असमिया संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने में जुटीं रोदाली बोरा, ब्रिटेन के मंचों पर बिखेरे सत्रिया और बिहू के रंग ब्रिटेन के बर्मिंघम में रहकर रोदाली बोरा असम की शास्त्रीय नृत्य परंपरा सत्रिया और लोकनृत्य बिहू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला रही हैं। शास्त्रीय मंचों की आध्यात्मिक गरिमा से लेकर बड़े पर्दे की दृश्य कला तक, कला के विविध माध्यमों को साधते हुए असम की युवा कलाकार रोदाली बोरा अपनी मिट्टी की सांस्कृतिक विरासत को सात समंदर पार एक नई पहचान दे रही हैं। ब्रिटेन के बर्मिंघम शहर में रहते हुए वह नृत्य, अभिनय और निर्देशन के जरिए असमिया परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय फलक पर लगातार प्रस्तुत कर रही हैं। उनके लिए यह कला केवल मंच पर किया जाने वाला प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से निरंतर जुड़े रहने और असम की समृद्ध विरासत को दुनिया भर के दर्शकों के सामने सहजता से पेश करने का सबसे सशक्त माध्यम है। ढाई साल की उम्र से शुरू हुई कला साधना रोदाली बोरा के कलात्मक सफर की शुरुआत बेहद नन्ही उम्र में ही हो गई थी। जब वह मात्र ढाई वर्ष की थीं, तब गुरु रंजीत गोगोई के मार्गदर्शन में उन्होंने बिहू नृत्य की बारीकियां सीखनी शुरू की थीं। असम के इस जीवंत लोकनृत्य के बाद उन्होंने शास्त्रीय नृत्य सत्रिया की गंभीर और अनुशासित शिक्षा हासिल की। सत्रिया की यह विस्तृत तालीम उन्हें प्रतिष्ठित गुरुओं अंजुमणि सैकिया, रिंजुमणि सैकिया और ध्रुव ज्योति पाठक से मिली। लगभग दो दशकों के अनवरत अभ्यास और कठोर अनुशासन ने उन्हें नृत्य, अभिनय, भक्तिमय कथा वाचन तथा चाली और झुमुरा जैसी विशिष्ट शैलियों में पूरी तरह दक्ष बना दिया। राष्ट्रीय सम्मान और मंच पर ढाई सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां अपनी दो दशकों की साधना के दौरान रोदाली भारत और ब्रिटेन में 225 से अधिक मंच प्रस्तुतियों में अपनी कला का जादू बिखेर चुकी हैं। उनकी इस शास्त्रीय प्रतिभा को दूरदर्शन ने बी ग्रेड सत्रिया कलाकार के रूप में मान्यता दी है। इसके अलावा, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा उन्हें सत्रिया नृत्य के लिए सीसीआरटी राष्ट्रीय जूनियर छात्रवृत्ति से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 2017 से 2025 के दौरान उन्होंने भारत के साथ विदेशों में भी सांस्कृतिक शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया और सत्रिया तथा बिहू के प्रचार-प्रसार में जुटी रहीं। उन्होंने देश के अन्य सात शास्त्रीय नृत्यों के साथ सत्रिया को स्थापित करने के लिए सीसीआरटी के कई कार्यशालाओं और विशेष कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई। सत्रिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का संकल्प असम के वैष्णव मठों यानी सत्रों से उपजा सत्रिया नृत्य भारत के आठ शास्त्रीय नृत्य रूपों में अपना एक विशिष्ट और अत्यंत पूजनीय स्थान रखता है। गहरे आध्यात्मिक दर्शन और समृद्ध इतिहास से जुड़े होने के बावजूद वैश्विक मंचों पर इसे अपेक्षाकृत कम पहचान मिली है। रोदाली का मुख्य उद्देश्य इसी फासले को पाटना है। वह विदेशी दर्शकों को जहां एक ओर सत्रिया की पावन गरिमा और शांत शालीनता से परिचित करा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ असम के सबसे लोकप्रिय लोक उत्सव बिहू के उल्लास, गति और ऊर्जा से भी लोगों को जोड़ रही हैं। ब्रिटेन के प्रतिष्ठित मंचों पर असमिया कला की गूंज ब्रिटेन में उनका कलात्मक सफर बेहद तेजी से आगे बढ़ रहा है। फरवरी 2026 में बर्मिंघम स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास में आयोजित आईसीसीआर दिवस समारोह के दौरान उन्होंने सत्रिया और बिहू दोनों की शानदार प्रस्तुतियां दीं। इसके