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  "title": "वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के 83वें संस्करण में असम की फिल्म निर्माता डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ को मिली नेटपैक जूरी में जगह",
  "summary": "राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता असमिया फिल्म निर्माता डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ 83वें वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में नेटपैक जूरी सदस्य चुनी गई हैं, जहां वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सिनेमा का मूल्यांकन करेंगी।",
  "content": "असम की प्रख्यात फिल्म निर्माता, शोधकर्ता और पटकथा लेखक डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ को 83वें वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में नेटपैक (नेटवर्क फॉर द प्रमोशन ऑफ एशियन सिनेमा) जूरी के सदस्य के रूप में चुना गया है। यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच दुनिया भर के प्रतिष्ठित फिल्म निर्माताओं और आलोचकों को एक साथ लाता है। इस नियुक्ति के साथ वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सिनेमाई कृतियों का मूल्यांकन करने वाले एक तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय पैनल का हिस्सा बन गई हैं।\n\nतीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय जूरी का ढांचा\nवेनिस फिल्म महोत्सव में इस बार नेटपैक जूरी के लिए गठित तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय समिति में डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ के अलावा दो अन्य प्रमुख हस्तियों को शामिल किया गया है। इनमें क्यूसिनेमा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के कलात्मक निदेशक एड लेजानो और एशियन वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल की सह-संस्थापक तथा प्रबंध निदेशक असेल शेर्नियाज़ोवा शामिल हैं। यह पैनल महोत्सव में प्रदर्शित होने वाली एशिया-प्रशांत क्षेत्र की उत्कृष्ट फिल्मों का अध्ययन और मूल्यांकन करेगा।\n\nनेटपैक संगठन की स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी। यह एक अंतरराष्ट्रीय निकाय है जिसका मुख्य उद्देश्य एशियाई तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सिनेमा की पहचान करना, उसे वैश्विक मंचों पर मान्यता दिलाना और उसका संवर्धन करना है। तीन दशक से अधिक समय से यह संस्था नई प्रतिभाओं और अनूठी कहानियों को दुनिया के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।\n\nवेनिस से बॉबी शर्मा बरुआ का वक्तव्य\nइस प्रतिष्ठित जूरी में शामिल होने के अवसर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बॉबी शर्मा बरुआ ने वेनिस से अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने इस जिम्मेदारी को एक बड़ा सम्मान और सिनेमाई दृष्टिकोण से एक बेहद समृद्ध अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि इससे उन्हें एशिया के विभिन्न देशों, विविध संस्कृतियों और अलग-अलग सिनेमाई परंपराओं से आने वाली फिल्मों को करीब से देखने और समझने का मौका मिला है।\n\nबरुआ ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, \"मैं साथी जूरी सदस्यों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने और महत्वपूर्ण एशियाई सिनेमा को पहचान दिलाने में योगदान देने के लिए उत्सुक हूं।\" जूरी प्रक्रिया के दौरान तीनों सदस्य चयनित फिल्मों के कलात्मक, विषयगत और सांस्कृतिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा और समीक्षा करेंगे।\n\nराष्ट्रीय पुरस्कार और उल्लेखनीय फिल्में\nअसम से ताल्लुक रखने वाली डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ भारतीय सिनेमा परिदृश्य में एक स्थापित नाम हैं। वह सामाजिक सच्चाइयों और अनूठी क्षेत्रीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्मों के निर्माण के लिए जानी जाती हैं। उनकी सिनेमाई कृतियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया है।\n\nउनकी बहुचर्चित फिल्मों 'अदम्य', 'सोनार बरन पाखी', 'मिशिंग' और 'शिकाइसल' ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में रजत कमल (सिल्वर लोटस) सम्मान हासिल किया है। इसके अतिरिक्त, उनकी हालिया निर्मित फिल्म 'रादोर पाखी' को भारत के 55वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFI) के प्रतिष्ठित इंडियन पैनोरमा सेक्शन में प्रदर्शित किया गया था। वह एक कुशल निर्देशक होने के साथ-साथ एक प्रतिबद्ध फिल्म शोधकर्ता भी हैं।