गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, जयमाला समेत नौ हाथियों के पुनर्वास पर विचार करेगी विशेष समिति गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई उच्चाधिकार प्राप्त समिति को असम के नौ हाथियों के पुनर्वास पर विचार करने का निर्देश दिया है। इनमें चर्चित हथिनी जयमाला भी शामिल है जो तमिलनाडु के मंदिरों में लंबे समय से रह रही है। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति को असम के नौ हाथियों के पुनर्वास के मामले पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश दिया है। यह कानूनी कार्यवाही असम सरकार की ओर से सितंबर 2022 में दायर की गई उस याचिका के सिलसिले में आगे बढ़ाई गई है, जिसमें तमिलनाडु के मंदिरों में रखे गए हाथियों की सुरक्षित वापसी की मांग की गई थी। इस पूरे प्रकरण में सबसे प्रमुख नाम जयमाला का है, जिसे जेयमल्याथा के नाम से भी जाना जाता है और जो पिछले कई वर्षों से अपने तय अनुबंध की अवधि पूरी होने के बावजूद तमिलनाडु में ही रोक कर रखी गई है। असम से तमिलनाडु भेजे गए थे हाथी मामले की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो इस हथिनी को साल 2011 में तीन साल के समझौते के तहत तमिलनाडु के श्रीविल्लिवपुथुर नाच्चियार थिरुकोविल मंदिर को पट्टे पर सौंपा गया था। हालांकि अनुबंध की मियाद समाप्त होने के बावजूद उसे असम वापस नहीं भेजा गया और वह मंदिर की देखरेख में ही बंदिशों के बीच जीवन बिताती रही। इस विवाद ने तब तूल पकड़ा जब सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों से कुछ वीडियो फुटेज सामने आए। इन वीडियो में कथित तौर पर महावतों द्वारा इस मूक प्राणी को प्रताड़ित किए जाने और उस पर लाठी-डंडों से वार करने के दृश्य दिखाई दिए, जिसके बाद पशु अधिकार संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। पेटा इंडिया की दखल और कानूनी लड़ाई इस पूरे मामले में पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स यानी पेटा इंडिया को एक पक्षकार के रूप में शामिल किया गया था। संगठन ने अदालत से यह गुहार लगाई थी कि इस हथिनी को किसी सुरक्षित अभयारण्य में भेजा जाए जहाँ वह भारी जंजीरों से मुक्त होकर अन्य हाथियों के साथ स्वतंत्र रूप से रह सके। हाईकोर्ट ने अपने हालिया आदेश में न केवल जयमाला बल्कि इसी तरह के अन्य आठ हाथियों के मामलों को भी उच्चाधिकार प्राप्त समिति के पास भेज दिया है। अदालत ने संज्ञान लिया कि इन सभी हाथियों को तमिलनाडु ले जाने के लिए जो अस्थायी स्थानांतरण अवधि तय की गई थी, वह बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की समिति और तमिलनाडु सरकार की भूमिका यह विशेष उच्चाधिकार प्राप्त समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई थी और इसके अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति दीपक वर्मा हैं। इस समिति का मुख्य दायित्व देश भर में बंदी बनाए गए हाथियों की स्थिति की समीक्षा करना है, जिसमें उनकी कानूनी मिल्कियत, एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण और उनके पुनर्वास जैसे संवेदनशील पहलू शामिल हैं। इसके साथ ही, अदालत ने तमिलनाडु सरकार को भी सख्त निर्देश दिए हैं कि वह उन सभी परिसरों की हर महीने नियमित रूप से जांच करे जहाँ इन नौ हाथियों को रखा गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अंतिम निर्णय आने से पहले किसी भी हाथी को उचित पोषण, स्वास्थ्य सुविधाएं या अन्य जरूरी चिकित्सा सहायता से वंचित पाया जाता है, तो उसे तुरंत जब्त करके पुनर्वासित किया जाए। चिकित्सकों की राय और सुरक्षा के खतरे न्यायालय ने सुनवाई के दौरान यह भी रेखांकित किया कि संबंधित मंदिर ने इस हथिनी को एक पूज्यनीय और सम्मानित प्राणी के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया, लेकिन उनका वास्तविक व्यवहार इस मूक पशु के कल्याण को सुनिश्चित करने के बजाय उसे केवल एक निर्जीव वस्तु की तरह ट्रीट करने जैसा प्रतीत होता है। अदालत ने समिति को यह भी पाबंद किया है कि वह पेटा इंडिया को इस पूरे मुद्दे पर अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दे। मार्च 2025 में देश भर से आए पचास से अधिक पशु चिकित्सकों ने इस हथिनी की दयनीय स्थिति को दर्शाने वाले वीडियो और दस्तावेजों की गहन समीक्षा के बाद इसके बचाव के समर्थन में अपने हस्ताक्षर युक्त राय असम और तमिलनाडु के संबंधित अधिकारियों को भेजी थी। पेटा इंडिया की पॉलिसी मामलों