बाद उन्होंने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में राज्य एवं भाषा दिवस के भव्य आयोजन पर बिहू की मनमोहक छटा बिखेरी। जून 2026 में जब औनियाटी सत्र के सत्राधिकार डॉ. पीतांबर देव गोस्वामी ब्रिटेन के दौरे पर थे, तब ब्रिटिश संसद में आयोजित एक संगोष्ठी से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम में रोदाली ने सत्रिया नृत्य की प्रस्तुति दी। इस प्रतिष्ठित अवसर ने असम की शास्त्रीय कला को ब्रिटेन के सर्वोच्च संस्थागत मंच पर स्थापित करने का काम किया। इससे पहले लंदन के द नेहरू सेंटर में आयोजित 'नृत्य संगम' में उन्होंने कथक और सत्रिया के जुगलबंदी सत्र में कृष्ण वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत की थी। यह अवसर उनके लिए व्यक्तिगत रूप से भी खास था, क्योंकि वर्ष 2013 में वह पहली बार एक छात्रा के रूप में अपने गुरु के साथ उसी नेहरू सेंटर गई थीं, और वर्षों बाद वह वहां मुख्य कलाकार बनकर लौटीं। उनकी कलात्मक यात्रा को बर्मिंघम के समर्पण 2026 कार्यक्रम में दीक्षा आर्ट्स द्वारा यूथ आइकन अवार्ड से नवाजा गया। इससे पहले वर्ष 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में भी उन्होंने बिहू प्रस्तुत कर असम का गौरव बढ़ाया था। राष्ट्रीय फलक और वैश्विक मंचों पर लगातार उपस्थिति वर्ष 2025 रोदाली के कला करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। ओडिशा में संपन्न हुए 18वें प्रवासी भारतीय दिवस के मंच पर उन्होंने एक साथी कलाकार के साथ वैश्विक नेताओं और प्रवासी भारतीयों के सामने सत्रिया नृत्य पेश किया। इसके अलावा नई दिल्ली के यशोभूमि सेंटर में आयोजित वोफा वर्ल्ड फोरम में भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सम्मुख सत्रिया की महत्ता को रेखांकित किया। उसी साल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी में आयोजित महिला दिवस कार्यक्रम में भी उन्हें प्रस्तुति का सौभाग्य मिला। मध्य प्रदेश में भारत भवन के 43वें वर्षगांठ समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी जैसे गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई। नवंबर 2025 में सम्पद संस्था द्वारा बर्मिंघम के मिडलैंड्स आर्ट्स सेंटर में आयोजित विशेष शास्त्रीय संध्या 'उजाला' में उन्हें चुना गया, जहां भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी और यक्षगान के साथ सत्रिया को रखकर ब्रिटिश दर्शकों को भारत की संपूर्ण विविधता के दर्शन कराए गए। उनकी यह यात्रा नई नहीं है। इससे पहले वर्ष 2018 में नई दिल्ली के भारत मंडपम में भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले के असम दिवस पर उन्होंने बिहू और सत्रिया की छटा बिखेरी थी। वर्ष 2024 में 7वें पूर्वोत्तर महोत्सव में चार हजार लोगों के विशाल जनसमूह के सामने उन्होंने प्रस्तुति दी। वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम, 2013 में टाइटैनिक शताब्दी स्मृति कार्यक्रम और 2016 में असम के राज्यपाल के समक्ष अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप दिवस पर भी उनकी प्रस्तुतियां इतिहास का हिस्सा रही हैं। डॉ. भूपेन हजारिका के गीतों पर विशेष शास्त्रीय प्रस्तुति कला के क्षेत्र में उनके जीवन का एक यादगार मोड़ 2009 में आया था, जब भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका के अमर संगीत को समर्पित एक घंटे का विशेष टेलीविजन कार्यक्रम तैयार किया गया। वरिष्ठ पत्रकार जीतूमणि बोरा और रोजी बोरा की परिकल्पना तथा रोदाली के गुरुओं के निर्देशन में हजारिका के गीतों को शास्त्रीय संलयन नृत्य के रूप में ढाला गया। एनई टीवी पर प्रसारित इस कार्यक्रम को डॉ. हजारिका ने मुंबई में बैठकर देखा था और वहीं से नन्ही कलाकार को अपना स्नेह, प्रशंसा और आशीर्वाद भेजा था। सिनेमा के पर्दे