पॉलीएंड्रोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम को पहचानें: पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी की महिलाओं से अपील पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम का नाम बदलकर पॉलीएंड्रोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कर दिया गया है। पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी ने सितंबर महीने में जागरूकता बढ़ाने और महिलाओं को समय पर चिकित्सा सलाह लेने की सलाह दी है। प्रजनन आयु की महिलाओं को प्रभावित करने वाली एक आम अंतःस्रावी स्थिति, जिसे पहले पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) के रूप में जाना जाता था, अब आधिकारिक तौर पर पॉलीएंड्रोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) के रूप में पहचानी जा रही है। इसके बावजूद समाज में एक बड़ा वर्ग इस स्वास्थ्य समस्या से अनजान रहता है और समय पर इसकी पहचान नहीं हो पाती है। मई 2026 में संपन्न हुई एक वैश्विक आम सहमति प्रक्रिया के बाद इस नाम को बदला गया है ताकि इसके अंतःस्रावी, चयापचय और डिम्बग्रंथि पहलुओं के साथ-साथ स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों को भी पूरी तरह से दर्शाया जा सके। सितंबर जागरूकता माह और गुवाहाटी में अभियान प्रत्येक वर्ष सितंबर महीने को PCOS/PMOS जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी इस बात पर विशेष जोर दे रहा है कि इस बीमारी को केवल अनियमित माहवारी या बांझपन तक सीमित न समझा जाए। अस्पताल महिलाओं को यह प्रोत्साहित कर रहा है कि यदि उनके लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं, तो वे किसी योग्य चिकित्सक से पेशेवर सलाह जरूर लें। नए अंतरराष्ट्रीय PMOS दिशानिर्देशों के अनुसार, यह स्थिति प्रजनन आयु की लगभग हर आठवीं महिला को प्रभावित करती है, जिसका मतलब है कि दुनिया भर में 17 करोड़ से अधिक महिलाएं इससे प्रभावित हैं। इसके अलावा, इस स्थिति से जूझने वाली लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं की समय पर पहचान नहीं हो पाती है और वे बिना निदान के ही जीवन जीती रहती हैं। नाम बदलने के पीछे का वैश्विक कारण और विज्ञान यह नया नामकरण दुनिया भर के स्वास्थ्य पेशेवरों, मरीज संगठनों और इस स्थिति का सामना कर चुके लोगों के साथ लंबी चर्चाओं के बाद तय किया गया है। मई 2026 के इस अपडेट ने केवल शब्दावली और बीमारी के नजरिए को बदला है, जबकि अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों के क्लिनिकल सुझाव और सामग्री बिल्कुल वही हैं। साल 2028 में आने वाले अगले अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश में PMOS को मानक शब्दावली के रूप में पूरी तरह से शामिल कर लिया जाएगा। दशकों के वैज्ञानिक शोध से यह बात सामने आई थी कि यह बीमारी केवल अंडाशय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करती है। 'पॉलीसिस्टिक ओवरी' शब्द अक्सर भ्रम पैदा करता है क्योंकि इस स्थिति में दिखाई देने वाले अंडाशय के लक्षण वास्तव में रोग संबंधी सिस्ट के बजाय फॉलिक्युलर विकास के रुकने को दर्शाते हैं। पुराना नाम केवल प्रजनन क्षमता पर केंद्रित था, जिसके कारण चयापचय, हृदय संबंधी, त्वचा संबंधी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाता था। इसी वजह से निदान में देरी होती थी और महिलाओं को अलग-थलग देखभाल मिलती थी। लक्षणों की विविधता और विशेषज्ञों की राय डॉ. इशिता दास, कंसलटेंट गायनेकोलॉजिस्ट, पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी ने इस बदलाव के महत्व को समझाते हुए कहा कि यह नया नाम आज के समय में बीमारी की वास्तविक समझ को बेहतर ढंग से प्रदर्शित करता है। यह केवल अनियमित माहवारी की समस्या नहीं है और न ही इसका संबंध केवल बांझपन या अधिक वजन से है। यह एक जटिल अंतःस्रावी और चयापचय स्थिति है जिसके लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ महिलाओं को मुख्य रूप से माहवारी में अनियमितता का सामना करना पड़ सकता है, जबकि अन्य में मुंहासे, चेहरे या शरीर पर अत्यधिक बाल उगना, बालों का झड़ना या गर्भधारण करने में कठिनाई जैसी परेशानियां दिख सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो महिलाएं दुबली-पतली हैं या जिनका वजन सामान्य है, वे भी इस स्थिति का शिकार हो सकती हैं। इसलिए किसी