भाद्रपद अष्टमी पर राधा जन्मोत्सव का पावन पर्व, जानें मध्याह्न पूजन समय और विशेष अनुष्ठान राधाष्टमी 19 सितंबर को श्रद्धापूर्वक मनाई जा रही है। मध्याह्न काल में पूजन का विशेष समय सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:28 बजे तक रहेगा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर राधा रानी का जन्मोत्सव पूरे भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है। श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और प्रेम का साक्षात स्वरूप मानी जाने वाली श्री राधा के प्राकट्य दिवस का आध्यात्मिक परंपरा में अत्यंत ऊंचा स्थान है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर, विशेष मध्याह्न काल में पूजन-अर्चन कर और भजन-कीर्तन गाकर अपने जीवन में शांति, सुख और भक्ति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राधा रानी की उपासना के बिना श्रीकृष्ण की आराधना अधूरी मानी जाती है। यही कारण है कि इस तिथि पर मथुरा, वृंदावन और विशेषकर बरसाना समेत देशभर के मंदिरों और घरों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। मध्याह्न पूजा का शुभ समय और अष्टमी तिथि की अवधि धार्मिक परंपराओं में राधा रानी के पूजन के लिए दोपहर यानी मध्याह्न काल को सर्वाधिक उपयुक्त और फलदायी माना जाता है। दिल्ली के पंचांग के अनुसार 19 सितंबर को राधाष्टमी पूजन का श्रेष्ठ समय सुबह 11:01 बजे से लेकर दोपहर 1:28 बजे तक बना रहेगा। भौगोलिक स्थिति और स्थानीय सूर्योदय के अनुसार अलग-अलग शहरों में इस मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर देखने को मिल सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय का मिलान करना उपयुक्त रहता है। तिथि गणना की बात करें तो भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि का प्रारंभ 18 सितंबर को दोपहर लगभग 1:00 बजे हुआ था, जबकि इस तिथि का समापन 19 सितंबर को दोपहर लगभग 3:26 बजे होगा। चूंकि शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार राधा जन्मोत्सव का पूजन मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी में करने का विधान है, इसलिए 19 सितंबर को ही मुख्य व्रत और अनुष्ठान संपन्न किए जा रहे हैं। पूजन की आवश्यक पूर्व तैयारी और सामग्री राधाष्टमी के पावन पर्व पर पूजन आरंभ करने से पहले घर के मंदिर और पूजा कक्ष को भली-भांति स्वच्छ कर लेना चाहिए। पूजन में किसी प्रकार का व्यवधान न आए, इसके लिए आवश्यक सामग्री पहले ही एक स्थान पर एकत्र कर लें। पूजा के लिए एक सुंदर लकड़ी की चौकी, नया पीला या लाल वस्त्र, राधा-कृष्ण की संयुक्त युगल प्रतिमा अथवा सुंदर चित्र, ताजे सुगंधित पुष्प, पुष्पमाला, धूप बत्ती, गाय के घी का दीपक, गंध, चंदन, अक्षत, रोली, पंचामृत और शुद्ध गंगाजल का प्रबंध करें। इसके साथ ही भोग के लिए सात्विक मिष्ठान और ताजे मौसमी फल तैयार रखें। पहले से की गई सुव्यवस्थित तैयारी से मन एकाग्र रहता है और पूजा पूरे शांत भाव से संपन्न होती है। शास्त्रसम्मत पूजन विधि और अर्चन क्रम राधाष्टमी के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक नित्यकर्मों से निवृत्त हों और स्नान करें। इसके पश्चात स्वच्छ और शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूजा घर की अच्छी तरह सफाई करने के बाद एक पाटे अथवा चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं और उस पर राधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें। सबसे पहले पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें, आचमन करें और राधा रानी का ध्यान करते हुए पूरे दिन के व्रत एवं पूजा का संकल्प लें। संकल्प के उपरांत दीपक प्रज्वलित करें। यदि घर में धातु अथवा पाषाण की उपयुक्त प्रतिमा स्थापित है, तो उसका विधिपूर्वक पंचामृत यानी दूध, दही, घी, शहद और शर्करा के मिश्रण से अभिषेक करें। पंचामृत स्नान के पश्चात शुद्ध जल या गंगाजल से स्नान कराएं। तत्पश्चात प्रतिमा को कोमल वस्त्र से पोंछकर सुंदर नवीन वस्त्र और आभूषण पहनाएं। यदि प्रतिमा अत्यंत छोटी है अथवा ऐसी सामग्री की बनी है जिसका अभिषेक संभव नहीं है, तो केवल जल के छींटे देकर प्रतीकात्मक स्नान कराएं और चंदन, अक्षत, धूप तथा ताजे फूलों की माला अर्पित