पर बाल कलाकार से अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तक नृत्य के समानांतर रोदाली बोरा ने असमिया सिनेमा में भी अपनी एक अलग और सशक्त पहचान बनाई है। उन्होंने चार साल की उम्र में टेलीफिल्म 'काबुलीवाला' में मिनी का किरदार निभाकर अभिनय की दुनिया में कदम रखा था। अब तक वह 14 अलग-अलग स्क्रीन निर्माणों में काम कर चुकी हैं। फिल्म 'ब्रह्मकन्या: द कलर ऑफ होप' में अपने बेहतरीन अभिनय के लिए उन्हें ब्राजील के 2023 कैंपिनास फिल्म फेस्टिवल में अंतरराष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान मिला। इसके अलावा 'सूर्यास्त', 'सीमा: द स्टोरी अनटोल्ड' और 'फेहुजाली' जैसी फिल्मों के लिए उन्हें क्षेत्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेत्री के पुरस्कार मिले। वर्ष 2025 में उनकी फिल्म 'बुर्खा: द वेल' के लिए अहमदाबाद और दुर्गापुर के फिल्म समारोहों के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत के प्रतिष्ठित 8वें शैलधर बरुआ फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब हासिल हुआ। वह वर्ष 2021 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और रजत कमल जीतने वाली फिल्म 'रोनुवा: हू नेवर सरेंडर्स' का भी हिस्सा रहीं। कैमरे के पीछे की दृष्टि और बहुआयामी प्रतिभा अभिनय के साथ रोदाली की रुचि निर्देशन और दृश्य संचार में भी बढ़ी। शारदा विश्वविद्यालय से फिल्म एवं टेलीविजन प्रोडक्शन की पढ़ाई करते हुए उन्होंने लघु फिल्म 'भ्रम: एन इल्यूजन' का निर्देशन किया, जिसके लिए उन्हें 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सम्मान मिला। स्नातक स्तर पर उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए उन्हें कुलपति स्वर्ण पदक से नवाजा गया। इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए बर्मिंघम चली गईं, जहां उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम से मास मीडिया में स्नातकोत्तर अध्ययन किया। वह 92.7 बिग एफएम पर रेडियो अभिनय और प्रस्तुतिकरण, मंच संचालन, चित्रकला और 16 वर्षों तक लॉन टेनिस खेलने जैसी बहुमुखी प्रतिभाओं की धनी हैं। असम से ब्रिटेन तक का उनका सफर परंपरा और समकालीन सोच का एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है। इसका आप पर असर यह खबर दर्शाती है कि भारतीय शास्त्रीय और लोक कलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किस तरह अपनी पहुंच का विस्तार कर रही हैं और युवा कलाकारों के लिए वैश्विक अवसर खोल रही हैं। • भारत में: देश के पूर्वोत्तर राज्यों की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर मुख्यधारा में लाने का मार्ग प्रशस्त होता है। इससे युवा कलाकारों को पारंपरिक विधाओं को आधुनिक करियर के साथ जोड़ने का प्रोत्साहन मिलता है। • असम में: राज्य की पारंपरिक कलाओं जैसे सत्रिया और बिहू को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के बीच नई पहचान और सम्मान प्राप्त हो रहा है। स्थानीय प्रतिभाओं और नृत्य गुरुओं की विरासत को वैश्विक मंचों पर सीधी सराहना मिल रही है। • कलाकारों और विद्यार्थियों के लिए: यह यात्रा दिखाती है कि शास्त्रीय अनुशासन के साथ बहुआयामी कौशल विकसित कर वैश्विक स्कॉलरशिप और फेलोशिप हासिल की जा सकती हैं। युवा कला साधक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करते हुए भी अपनी परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं। • प्रवासी भारतीयों के लिए: विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय को अपनी मिट्टी की कला और संस्कृति से जीवंत संपर्क बनाए रखने का अवसर मिलता है। ब्रिटेन जैसे देशों में भारतीय दूतावास और सांस्कृतिक केंद्र ऐसे कार्यक्रमों के जरिए जड़ों से जोड़ते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह