करवा चौथ के आसपास सक्रिय लक्ष्मी नारायण राजयोग का महत्व और किन राशियों को मिलेगा इसका शुभ फल ज्योतिष शास्त्र में केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामियों के संयोग से बनने वाला लक्ष्मी नारायण राजयोग आर्थिक समृद्धि और शुभ प्रभाव लेकर आता है। जानिए यह योग किन राशियों में बनता है और इसका लाभ पाने के लिए क्या उपाय किए जाते हैं। वैदिक ज्योतिष में विभिन्न शुभ योगों और राजयोगों का विशेष महत्व माना गया है, जिनमें से एक अत्यंत प्रभावशाली योग लक्ष्मी नारायण राजयोग कहलाता है। करवा चौथ के पावन अवसर पर श्रीहरि और मां लक्ष्मी की कृपा से जुड़ा यह विशेष संयोग जातकों के जीवन में धन के नए मार्ग खोलने और आर्थिक समृद्धि बढ़ाने के लिए जाना जाता है। जब गोचर में ग्रहों की अनुकूल स्थिति बनती है, तब व्यक्ति को अनायास ही धन लाभ और आर्थिक उन्नति के कई अवसर प्राप्त होने लगते हैं। इस शुभ योग के प्रभाव इतने व्यापक माने जाते हैं कि व्यक्ति के जीवन में आर्थिक स्थिरता और संपन्नता की वृद्धि देखने को मिलती है। लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण और ज्योतिषीय आधार ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जन्म कुंडली में पांचवां और नौवां स्थान लक्ष्मी स्थान माना जाता है। केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामियों की युति या एक साथ बैठने की स्थिति से लक्ष्मी नारायण योग की रचना होती है। केंद्र भावों को भगवान नारायण का स्वरूप और त्रिकोण भावों को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। जब इन दोनों प्रमुख भावों के अधिपति एक साथ आकर संबंध स्थापित करते हैं, तब यह अत्यंत शुभ राजयोग सक्रिय होता है। यह योग न केवल जन्म कुंडली में स्थायी रूप से उपस्थित हो सकता है, बल्कि ग्रहों के गोचर के दौरान भी अस्थायी रूप से निर्मित होकर जातक को अप्रत्याशित वित्तीय लाभ प्रदान करता है। किन राशियों में बनता है यह विशेष योग? ज्योतिषीय नियमों के तहत लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण केवल कुछ विशिष्ट राशियों में ही संभव होता है। इस नियम के अनुसार, यह योग मुख्य रूप से निम्नलिखित राशियों में बनता है • मिथुन • कन्या • तुला • वृषभ • वृश्चिक • मकर • कुंभ उल्लिखित सात राशियों के अलावा अन्य किसी राशि में इस विशेष योग का निर्माण नहीं होता है। इसलिए जो जातक इन राशियों से संबंधित हैं, उनके लिए इस राजयोग का बनना विशेष फलदायी और लाभकारी सिद्ध होता है। कुंडली और गोचर में योग की स्थिति का विश्लेषण इस शुभ योग के पूर्ण फल को समझने के लिए जातक की जन्म कुंडली और वर्तमान गोचर दोनों का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक होता है। यदि यह योग जन्म कुंडली में मौजूद है, तो यह देखना जरूरी होता है कि यह किस भाव में घटित हो रहा है। इसके साथ ही, यह भी जांचना महत्वपूर्ण है कि इस योग पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ रही है या फिर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव इस पर पड़ रहा है। अशुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ने से योग के शुभ फलों में कमी आ सकती है, जबकि शुभ ग्रहों का प्रभाव इसे और अधिक बलवान बना देता है। वहीं दूसरी ओर, यदि यह योग वर्तमान गोचर के कारण बन रहा है, तो यह ध्यानपूर्वक देखना पड़ता है कि यह किस राशि में आकार ले रहा है। यदि यह योग कुंडली में बन रहा हो, तो इसके शुभ प्रभावों को और अधिक प्रबल करने के लिए उचित प्रयास किए जाने चाहिए। लक्ष्मी नारायण योग को प्रबल करने के उपाय और पूजा विधि लक्ष्मी नारायण राजयोग का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करने और इसे सशक्त बनाने के लिए शास्त्रों में विशेष आराधना का विधान