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  "type": "article",
  "title": "डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और असम सरकार से मांगा जवाब, ऑयल इंडिया ने दी है अर्जी",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे तेल व गैस निकालने की मंजूरी खारिज किए जाने के खिलाफ ऑयल इंडिया की याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के बाद करेगी।",
  "content": "असम के तिनसुकिया जिले में स्थित डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे हाइड्रोकार्बन निकालने की अनुमति न मिलने के मामले में देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संरक्षित वन क्षेत्र के नीचे एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक के जरिए तेल और प्राकृतिक गैस निकालने के प्रस्ताव को खारिज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार और असम सरकार से औपचारिक जवाब मांगा है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ऑयल इंडिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की दलीलें सुनने के बाद यह कदम उठाया। कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से यह परियोजना बेहद अहम है, इसलिए इस पर तत्काल विचार किया जाना जरूरी है।\n\nसंरक्षित वन क्षेत्र से बाहर रहकर भूमिगत खनन की योजना\nसार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल इंडिया का कहना है कि उसकी प्रस्तावित योजना पारंपरिक खनन प्रक्रिया से पूरी तरह अलग है और इसके तहत राष्ट्रीय उद्यान के अंदरूनी हिस्से में किसी भी तरह की सीधी ड्रिलिंग या सतही गतिविधि नहीं की जाएगी। कंपनी की तकनीकी योजना के अनुसार, ड्रिलिंग से जुड़े सभी बुनियादी ढांचे और मुख्य कुएं राष्ट्रीय उद्यान की तय सीमा के बाहर स्थापित किए जाएंगे। वहां से लगभग 3,500 से 4,000 मीटर की गहराई तक लंबवत खुदाई करने के बाद उन्नत तकनीक के जरिए क्षैतिज यानी हॉरिजॉन्टल दिशा में पाइपलाइन बिछाकर जंगल के नीचे मौजूद हाइड्रोकार्बन भंडारों तक पहुंचा जाएगा।\n\nवरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान से सटे इस पूरे इलाके में देश के कुल हाइड्रोकार्बन भंडार का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा मौजूद होने का अनुमान है। उन्होंने पीठ को आश्वस्त किया कि एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक के इस्तेमाल से सतह पर रहने वाले किसी भी वन्यजीव, जंतु या वहां की वनस्पति को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। अदालत ने इन दलीलों पर गौर करते हुए संकेत दिया कि वह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सहित अन्य संबंधित प्राधिकरणों की रिपोर्टों और अनुसंधान व विकास के तकनीकी निष्कर्षों की गहन जांच करने के बाद ही इस परियोजना पर कोई अंतिम फैसला लेगी। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के बाद निर्धारित की है।\n\nवन मंजूरी खारिज करने के फैसले पर कानूनी विवाद\nऑयल इंडिया की इस कानूनी चुनौती की मुख्य जड़ तिनसुकिया जिले में प्रस्तावित ड्रिलिंग अभियान के लिए 0.069 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग यानी डायवर्जन की अनुमति न मिलना है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसे कंपनी ने अदालत में चुनौती दी है। कंपनी ने वन सलाहकार समिति की सिफारिशों के साथ-साथ मंत्रालय द्वारा 2 अगस्त 2024 को लिए गए नकारात्मक फैसले और 4 जुलाई 2024 को हुई समिति की बैठक के कार्यवृत्त को रद्द करने की मांग की है। इसके अतिरिक्त, कंपनी ने वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 की धारा 2(1)(ii) के तहत इस वन भूमि के उपयोग के लिए आवश्यक वैधानिक स्वीकृति देने का अनुरोध किया है।\n\nपूरे विवाद का केंद्र सुप्रीम कोर्ट का 26 अप्रैल 2023 का वह ऐतिहासिक फैसला है, जिसमें देश भर के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर तथा उनकी सीमाओं से एक किलोमीटर के दायरे में सभी प्रकार की खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऑयल इंडिया का तर्क है कि यह न्यायिक प्रतिबंध एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग पर लागू नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस तकनीक में संरक्षित क्षेत्र की जमीन पर कोई गतिविधि नहीं होती बल्कि बाहर से ही भूमिगत भंडारों का दोहन किया जाता है। कंपनी का यह भी पक्ष है कि तेल और प्राकृतिक गैस की खोज व उत्पादन का विनियामक ढांचा पूरी तरह अलग है, इसलिए इसे पारंपरिक पत्थर या कोयला खनन के बराबर नहीं माना जा सकता।\n\nपुरानी मंजूरियों और वैधानिक प्रक्रियाओं का संदर्भ\nअपनी याचिका के समर्थन में ऑयल इंडिया ने शीर्ष अदालत के 2017 के पूर्व आदेशों का हवाला दिया है, जब आवश्यक पर्यावरण और वन्यजीव सुरक्षा उपायों की शर्त पर डिब्रू-सैखोवा के नीचे भूमिगत हाइड्रोकार्बन दोहन की अनुमति दी गई थी। इसके साथ ही राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति द्वारा पहले दी गई सिफारिश का भी उल्लेख किया गया है। कंपनी ने जनवरी 2020 में डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के लिए जारी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र यानी इको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें सीमा के विभिन्न हिस्सों के आधार पर यह दायरा शून्य से 8.7 किलोमीटर तक निर्धारित किया गया है।