करें। श्रृंगार और अर्चन के बाद राधा रानी को प्रिय भोग अर्पित करें। पूजा के दौरान निरंतर 'राधे-राधे' अथवा 'राधा-कृष्ण' के दिव्य नाम का मन ही मन या सस्वर जप करते रहें। भक्तजन इस अवसर पर राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र, राधा चालीसा अथवा राधा-कृष्ण के भक्तिमय भजनों का पाठ कर सकते हैं। अंत में धूप और कपूर से युगल सरकार की प्रेमपूर्वक आरती उतारें और परिवार के कल्याण, आपसी सौहार्द तथा भक्ति की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। राधा रानी का प्रिय भोग और प्रसाद वितरण राधा जन्मोत्सव के अवसर पर अर्पित किया जाने वाला भोग पूर्णतः सात्विक, पवित्र और ताजे अवयवों से तैयार होना चाहिए। ब्रज की धार्मिक परंपरा में राधा-कृष्ण को दुग्ध उत्पादों से बने व्यंजन अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। इस दिन भोग की थाली में शुद्ध दूध, दही, ताजा मक्खन और मिश्री, मखाने या चावल की खीर तथा ताजे फल प्रमुखता से शामिल किए जाते हैं। भक्तजन अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार घर पर रबड़ी, मालपुआ या अन्य पारंपरिक मिठाइयां भी तैयार कर सकते हैं। भोग बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि रसोई पूरी तरह शुद्ध हो और भोजन केवल ताजी सामग्री से ही बने। अर्पित करने के बाद इस नैवेद्य को परिवार के सभी सदस्यों और उपस्थित श्रद्धालुओं में चरणामृत व प्रसाद के रूप में वितरित करें। भोग और प्रसाद तैयार करते समय मात्रा का विशेष ध्यान रखें, ताकि अन्न का अनादर न हो और किसी भी रूप में प्रसाद व्यर्थ न बहे। व्रत के नियम और आत्मिक साधना राधाष्टमी का उपवास रखने की परंपरा हर परिवार और संप्रदाय में अलग-अलग स्वरूपों में पाई जाती है। कुछ साधक इस पावन दिन पर पूर्णतः निर्जला व्रत का पालन करते हैं, जिसमें दिनभर जल का भी त्याग किया जाता है। वहीं अधिकांश भक्त फलाहार के साथ उपवास रखते हैं, जिसमें वे दूध, फल और साबूदाना या कूटू जैसी फलाहारी सामग्री ग्रहण करते हैं। कुछ लोग शाम की पूजा और आरती के उपरांत एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत का समापन करते हैं। हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक क्षमता, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार ही व्रत का स्वरूप चुनना चाहिए। पर्व पर किए जाने वाले पुण्य कर्म और धार्मिक उपाय राधाष्टमी केवल कर्मकांड तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण और परोपकार को आत्मसात करने का दिन है। इस पावन अवसर पर कुछ विशेष आध्यात्मिक उपाय जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं • सुगंधित पुष्प अर्पण: पूजा के समय राधा रानी के चरणों में ताजे और सुगंधित पुष्प अर्पित करें। ताजे फूल शुद्ध भक्ति, आदर और समर्पण की गहरी भावना के प्रतीक हैं। • नाम संकीर्तन: दिन में कुछ समय एकांत में बैठकर शांत चित्त से 'राधे-राधे' महामंत्र का जप करें। यह मानसिक तनाव को दूर कर मन में असीम शांति भरता है। • अन्न एवं वस्त्र दान: अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार निर्धन और जरूरतमंद व्यक्तियों को भोजन, मौसमी फल या वस्त्र दान करें। सनातन परंपरा में किसी भी व्रत का पूर्ण फल दीन-दुखियों की सेवा से ही सिद्ध होता है। • कथा श्रवण व कीर्तन: सायंकाल परिवार के सभी सदस्यों के साथ एकत्र होकर राधा-कृष्ण की पावन लीलाओं की कथा का पठन करें अथवा सामूहिक संकीर्तन का आयोजन करें। • पारिवारिक सद्भाव का संकल्प: राधाष्टमी निस्वार्थ प्रेम का पर्व है, इसलिए इस दिन बड़ों के प्रति आदर, छोटों के प्रति स्नेह और आपसी रिश्तों में मधुरता बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए। ब्रज क्षेत्र में राधा जन्मोत्सव की अनूठी छटा ब्रजभूमि में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी का उल्लास देखते ही बनता है। बरसाना, जो राधा रानी का पैतृक निवास माना जाता है, वहां के लाड़िली जी मंदिर में जन्मोत्सव की छटा अत्यंत भव्य होती है। इसी प्रकार वृंदावन, नंदगांव और मथुरा के मंदिरों में भी विशेष साज-सज्जा, पंचामृत अभिषेक और बधाई गायन के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु युगल सरकार के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ब्रज