\n\nव्यापक जूरी अनुभव और वेनिस महोत्सव का इतिहास\nयह पहला मौका नहीं है जब बरुआ किसी प्रतिष्ठित फिल्म जूरी का हिस्सा बनी हैं। इससे पहले वह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, IFFI, दक्षिण कोरिया के जेओन्जू अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (MIFF) और केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFK) सहित कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जूरी सदस्य के रूप में सेवाएं दे चुकी हैं। इसके अलावा वह लंबे समय से नेटपैक संस्था की सक्रिय सदस्य भी हैं।\n\nवेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की बात करें तो इसकी स्थापना वर्ष 1932 में हुई थी। यह विश्व का सबसे पुराना फिल्म महोत्सव है और आज भी अंतरराष्ट्रीय सिनेमा परिदृश्य पर इसका व्यापक प्रभाव बना हुआ है। हर साल आयोजित होने वाला यह महोत्सव दुनिया भर से शीर्ष फिल्म निर्माताओं, अभिनेताओं, आलोचकों और सिनेमा विशेषज्ञों का जमावड़ा बनता है। ऐसे ऐतिहासिक मंच पर असम की एक फिल्म निर्माता की उपस्थिति पूर्वोत्तर भारत के सिनेमा के लिए एक गौरवपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।\n\nइसका आप पर असर\nअसम की फिल्म निर्माता डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ का वेनिस फिल्म महोत्सव की जूरी में चयन होना भारतीय और पूर्वोत्तर सिनेमा के लिए एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता है।\n\n• भारत में: यह उपलब्धि देश के स्वतंत्र और क्षेत्रीय फिल्म निर्माताओं के लिए नए वैश्विक दरवाजे खोलती है। इससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय कहानियों को बेहतर प्रतिनिधित्व और दृश्यता मिलेगी।\n• असम में: पूर्वोत्तर भारत के युवा फिल्म निर्माताओं के लिए यह बेहद प्रेरणादायक कदम है। स्थानीय लोक कहानियों और सांस्कृतिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों को वैश्विक वितरकों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह नियुक्ति नेटपैक द्वारा एशियाई सिनेमा को बढ़ावा देने के प्रयासों और डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ के सिनेमाई शोध तथा राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता रिकॉर्ड के कारण हुई है।\n\n• सिनेमाई योगदान: बॉबी शर्मा बरुआ ने 'अदम्य' और 'सोनार बरन पाखी' जैसी फिल्मों के माध्यम से सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर प्रस्तुत किया है।\n• व्यापक अनुभव: वह पहले भी IFFI, IFFK और जेओन्जू जैसे प्रतिष्ठित महोत्सवों में जूरी सदस्य के रूप में अपनी क्षमता साबित कर चुकी हैं।\n• नेटपैक का उद्देश्य: वर्ष 1990 में स्थापित नेटपैक संस्था एशिया-प्रशांत क्षेत्र की बेहतरीन फिल्मों को पहचानने के लिए अनुभवी एशियाई फिल्म विशेषज्ञों को जूरी में शामिल करती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डॉ. बॉबी शर्मा बरुआ कौन हैं?\nवह असम की एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक और फिल्म शोधकर्ता हैं।\n\n2. 83वें वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में उनकी क्या भूमिका होगी?\nवह वेनिस फिल्म महोत्सव में एशिया-प्रशांत क्षेत्र की फिल्मों का मूल्यांकन करने वाली तीन सदस्यीय नेटपैक जूरी की सदस्य के रूप में कार्य करेंगी।\n\n3. नेटपैक जूरी में उनके अलावा कौन-कौन शामिल हैं?\nजूरी में क्यूसिनेमा के कलात्मक निदेशक एड लेजानो और एशियन वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल की सह-संस्थापक असेल शेर्नियाज़ोवा शामिल हैं।\n\n4. बॉबी शर्मा बरुआ की कौन सी फिल्मों ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते हैं?\nउनकी बहुचर्चित फिल्मों 'अदम्य', 'सोनार बरन पाखी', 'मिशिंग' और 'शिकाइसल' ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में रजत कमल सम्मान जीता है।\n\n5. नेटपैक की स्थापना कब हुई थी?\nनेटपैक (Network for the Promotion of Asian Cinema) की स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी।\n\nप्रेरणा और सबक\nडॉ. बॉबी शर्मा बरुआ की यह उपलब्धि साबित करती है कि क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी सच्ची कहानियां वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकती हैं।\n\n• अपनी जड़ों से जुड़े रहें: सफलता पाने के लिए अपनी स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परिवेश पर आधारित कहानियां बनाएं, क्योंकि मौलिकता ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभाव छोड़ती है।\n• अध्ययन और शोध पर बल दें: केवल निर्देशन ही नहीं, बल्कि सिनेमाई शोध और पटकथा लेखन में महारत हासिल करके अपने काम को गहराई दें।\n• निरंतरता बनाए रखें: छोटी शुरुआत करके लगातार उत्कृष्ट कृतियों का निर्माण करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलना तय है।",
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  "category": "असम",
  "publishedAt": "2026-09-12",
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