जनगणना 2027 को लेकर गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में कठपुतली शो, छात्रों ने दिया सही जानकारी दर्ज कराने का संदेश गुवाहाटी यूनिवर्सिटी और डॉ. अनामिका रे मेमोरियल ट्रस्ट ने कठपुतली कला के जरिए छात्रों और आम लोगों को जनगणना 2027 में पूरी व सटीक जानकारी देने के लिए जागरूक किया। आगामी जनगणना 2027 की तैयारियों और उसकी विश्वसनीयता को लेकर शैक्षणिक परिसर में एक अनूठी पहल देखने को मिली। गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के संचार एवं पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों ने डॉ. अनामिका रे मेमोरियल ट्रस्ट (ARMT) के साथ मिलकर पारंपरिक कठपुतली कला के जरिए जागरूकता अभियान चलाया। यूनिवर्सिटी परिसर में बीकेबी सभागार के सामने आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों को जनगणना में पूरी तरह सच और सटीक विवरण दर्ज कराने के लिए प्रेरित करना था। पारंपरिक कला से सामाजिक चेतना जगाने का प्रयास इस पूरे कार्यक्रम में दिलचस्प कहानियों, आम जीवन से जुड़े किरदारों और संवादात्मक प्रस्तुतियों का सहारा लिया गया। कठपुतली नचाने वाले युवा कलाकारों ने देशव्यापी गणना अभियान के महत्व को बेहद सहज रूप में पेश किया। कठपुतली कला सदियों पुरानी पारंपरिक संचार विधा मानी जाती है। छात्रों ने साबित किया कि गंभीर और समसामयिक प्रशासनिक मुद्दों को जनता तक पहुंचाने के लिए यह लोक विधा आज भी उतनी ही असरदार है। प्रस्तुति के माध्यम से जनगणना को लेकर आम लोगों के मन में पैदा होने वाले भ्रम दूर करने की कोशिश की गई। मंचन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि जब भी प्रगणक घर आएं, तो उन्हें अधूरी या गलत जानकारी न दी जाए। यह संदेश मनोरंजक अंदाज में दिए जाने के कारण वहां मौजूद छात्र समुदाय और विश्वविद्यालय के अन्य सदस्यों ने इसे काफी सराहा। विकास संचार और व्यवहार परिवर्तन में लोक माध्यमों की भूमिका यह पहल दिखाती है कि डेवलपमेंट कम्युनिकेशन (C4D) तथा सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संचार (SBCC) के सिद्धांतों में लोक माध्यम आज भी बेजोड़ हैं। डिजिटल मंचों के इस दौर में विभिन्न वर्गों तक सीधे पहुंचने और जनहित के अभियानों में सक्रिय भागीदारी बढ़ाने के लिए स्थानीय कला परंपराएं बेहद मजबूत जरिया साबित होती हैं। डॉ. अनामिका रे मेमोरियल ट्रस्ट लंबे समय से कठपुतली कला को पुनर्जीवित कर उसे सामाजिक बदलाव का हथियार बनाने में जुटा है। संस्था ने समय के साथ धागा कठपुतली, दस्ताना कठपुतली और छड़ कठपुतली जैसी कई शैलियों में नवाचार किए हैं। इन कला रूपों का उपयोग जनहित और विकास से जुड़े विषयों को सरल शब्दों में समझाने के लिए निरंतर किया जाता रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठपुतली अभियानों की गूंज ट्रस्ट के इन लोक संचार अभियानों को पूर्व में यूनिसेफ, असम सरकार, सिक्किम सरकार, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) और NEDSSS जैसे बड़े संस्थानों व विकास साझेदारों का सहयोग मिलता रहा है। संस्था की तैयार की गई प्रस्तुतियां केवल असम तक सीमित नहीं रही हैं। इन्हें भारत के कई अन्य राज्यों के अलावा पड़ोसी मुल्कों जैसे श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश में भी व्यापक स्तर पर प्रदर्शित किया जा चुका है। पत्रकारिता एवं संचार की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों के लिए यह आयोजन क्लासरूम की थ्योरी को जमीन पर उतारने का बेहतरीन मौका साबित हुआ। छात्रों ने समझा कि जनचेतना और नागरिक जिम्मेदारियों को बढ़ावा देने के लिए पारंपरिक कलाएं किस तरह काम करती हैं। इस प्रकार की प्रस्तुतियां ट्रस्ट के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर भी उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि लोक कला के जरिए शिक्षा और जागरूकता का यह प्रयास दूर-दूर