सब्जियों का नुकसान घटेगा। किसान अपनी उपज का मूल्य संवर्धन करके बेहतर मुनाफा कमा सकेंगे।\n• निर्यात के अवसर: पहाड़ी अदरक, हल्दी और अगरवुड के लिए अंतरराष्ट्रीय एयर कार्गो और जांच सुविधाएं मिलने से उत्पादकों को विदेशी बाजार मिलेंगे। इससे छोटे किसानों की आय में सीधा इजाफा हो सकेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nअसम सरकार ने राष्ट्रीय सम्मेलन में यह मांग इसलिए रखी क्योंकि पूरे देश पर लागू होने वाली एकल वित्तीय नीति पूर्वोत्तर की भौगोलिक और प्रशासनिक वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं बैठ रही है। जमीन के दस्तावेजों की कमी और त्वरित प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव किसानों के संकट को बढ़ा रहा है।\n\n• दस्तावेजी बाधाएं: पूर्वोत्तर में बड़ी संख्या में किसान बटाईदार हैं या वन भूमि और सरकारी जमीन पर खेती करते हैं, जिससे उनके पास औपचारिक जमीन का पट्टा नहीं होता। बैंकों के सख्त नियमों के कारण इन काश्तकारों को संस्थागत ऋण मिलने में गंभीर रुकावट आती है।\n• नाशवान फसलों का नुकसान: कई बागवानी और कृषि उत्पाद कटाई के दो से पांच दिनों में खराब हो जाते हैं। स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र न होने के कारण उत्पादकों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है।\n• आपदाओं का निरंतर प्रकोप: यह क्षेत्र नियमित रूप से बाढ़, सूखे और कीटों के हमलों की चपेट में रहता है। संकट के समय तत्काल राहत और वित्तीय सुरक्षा देने वाली कोई वास्तविक समय की प्रणाली न होने से किसान गंभीर वित्तीय दबाव में आ जाते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. असम के वित्त मंत्री ने केंद्र सरकार से मुख्य रूप से क्या मांग की है?\nउन्होंने कृषि वित्तपोषण के लिए क्षेत्रीय जरूरतों पर आधारित नीतियां बनाने, संस्थागत कर्ज को सुलभ करने और उत्पादन केंद्रों के निकट प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने की मांग की है।\n\n2. देश के कुल कार्यबल और अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या योगदान बताया गया?\nदेश का लगभग 40 से 46 प्रतिशत कार्यबल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में लगा हुआ है, जबकि जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 18 प्रतिशत है।\n\n3. पूर्वोत्तर में किसानों को बैंक कर्ज लेने में क्या परेशानी आती है?\nबटाईदारों, पट्टेदारों और छोटे चाय उत्पादकों के पास जमीन के औपचारिक मालिकाना हक और पट्टे के दस्तावेज न होने के कारण बैंक उन्हें आसानी से संस्थागत ऋण नहीं देते।\n\n4. दस्तावेजों की समस्या से निपटने के लिए असम में क्या कदम उठाया गया है?\nअसम में किसानों को फार्मर आईडी का वितरण शुरू किया गया है, ताकि बिना जमीन के पट्टे वाले काश्तकारों तक भी लक्षित संस्थागत मदद पहुंचाई जा सके।\n\n5. स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां लगाना क्यों जरूरी है?\nकई नाशवान कृषि उत्पाद कटाई के दो से पांच दिनों के भीतर खराब हो जाते हैं, इसलिए नुकसान से बचने के लिए खेत के पास ही प्रसंस्करण सुविधाएं होना बेहद जरूरी है।\n\n6. असम के किन उत्पादों के लिए विशेष निर्यात सुविधाओं की मांग की गई है?\nअसम के अगरवुड के लिए नियामक रियायतें और गुणवत्ता जांच लैब, तथा पहाड़ी क्षेत्रों की प्रीमियम अदरक और हल्दी के लिए अंतरराष्ट्रीय एयर कार्गो सुविधाओं की मांग की गई है।",
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  "category": "असम",
  "publishedAt": "2026-09-20",
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    "कृषि ऋण",
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