एक लक्षण या वजन के आधार पर राय बनाने के बजाय सभी लक्षणों का समग्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए। निदान के तरीके और अल्ट्रासाउंड से जुड़े भ्रम डॉ. दास ने इस बात पर भी जोर दिया कि बीमारी की पहचान केवल एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर नहीं बल्कि उचित क्लिनिकल मूल्यांकन के आधार पर होनी चाहिए। एक आम गलतफहमी यह है कि अल्ट्रासाउंड में कई छोटे फॉलिकल्स देखने का मतलब अपने आप में यह है कि महिला को यह बीमारी है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है। वयस्कों में निदान के लिए ओव्यूलेटरी डिसफंक्शन और हाइपरएंड्रोजनम के क्लिनिकल या बायोकेमिकल लक्षणों का आकलन किया जाता है, जिसमें अल्ट्रासाउंड पर ओवेरियन मॉर्फोलॉजी या एएमएच (AMH) को एक घटक के रूप में उपयोग किया जाता है। अन्य बीमारियों को भी अलग करना जरूरी है जो समान लक्षण पैदा कर सकती हैं। यही कारण है कि केवल अल्ट्रासाउंड, अनियमित माहवारी या इंटरनेट की जानकारी के आधार पर खुद बीमारी का अंदाजा लगाना भ्रामक साबित हो सकता है। प्रजनन स्वास्थ्य से आगे शरीर पर अन्य प्रभाव इस बीमारी के प्रभाव केवल प्रजनन स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं रहते हैं, बल्कि यह शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित करते हैं। इससे पीड़ित महिलाओं में ग्लूकोज सहनशीलता में कमी और टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के असंतुलन जैसे हृदय संबंधी जोखिमों पर भी ध्यान देना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही इस समस्या को नींद संबंधी विकारों और मानसिक चिंताओं जैसे कि चिंता, डिप्रेशन, ईटिंग डिसऑर्डर और नकारात्मक शारीरिक छवि से भी जोड़ा गया है। डॉ. दास ने बताया कि जागरूकता महीने के दौरान सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि इसका प्रबंधन केवल माहवारी को नियमित करना या गर्भावस्था चाहने पर प्रजनन क्षमता का इलाज करना नहीं है, बल्कि महिला के चयापचय, हृदय, मानसिक और समग्र स्वास्थ्य का खयाल रखना भी है। जीवनशैली और दीर्घकालिक स्वास्थ्य योजना वर्तमान दिशानिर्देशों के अनुसार, उम्र या बीएमआई (BMI) की परवाह किए बिना इस स्थिति से पीड़ित महिलाओं में ग्लाइसेमिक स्थिति और हृदय संबंधी जोखिमों का आकलन करने की सिफारिश की जाती है। हालांकि इस बीमारी का कोई एक पक्का इलाज नहीं है, लेकिन इसे जीवनशैली के उपायों और चिकित्सा उपचार के माध्यम से प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। इसमें कोई एक फॉर्मूला सभी महिलाओं के लिए काम नहीं करता है। पौष्टिक भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और वजन को अनियंत्रित बढ़ने से रोकना लंबी देखभाल का अहम हिस्सा है, लेकिन इसे केवल वजन घटाने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। व्यक्तिगत जरूरतों के आधार पर मासिक धर्म की अनियमितता, हाइपरएंड्रोजेनिक लक्षणों या चयापचय संबंधी चिंताओं के लिए चिकित्सा उपचार की आवश्यकता हो सकती है। इसका उद्देश्य केवल एक लक्षण का इलाज करना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक स्वास्थ्य योजना तैयार करना है। गर्भावस्था और मातृत्व से जुड़े भ्रम डॉ. दास ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निदान का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि महिला कभी मां नहीं बन सकती। यह ओव्यूलेटरी बांझपन के मुख्य कारणों में से एक है, लेकिन बांझपन होना अनिवार्य नहीं है। इस स्थिति से जूझने वाली कई महिलाएं स्वाभाविक रूप से गर्भ धारण करती हैं, जबकि कुछ को डिम्बग्रंथि को फिर से सक्रिय करने के लिए चिकित्सा सहायता की आवश्यकता हो सकती है। समय पर डॉक्टर की सलाह लेने से गर्भधारण में आने वाली कठिनाई के असली कारणों का पता लगाने में मदद मिलती है। इसलिए महिलाओं को यह मानकर नहीं बैठना चाहिए कि वे कभी मां नहीं बन पाएंगी। पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. प्रणब बरुआ ने भी इस बात पर जोर दिया कि समय पर स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और जागरूकता निवारक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। डॉ. बरुआ ने कहा कि यह स्थिति महिलाओं के जीवन के विभिन्न चरणों को प्रभावित कर सकती है, इसलिए जागरूकता बढ़ाने से महिलाओं को