की उपाध्यक्ष खुशबू गुप्ता ने अदालत के इस रुख का स्वागत किया है और सभी नौ हाथियों के तत्काल पुनर्वास की पुरजोर मांग उठाई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक समय में जब पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों के लिए पारंपरिक जीवित वन्यजीवों के स्थान पर आधुनिक तकनीकी विकल्पों को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है, तब मंदिरों में जीवित हाथियों का इस प्रकार उपयोग करना पूरी तरह से अनावश्यक, खतरनाक और कालबाधित हो चुका है। संगठन का यह भी मानना रहा है कि मानसिक रूप से प्रताड़ित और तंग किए गए हाथी बेहद आक्रामक और अप्रत्याशित हो जाते हैं, जिससे न केवल उनके महावतों बल्कि आसपास मौजूद श्रद्धालुओं की जान को भी भारी खतरा पैदा हो जाता है। इसका आप पर असर यह न्यायिक आदेश देश भर के मंदिरों में बंदी बनाए गए वन्यजीवों की स्थिति और उनके कानूनी अधिकारों को लेकर एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। - भारत में: इस निर्णय से देश भर के विभिन्न धार्मिक संस्थानों और मंदिरों में रखे गए हाथियों के रखरखाव और उनकी कानूनी निगरानी सख्त होने की उम्मीद है। इससे अवैध रूप से तय अवधि से अधिक समय तक रोके गए पशुओं की वापसी का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। - असम और तमिलनाडु में: असम के उन परिवारों और अधिकारियों को राहत मिल सकती है जो अपने यहां के हाथियों की वापसी चाहते हैं, जबकि तमिलनाडु के संबंधित मंदिरों को अब हर महीने प्रशासनिक निरीक्षण का सामना करना होगा और पशु कल्याण मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा। - पशु सुरक्षा कार्यकर्ताओं के लिए: यह आदेश पेटा जैसे संगठनों के उस अभियान को मजबूत करता है जिसमें मंदिरों में जीवित वन्यजीवों के स्थान पर आधुनिक तकनीकी यांत्रिक विकल्पों को अपनाने की वकालत की जा रही है। - सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से: लंबे समय तक कैद और प्रताड़ना के कारण हिंसक हो चुके हाथियों के पुनर्वास से आसपास के श्रद्धालुओं और महावतों की सुरक्षा का जोखिम भी कम होगा। ऐसा क्यों हुआ यह पूरा कानूनी विवाद मंदिरों को पट्टे पर दिए गए वन्यजीवों के समय सीमा समाप्त होने के बावजूद वापस न लौटाए जाने और उनके साथ होने वाली कथित क्रूरता के कारण उत्पन्न हुआ। - पट्टे की अवधि का उल्लंघन: जयमाला और अन्य हाथियों को तय तीन साल की अवधि के लिए तमिलनाडु भेजा गया था, लेकिन अनुबंध खत्म होने के बाद भी उन्हें वापस असम नहीं भेजा गया। - कथित दुर्व्यवहार के वीडियो: हथिनी को नियंत्रित करने के लिए महावतों द्वारा प्रताड़ित किए जाने और नुकीले औजारों के इस्तेमाल के वीडियो सामने आने के बाद देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। - चिकित्सकीय और कानूनी दबाव: देश भर के दर्जनों पशु चिकित्सकों द्वारा हथिनी की स्थिति पर चिंता जताते हुए लिखित राय सौंपने और पेटा इंडिया द्वारा लगातार कानूनी पैरवी करने से मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा। - सुरक्षा चिंताएं: कैद में रहने वाले तनावग्रस्त हाथियों द्वारा महावतों और आम जनता पर बार-बार हमले किए जाने की घटनाओं ने प्रशासन को इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर किया। सवाल-जवाब 1. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने आदेश में किस समिति को निर्देश दिया है? हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति को नौ हाथियों के पुनर्वास पर विचार करने का निर्देश दिया है। 2. जयमाला हाथी को मूल रूप से किस राज्य से भेजा गया था? जयमाला को असम राज्य से तमिलनाडु के एक मंदिर में पट्टे पर भेजा गया था। 3. इस समिति के अध्यक्ष कौन हैं? यह उच्चाधिकार प्राप्त समिति सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की अध्यक्षता में गठित की गई है। 4. तमिलनाडु सरकार को अदालत की तरफ से क्या निर्देश मिले हैं? अदालत ने राज्य सरकार को उन परिसरों की हर महीने नियमित जांच करने को कहा है जहां इन हाथियों को रखा गया है। 5. पेटा इंडिया की इस मामले में क्या भूमिका रही है? पेटा इंडिया ने हथिनी के बचाव, चिकित्सा रिपोर्ट तैयार करने और उसे अभयारण्य में भेजने के लिए अदालत में पैरवी की है। https://trendkia.com/assam/gauhati-hc-directs-panel-to-consider-rehabilitation-of-joymala-and-8-other-assam-elephants-25227 TrendKia — Har trend, sabse pehle.