घटनाक्रम पारंपरिक कलाओं को वैश्विक दर्शकों तक ले जाने के निरंतर प्रयासों और एक बहुआयामी कलाकार के दो दशक के समर्पण का परिणाम है। • सीमित वैश्विक पहुंच को दूर करने का प्रयास: भरतनाट्यम या कथक की तुलना में असम के सत्रिया नृत्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम मंच मिल पाते थे। रोदाली बोरा ने इस अंतर को पाटने के लिए विदेशी मंचों और दूतावासों में इस कला को पेश करने का बीड़ा उठाया। • बचपन से मिला अनुशासित प्रशिक्षण: मात्र ढाई साल की उम्र से बिहू और बाद में सत्रिया के शीर्ष गुरुओं से मिले लंबे प्रशिक्षण ने उन्हें उच्च स्तर की शास्त्रीय परिपक्वता दी। इस कठोर अभ्यास ने उन्हें विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असम का प्रामाणिक प्रतिनिधित्व करने के योग्य बनाया। • शिक्षा और कला का संयोजन: बर्मिंघम विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिए जाने से उन्हें ब्रिटेन के कला केंद्रों और सांस्कृतिक संगठनों से सीधे जुड़ने का अवसर मिला। अकादमिक अध्ययन के साथ-साथ उन्होंने मंच प्रदर्शन को भी नई गति दी। सवाल-जवाब 1. रोदाली बोरा कौन हैं? रोदाली बोरा असम की एक बहुआयामी कलाकार हैं, जो सत्रिया नृत्य, बिहू, अभिनय और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में ब्रिटेन के बर्मिंघम में रहती हैं। 2. उन्होंने किन पारंपरिक नृत्य रूपों में प्रशिक्षण लिया है? उन्होंने गुरु रंजीत गोगोई से बिहू तथा गुरु अंजुमणि सैकिया, रिंजुमणि सैकिया और ध्रुव ज्योति पाठक से शास्त्रीय सत्रिया नृत्य की विधिवत शिक्षा ली है। 3. ब्रिटेन में उन्होंने किन प्रमुख मंचों पर प्रस्तुतियां दी हैं? उन्होंने बर्मिंघम में भारतीय महावाणिज्य दूतावास, लंदन में भारतीय उच्चायोग, ब्रिटिश संसद में आयोजित संगोष्ठी और द नेहरू सेंटर में प्रस्तुतियां दी हैं। 4. उन्हें सिनेमा के क्षेत्र में कौन सा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है? फिल्म 'ब्रह्मकन्या: द कलर ऑफ होप' में मुख्य भूमिका के लिए उन्हें 2023 में ब्राजील के कैंपिनास फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था। 5. सत्रिया नृत्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है? सत्रिया असम के वैष्णव मठों यानी सत्रों से उत्पन्न हुआ नृत्य है, जो भारत के आठ आधिकारिक शास्त्रीय नृत्यों में शामिल है। 6. रोदाली बोरा की शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या रही है? उन्होंने शारदा विश्वविद्यालय से फिल्म एवं टीवी प्रोडक्शन में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक किया है और यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम से मास मीडिया में परास्नातक किया है। प्रेरणा और सबक रोदाली बोरा की जीवन यात्रा युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर विश्व स्तर पर पहचान बनाने का मार्ग दिखाती है। • जड़ों से जुड़ाव: चाहे आप दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाएं, अपनी मूल संस्कृति और पहचान का सम्मान करना आपको सबसे अलग और प्रामाणिक बनाता है। • निरंतर अभ्यास और अनुशासन: किसी भी कला या कौशल में महारत हासिल करने के लिए वर्षों के कठोर अभ्यास और धैर्य की आवश्यकता होती है। • विविध कौशलों का विकास: नृत्य के साथ-साथ अभिनय, निर्देशन, खेल और शिक्षा में संतुलन बनाकर एक बहुआयामी व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सकता है। • उद्देश्यपूर्ण मिशन: अपनी व्यक्तिगत कला को अपनी मिट्टी और समुदाय की विरासत को बढ़ावा देने का जरिया बनाना जीवन को बड़ा मकसद देता है। https://trendkia.com/assam/assam-snskriti-ko-vaishvika-pahachana-dilane-men-jutin-rodali-bora-uk-ke-mnchon-para-bikhere-sattriya-aura-bihu-ke-rnga-35380 TrendKia — Har trend, sabse pehle.