के पावन धामों में पहुंचते हैं। पूजन में ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें राधाष्टमी के अनुष्ठान के दौरान कुछ मूलभूत बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। पूजा स्थल पर किसी भी प्रकार की अशुद्धि न रहने दें। विग्रह या चित्र को अत्यंत आदर के साथ चौकी पर विराजमान करें। पूजा में उपयोग की जाने वाली धूप, दीप और भोग सामग्री की गुणवत्ता शुद्ध होनी चाहिए। व्रत रखते समय शरीर पर अत्यधिक दबाव न डालें और हृदय में मात्र दिखावे के बजाय सच्ची भक्ति, सेवा भाव और उदारता को स्थान दें। इसका आप पर असर राधाष्टमी पर घर और मंदिरों में पूजा-अर्चना के साथ पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर दान-पुण्य के आयोजन होते हैं। • पूजा का समय: दिल्ली पंचांग के अनुसार 19 सितंबर को मध्याह्न पूजा का श्रेष्ठ समय सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:28 बजे तक है। श्रद्धालु इस निश्चित समयावधि में अपने घर के मंदिर में विशेष अर्चन और अभिषेक संपन्न कर सकते हैं। • व्रत और आहार नियम: इस दिन श्रद्धालु अपनी क्षमतानुसार निर्जला, फलाहार अथवा एक समय सात्विक भोजन का संकल्प ले सकते हैं। स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों को ध्यान में रखते हुए ही उपवास का स्वरूप चुनना चाहिए। • भोग की व्यवस्था: घर पर दूध, दही, मक्खन, मिश्री, खीर और ताजे फलों से सात्विक प्रसाद तैयार किया जाता है। भोजन उतनी ही मात्रा में बनाएं जिससे प्रसाद का वितरण सुगमता से हो सके और अन्न की बर्बादी न हो। • दान और सेवा कार्य: पर्व के अवसर पर जरूरतमंदों को फल, भोजन अथवा उपयोगी वस्त्र दान करने की परंपरा है। स्थानीय स्तर पर श्रद्धालु सेवा बस्तियों या आश्रमों में सहायता सामग्री पहुंचा सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को देवी राधा के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस तिथि को श्रीकृष्ण की आराधना और भक्ति के चरम स्वरूप की उपासना के लिए समर्पित किया गया है। • प्राकट्य तिथि का विधान: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि पर ही राधा रानी का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण इस तिथि को प्रतिवर्ष जन्मोत्सव के रूप में उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। • मध्याह्न व्यापिनी मान्यता: शास्त्रों में राधा रानी के पूजन के लिए दोपहर के समय को सर्वोत्तम स्वीकार किया गया है। 19 सितंबर को मध्याह्न काल में अष्टमी तिथि विद्यमान होने के कारण इसी दिन मुख्य अनुष्ठान आयोजित किए जा रहे हैं। • ब्रज परंपरा का महत्व: बरसाना और वृंदावन की पारंपरिक मान्यताओं में राधा रानी के बिना कृष्ण भक्ति अपूर्ण मानी जाती है। इसी कारण भाद्रपद की यह अष्टमी वैष्णव परंपरा में अत्यंत आदरणीय मानी गई है। सवाल-जवाब 1. राधाष्टमी 2026 में कब मनाई जा रही है? राधाष्टमी 19 सितंबर को मनाई जा रही है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ती है। 2. दिल्ली के पंचांग अनुसार पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? दिल्ली पंचांग के अनुसार मध्याह्न पूजा का सबसे शुभ समय 19 सितंबर को सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:28 बजे तक रहेगा। 3. अष्टमी तिथि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी? अष्टमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर करीब 1:00 बजे शुरू हुई थी और 19 सितंबर को दोपहर करीब 3:26 बजे समाप्त होगी। 4. राधा रानी को कौन-सा भोग लगाना सबसे उपयुक्त माना जाता है? राधा रानी को दूध, दही, माखन-मिश्री, खीर, ताजे फल, रबड़ी और मालपुए जैसी सात्विक मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। 5. राधाष्टमी के दिन कौन-से विशेष उपाय किए जा सकते हैं? इस दिन ताजे फूल अर्पित करना, 'राधे-राधे' नाम का जप करना, जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र दान करना और पारिवारिक सौहार्द बनाए रखना विशेष उपाय माने जाते हैं। https://trendkia.com/astrology/bhadrapad-ashtami-par-radha-janmotsav-ka-pawan-parva-madhyahna-pujan-samay-aur-vishesh-anushthan-33374 TrendKia — Har trend, sabse pehle.