\n\nकंपनी के अनुसार, संरक्षित क्षेत्र के नीचे सात अलग-अलग स्थानों पर एक्सटेंशन ड्रिलिंग और हाइड्रोकार्बन परीक्षण के लिए मई 2020 में पर्यावरण मंजूरी मिल चुकी थी, हालांकि वन भूमि से जुड़ी गतिविधियों के लिए अलग से वन मंजूरी लेना अनिवार्य था। इससे पहले 2 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ऑयल इंडिया को अपनी पुरानी अंतरिम अर्जी वापस लेकर एक नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दी थी। उस दौरान कंपनी ने स्पष्ट किया था कि पाइपलाइन और ड्रिलिंग ढांचा पार्क से बाहर रहेगा और केवल भूमिगत ड्रिलिंग ही जंगल के नीचे जाएगी। अदालत ने नई वजह के आधार पर नई याचिका दायर करने की छूट दी थी। यह पूरा मामला ऐतिहासिक टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मुकदमे का हिस्सा है, जो 1995 से देश में वन संरक्षण के मानकों को तय कर रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nअसम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे हाइड्रोकार्बन दोहन पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से देश की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण नियमों के बीच संतुलन पर सीधा असर पड़ेगा।\n\n• भारत में ऊर्जा आपूर्ति: देश की कुल तेल और गैस संपदा का तीन प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण इस फैसले का असर घरेलू ईंधन उत्पादन पर पड़ेगा। यदि परियोजना को सशर्त मंजूरी मिलती है तो भविष्य में ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।\n• असम में विकास और पर्यावरण: तिनसुकिया और आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक निवेश बढ़ने के साथ-साथ नाजुक वन्यजीव अभयारण्य की सुरक्षा पर नजर रखी जा सकेगी। स्थानीय स्तर पर रोजगार और राजस्व के अवसर पैदा होने के साथ पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंताएं भी इस कानूनी फैसले से तय होंगी।\n• अन्य ऊर्जा कंपनियों के लिए नियम: देश भर में संरक्षित क्षेत्रों के निकट काम कर रही ऊर्जा उत्खनन कंपनियों के लिए कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक को पारंपरिक खनन माना जाए या नहीं, यह तय होने से कई रुकी हुई राष्ट्रीय परियोजनाओं का रास्ता साफ हो सकता है।\n• नागरिकों पर प्रभाव: घरेलू स्तर पर गैस और तेल उत्पादन बढ़ने से लंबी अवधि में ईंधन की कीमतों और उपलब्धता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सरकारी कंपनियों द्वारा पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का उपयोग करने से पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन का भरोसा बढ़ेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nऑयल इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि पर्यावरण मंत्रालय ने डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे ड्रिलिंग के लिए आवश्यक वन भूमि की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। कंपनी का कहना है कि यह निर्णय पिछली मंजूरियों और खनन प्रतिबंधों के गलत वर्गीकरण पर आधारित है।\n\n• वन मंजूरी का खारिज होना: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2 अगस्त 2024 को तिनसुकिया में 0.069 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। वन सलाहकार समिति की 4 जुलाई 2024 की बैठक में की गई नकारात्मक सिफारिशों के आधार पर यह निर्णय लिया गया था।\n• 2023 के खनन प्रतिबंध फैसले की व्याख्या: विवाद का मुख्य कारण सुप्रीम कोर्ट का 26 अप्रैल 2023 का वह फैसला है जिसने राष्ट्रीय उद्यानों और उनके एक किलोमीटर के दायरे में खनन पर पूर्ण रोक लगाई थी। विनियामक अधिकारियों ने इस प्रतिबंध को तेल व गैस उत्खनन पर भी लागू किया, जबकि कंपनी का तर्क है कि बाहर से की जाने वाली क्षैतिज ड्रिलिंग पारंपरिक खनन नहीं है।\n• अतीत की अनुमतियों का आधार: ऑयल इंडिया को वर्ष 2017 में इसी क्षेत्र के नीचे ड्रिलिंग के लिए शीर्ष अदालत से और मई 2020 में पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिल चुकी थी। इन पूर्व स्वीकृतियों के बावजूद हालिया वन मंजूरी खारिज होने से विधिक गतिरोध पैदा हुआ, जिसके चलते सार्वजनिक उपक्रम को नई याचिका दायर करनी पड़ी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ऑयल इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में क्या याचिका दायर की है?\nऑयल इंडिया ने असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग से हाइड्रोकार्बन निकालने के प्रस्ताव को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी है।\n\n2. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कौन सी पीठ कर रही है?\nइस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ कर रही है।\n\n3. कंपनी किस तकनीक से तेल और गैस निकालना चाहती है?\nकंपनी एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक का उपयोग कर राष्ट्रीय उद्यान के बाहर से 3,500 से 4,000 मीटर गहरी और फिर क्षैतिज खुदाई करके हाइड्रोकार्बन तक पहुंचेगी।\n\n4. इस क्षेत्र में देश के कितने हाइड्रोकार्बन भंडार मौजूद होने का अनुमान है?\nकंपनी के अनुसार डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान से सटे इस इलाके में भारत के कुल हाइड्रोकार्बन भंडार का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा मौजूद है।\n\n5. पर्यावरण मंत्रालय ने कंपनी के प्रस्ताव को कब खारिज किया था?\nपर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2 अगस्त 2024 को वन भूमि डायवर्जन के प्रस्ताव को खारिज करने का निर्णय लिया था।\n\n6. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?\nसुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के बाद निर्धारित की है।",
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  "publishedAt": "2026-11-03",
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