तक पहुंच सके। इसका आप पर असर यह जागरूकता अभियान नागरिकों को आगामी जनगणना में बिना झिझक पूरी व सही जानकारी दर्ज करने के लिए तैयार करता है ताकि सरकारी नीतियों का लाभ सही लोगों तक पहुंचे। • भारत में: आगामी जनगणना 2027 में प्रत्येक नागरिक से जुड़ी जनसांख्यिकी जानकारी एकत्रित की जाएगी। नागरिकों द्वारा दी गई सटीक जानकारी से ही देश में कल्याणकारी योजनाओं, बजट और संसाधनों का सही आवंटन संभव होता है। • गुवाहाटी और असम में: पूर्वोत्तर के नागरिकों को क्षेत्रीय स्तर पर लोक कलाओं के जरिए गणना प्रक्रिया समझने में आसानी होगी। स्थानीय निवासी प्रगणकों के आने पर सही व पूर्ण विवरण देकर भविष्य की ढांचागत योजनाओं को मजबूत बना सकते हैं। • छात्रों और युवाओं के लिए: विश्वविद्यालय परिसर में हुए इस आयोजन से युवा पीढ़ी में नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती है। युवा अपने परिवारों और पड़ोसियों को भी बिना किसी डर के जनगणना में सहयोग देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। • पारंपरिक कलाकारों के लिए: विकास संचार में लोक विधाओं के इस्तेमाल से स्थानीय लोक कलाओं और कठपुतली कलाकारों को नया मंच व पहचान मिलती है। इससे सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक प्रशासनिक जरूरतों के साथ जोड़े रखने में मदद मिलती है। ऐसा क्यों हुआ आगामी जनगणना 2027 के मद्देनजर नागरिकों को सही जानकारी देने और पुराने भ्रम दूर करने के उद्देश्य से इस अभियान की शुरुआत की गई है। जमीनी स्तर पर सूचनाओं के सही संप्रेषण के लिए आधुनिक माध्यमों के साथ पारंपरिक लोक कलाओं को जोड़ना जरूरी समझा गया। • सटीक डेटा का महत्व: विकास योजनाओं और सरकारी नीतियों की सफलता काफी हद तक विश्वसनीय आंकड़ों पर निर्भर करती है। जनगणना में गलत या अधूरी प्रविष्टियां होने से वास्तविक जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में बाधा आती है। • पारंपरिक माध्यमों का प्रभाव: जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझाने में डिजिटल माध्यमों की तुलना में लोक कलाएं अधिक सहज मानी जाती हैं। कठपुतली की सजीव प्रस्तुति ग्रामीण और शहरी दोनों तरह के दर्शकों से तुरंत भावनात्मक जुड़ाव बनाती है। • संस्थागत साझेदारी: विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग और डॉ. अनामिका रे मेमोरियल ट्रस्ट ने मिलकर छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान देने और समाज को जागरूक करने का फैसला किया। इस तरह के प्रयोग पूर्व में भी सामाजिक अभियानों में बेहद सफल रहे हैं। सवाल-जवाब 1. गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में किस विषय पर कठपुतली शो आयोजित किया गया? यह कठपुतली शो आगामी जनगणना 2027 के प्रति जागरूकता फैलाने और नागरिकों को सटीक जानकारी दर्ज कराने के लिए आयोजित किया गया। 2. इस जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किन संस्थाओं ने मिलकर किया? इसका आयोजन गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के संचार एवं पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों और डॉ. अनामिका रे मेमोरियल ट्रस्ट ने मिलकर किया। 3. कार्यक्रम में कठपुतली की किन शैलियों और तरीकों का उपयोग किया गया? ट्रस्ट धागा कठपुतली, दस्ताना कठपुतली और छड़ कठपुतली जैसी शैलियों के जरिए सामाजिक और विकासात्मक संदेशों को प्रस्तुत करता है। 4. क्या इन कठपुतली कार्यक्रमों को ऑनलाइन भी देखा जा सकता है? हाँ, डॉ. अनामिका रे मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा तैयार किए गए कठपुतली आधारित वीडियो उनके आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं। https://trendkia.com/assam/census-2027-ko-lekara-gauhati-university-men-kathaputali-sho-chhatron-ne-diya-sahi-janakari-darja-karane-ka-sndesha-49775 TrendKia — Har trend, sabse pehle.