अपने लक्षणों को सामान्य मानकर बैठने के बजाय मदद मांगने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। नाम बदलने का यह वैश्विक अपडेट इस बात को पुख्ता करता है कि इस स्वास्थ्य स्थिति को इसके पूर्ण क्लिनिकल संदर्भ में समझना कितना जरूरी है। अस्पताल हमेशा से मरीजों को सूचित, संवेदनशील और व्यापक देखभाल प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। अस्पताल की ओर से महिलाओं को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी तरह की इंटरनेट की अनवेरिफाइड जानकारी या खुद से निदान करने के बजाय योग्य पेशेवर से संपर्क करें। असम के मुख्यमंत्री ने दिल्ली में भूपेन हजारिका शताब्दी के समापन समारोह की व्यवस्थाओं की समीक्षा की है, जो राज्य में अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों को भी दर्शाता है। मई 2026 का यह अपडेट केवल नाम में बदलाव का प्रतीक है, और इसके मूल्यांकन व प्रबंधन के मौजूदा दिशानिर्देशों में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। इसका आप पर असर पॉलीएंड्रोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) के बारे में बढ़ती जागरूकता महिलाओं को शुरुआती लक्षणों की पहचान करने और समय पर डॉक्टर से मिलने के लिए प्रेरित करती है। • भारत में: प्रजनन आयु की हर आठवीं महिला इस स्थिति से प्रभावित है, जिससे शुरुआती जांच और जीवनशैली में सुधार से मधुमेह और हृदय रोगों के खतरे को समय रहते रोका जा सकता है। • गुवाहाटी में: पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी के माध्यम से स्थानीय महिलाओं को अनवेरिफाइड ऑनलाइन सलाह से बचने और योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञों से पेशेवर परामर्श लेने की सुविधा मिलती है। • स्वास्थ्य जांच: महिलाओं को केवल अनियमित माहवारी पर ध्यान देने के बजाय अपने चयापचय, हार्मोनल और मानसिक स्वास्थ्य का व्यापक क्लिनिकल मूल्यांकन करवाना चाहिए। • प्रजनन संबंधी प्रभाव: इस निदान का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि महिला मां नहीं बन सकती, क्योंकि समय पर चिकित्सा मदद से स्वाभाविक या चिकित्सकीय रूप से गर्भधारण संभव है। ऐसा क्यों हुआ इस स्थिति के नाम में बदलाव दशकों के वैज्ञानिक शोध और वैश्विक आम सहमति के बाद किया गया है ताकि इसके व्यापक प्रभावों को दर्शाया जा सके। • वैज्ञानिक कारण: पुराना नाम 'पॉलीसिस्टिक ओवरी' भ्रामक था क्योंकि यह केवल अंडाशय पर आधारित था, जबकि यह एक जटिल अंतःस्रावी और चयापचय संबंधी विकार है। • वैश्विक आम सहमति: मई 2026 में संपन्न हुए व्यापक बहु-चरणीय वैश्विक परामर्श में स्वास्थ्य पेशेवरों, रोगी संगठनों और विशेषज्ञों ने मिलकर इस नए नाम को अंतिम रूप दिया। • निदान में देरी: पहले केवल प्रजनन पर ध्यान देने से चयापचय, हृदय और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े लक्षण छिप जाते थे, जिससे बीमारी की सही पहचान में देरी होती थी। सवाल-जवाब 1. PCOS का नया नाम क्या कर दिया गया है? मई 2026 के वैश्विक आम सहमति के बाद इसका नया नाम पॉलीएंड्रोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कर दिया गया है। 2. PMOS दुनिया भर में कितनी महिलाओं को प्रभावित करता है? यह स्थिति प्रजनन आयु की लगभग हर आठवीं महिला को प्रभावित करती है, जिसका मतलब दुनिया भर में 17 करोड़ से अधिक महिलाएं हैं। 3. क्या PMOS से पीड़ित महिला कभी मां नहीं बन सकती? नहीं, यह ओव्यूलेटरी बांझपन का मुख्य कारण जरूर है लेकिन बांझपन अनिवार्य नहीं है, और कई महिलाएं स्वाभाविक या चिकित्सा मदद से गर्भधारण करती हैं। 4. क्या केवल अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट से PMOS का निदान हो सकता है? नहीं, केवल अल्ट्रासाउंड में फॉलिकल्स दिखने से स्वतः निदान नहीं होता है, इसके लिए क्लिनिकल मूल्यांकन और अन्य लक्षणों की जांच जरूरी है। 5. पियरलेस हॉस्पिटल गुवाहाटी किस बात पर जोर दे रहा है? अस्पताल महिलाओं को persistent लक्षणों को नजरअंदाज न करने और इंटरनेट की अनवेरिफाइड जानकारी के बजाय पेशेवर चिकित्सा सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। https://trendkia.com/assam/peerless-hospital-guwahati-urges-women-to-recognise-signs-of-polyendocrine-metabolic-ovarian-syndrome-39817 TrendKia — Har trend, sabse pehle.