गुवाहाटी में आयोजित संगोष्ठियों में पूर्वोत्तर भारत की भू-राजनीतिक स्थिति और क्षेत्रीय संपर्क पर हुई चर्चा गुवाहाटी में चिंतन रिसर्च फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में पूर्वोत्तर भारत को एक सामरिक प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया गया। गुवाहाटी में हाल ही में संपन्न दो महत्वपूर्ण शैक्षणिक कार्यक्रमों में पूर्वोत्तर भारत के बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व और दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच इसकी रणनीतिक स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई। चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) द्वारा गिरिजानंद चौधरी यूनिवर्सिटी (GCU) और असम डाउनटाउन यूनिवर्सिटी (ADBU) के सहयोग से क्रमशः 4 और 5 नवंबर 2026 को इन आयोजनों की रूपरेखा तैयार की गई थी। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र को केवल एक पारगमन गलियारे के रूप में देखने के बजाय भारत की अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय कूटनीति में एक सक्रिय भागीदार के रूप में स्थापित करने पर था। बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत के बीच संवाद श्रृंखला के पहले कार्यक्रम के तहत 4 नवंबर को गिरिजानंद चौधरी यूनिवर्सिटी (GCU) के राजनीति विज्ञान विभाग और पूर्वोत्तर अध्ययन केंद्र द्वारा चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के साथ मिलकर "बांग्लादेश-पूर्वोत्तर भारत इंटरफेस: कनेक्टिविटी, बॉर्डरलैंड्स एंड जियोपॉलिटिक्स" विषय पर एक दिवसीय संवाद का आयोजन किया गया था। इस सत्र के दौरान मुख्य वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पूर्वोत्तर क्षेत्र को उसकी सीमाओं और सुरक्षा चुनौतियों से आगे बढ़कर आर्थिक एकीकरण के केंद्र के रूप में देखना चाहिए। चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने अपने विशेष संबोधन के दौरान बांग्लादेश के साथ निरंतर और धैर्यपूर्ण जुड़ाव की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने इसके लिए "वुडपेकर अप्रोच" का जिक्र करते हुए लगातार प्रयासों के महत्व को समझाया। वक्ताओं ने इस बात पर प्रकाश डाला कि बंदरगाहों, अंतर्देशीय जलमार्गों और सीमा पार नेटवर्क के माध्यम से बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत के लिए व्यापारिक रास्ते खोलने में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी के बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व और विभिन्न बाहरी शक्तियों के प्रभावों का भी आकलन किया गया। बदलाव के दौर में क्षेत्रीय और सीमावर्ती शासन अगले दिन 5 नवंबर को असम डाउनटाउन यूनिवर्सिटी (ADBU) के लोक प्रशासन विभाग के सहयोग से "इंडियाज नॉर्थईस्ट इन ए चेंजिंग जियोपॉलिटिकल ऑर्डर: कनेक्टिविटी, फ्रंटियर गवर्नेंस एंड रणनीतिक अपॉर्चुनिटीज" शीर्षक के तहत एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर यूनिवर्सिटी के कुलपति फादर (डॉ.) जोस पलेरी ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को केवल सुरक्षा के दायरे में न देखकर उन्हें आर्थिक अवसरों और सामाजिक मेलजोल का माध्यम मानने पर बल दिया। माधबदेव यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर अरूपज्योति चौधरी ने अपने मुख्य भाषण में पूर्वोत्तर भारत के ऐतिहासिक और प्रशासनिक पहलुओं की समीक्षा की। उन्होंने सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर समावेशी विकास और हाशिए पर मौजूद समुदायों के कल्याण की वकालत की। उन्होंने इसके लिए महात्मा गांधी के सर्वोदय और अंत्योदय के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए क्षेत्रीय शासन में सुधार लाने की बात कही। बुनियादी ढांचे और संपर्क मार्गों का विस्तार दोनों ही आयोजनों के दौरान बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और परिवहन लागत को कम करने के उपायों पर गहन चर्चा हुई। वक्ताओं ने अखौरा-अगरतला रेलवे लिंक, बांग्लादेश के बंदरगाहों तक पहुंच, अंतर्देशीय जलमार्गों और सड़क नेटवर्क की उपयोगिता पर विचार किया। इसके अलावा इंडिया-म्यांमार-थैलेड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट जैसी बड़ी क्षेत्रीय परियोजनाओं को जल्द पूरा करने की जरूरत बताई गई। सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए अगरतला-कोलकाता सड़क मार्ग जैसे वैकल्पिक रास्तों के विकास पर भी विचार-विमर्श किया गया। सीमा पार व्यापार को सुगम बनाने के लिए सरहद पर बुनियादी ढांचे को उन्नत करने, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल बनाने और संस्थागत समन्वय को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। भू-राजनीतिक चुनौतियां और क्षेत्रीय कूटनीति बैठकों में इस क्षेत्र को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक मुद्दों पर भी खुलकर बात हुई। चीन की बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति, यारलुंग त्सांगपो नदी से जुड़े जल सुरक्षा के चिंताजनक पहलू, सीमा पार से होने वाली मादक पदार्थों की तस्करी और म्यांमार तथा बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों की समीक्षा की गई। वक्ताओं ने भारत की एक्ट ईस्ट और नेबरहुड फर्स्ट नीतियों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इन पहलों का लाभ जमीनी स्तर पर स्थानीय समुदायों तक पहुंचना चाहिए। BIMSTEC जैसे क्षेत्रीय मंचों के जरिए आपसी सहयोग को और अधिक व्यापक बनाने की संभावनाओं पर भी बल दिया गया। स्थानीय अर्थव्यवस्था और समाज का सशक्तिकरण केवल भौतिक संपर्क तक सीमित न रहकर, चर्चाओं में पारंपरिक उद्योगों, स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक ज्ञान और उद्यमिता को बढ़ावा देने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। भूटान के साथ पारंपरिक रेशम और वस्त्र उत्पादन में सहयोग की संभावनाओं के साथ-साथ कृषि, पर्यटन और स्थानीय उद्यमों के विकास के रास्तों पर बात की गई। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने, युवाओं को सशक्त करने और संघर्ष प्रभावित सीमाई क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपाय सुझाए गए। दोनों ही कार्यक्रमों में एक बात समान रूप से उभर कर सामने आई कि पूर्वोत्तर भारत के भविष्य को संवारने में वहां के स्थानीय लोगों और राज्यों की सक्रिय भागीदारी सबसे ज्यादा जरूरी है। सवाल-जवाब 1. गुवाहाटी में ये संगोष्ठियां किसने आयोजित की थीं? इन कार्यक्रमों का आयोजन चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) द्वारा गिरिजानंद चौधरी यूनिवर्सिटी और असम डाउनटाउन यूनिवर्सिटी के सहयोग से किया गया था। 2. इन अकादमिक कार्यक्रमों का आयोजन कब किया गया था? ये कार्यक्रम क्रमशः 4 और 5 नवंबर 2026 को आयोजित किए गए थे। 3. 4 नवंबर को आयोजित संगोष्ठी का मुख्य विषय क्या था? इस कार्यक्रम का विषय "बांग्लादेश-पूर्वोत्तर भारत इंटरफेस: कनेक्टिविटी, बॉर्डरलैंड्स एंड जियोपॉलिटिक्स" था। 4. 5 नवंबर को राष्ट्रीय संगोष्ठी किस विषय पर आधारित थी? इस संगोष्ठी का शीर्षक "इंडियाज नॉर्थईस्ट इन a चेंजिंग जियोपॉलिटिकल ऑर्डर: कनेक्टिविटी, फ्रंटियर गवर्नेंस एंड स्ट्रैटेजिक अपॉर्चुनिटीज" था। 5. बैठकों के दौरान सिलीगुड़ी कॉरिडोर के विकल्प के रूप में किस मार्ग पर चर्चा हुई? सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता घटाने के लिए अगरतला-कोलकाता सड़क मार्ग जैसे वैकल्पिक रास्तों पर विचार-विमर्श किया गया। https://trendkia.com/assam/northeast-india-s-strategic-role-in-regional-connectivity-geopolitics-discussed-at-seminars-in-guwahati-57496 TrendKia — Har trend, sabse pehle.