बताया गया है। इस योग की शक्ति को बढ़ाने के लिए भगवान लक्ष्मी नारायण की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इसके अंतर्गत श्रीयंत्र की स्थापना और नियमित पूजा करने के साथ-साथ मां लक्ष्मी के पवित्र मंत्रों एवं स्तोत्रों का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है। नियमित रूप से श्रीयंत्र की आराधना करने और मां लक्ष्मी की स्तुति करने से धन आगमन के योग निरंतर बनते रहते हैं तथा व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का विस्तार होता है। इसका आप पर असर यह ज्योतिषीय विश्लेषण बताता है कि सात विशेष राशियों के जातकों को वित्तीय समृद्धि और नए आर्थिक अवसरों का लाभ मिल सकता है। • वित्तीय प्रभाव: इस राजयोग के प्रभाव से संबंधित राशियों के जातकों को धन आगमन के नए स्रोत मिल सकते हैं। इसके व्यावहारिक लाभ के लिए अपनी कुंडली के भावों और ग्रह दृष्टि की जांच कर उचित योजना बनाएं। • राशिगत दायरा: यह योग केवल मिथुन, कन्या, तुला, वृषभ, वृश्चिक, मकर और कुंभ राशि में ही संभव होता है। इन राशियों के लोग इस समय अपनी आर्थिक योजनाओं और करियर के प्रयासों को गति दे सकते हैं। • आध्यात्मिक अनुष्ठान: इस योग की शक्ति बढ़ाने के लिए श्रीयंत्र की स्थापना और देवी लक्ष्मी के पाठ का विधान बताया गया है। नियमित आराधना करने से योग के सकारात्मक प्रभावों को जीवन में अनुभव किया जा सकता है। • कुंडली विश्लेषण: जन्म कुंडली में पांचवें और नौवें स्थान पर ग्रहों की स्थिति का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता है। इसके आधार पर जातक शुभ और अशुभ ग्रहों की दृष्टि को समझकर सही निर्णय ले सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण जन्म कुंडली में केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामियों के एक साथ आने से होता है, जो गोचर के दौरान भी फलदायी बनता है। • मूल कारण: कुंडली के पांचवें और नौवें भाव को लक्ष्मी स्थान कहा जाता है। जब केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामी युति बनाकर एक साथ बैठते हैं, तब यह राजयोग घटित होता है। • गोचर की भूमिका: ग्रहों के निरंतर भ्रमण के दौरान जब शुभ संयोग निश्चित राशियों में घटित होते हैं, तब यह योग गोचर में सक्रिय हो जाता है। इससे व्यक्ति के जीवन में अचानक आर्थिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। • दृष्टि और स्थिति: इस योग का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि ग्रहों पर शुभ या अशुभ दृष्टि पड़ रही है या नहीं। अशुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर इसके प्रभाव कमजोर हो सकते हैं, जबकि शुभ दृष्टि से इसका फल कई गुना बढ़ जाता है। सवाल-जवाब 1. लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण कैसे होता है? जब कुंडली के केंद्र और त्रिकोण भावों के मालिक एक साथ बैठते हैं, तब लक्ष्मी नारायण योग बनता है। 2. कुंडली में लक्ष्मी स्थान कौन से भाव माने जाते हैं? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली के पांचवें और नौवें भाव को लक्ष्मी स्थान माना जाता है। 3. यह राजयोग किन राशियों में बनता है? यह योग केवल मिथुन, कन्या, तुला, वृषभ, वृश्चिक, मकर और कुंभ राशि में बनता है। 4. इस योग को प्रबल करने के लिए क्या उपाय बताए गए हैं? इसके लिए भगवान लक्ष्मी नारायण की पूजा, श्रीयंत्र की आराधना और मां लक्ष्मी के पाठ का विधान बताया गया है। 5. गोचर में इस योग का विश्लेषण करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? गोचर में यह देखना आवश्यक होता है कि योग किस राशि में बन रहा है और उस पर किसी शुभ या अशुभ ग्रह की दृष्टि तो नहीं है। https://trendkia.com/astrology/karwa-chauth-ke-asapasa-sakriya-lakshmi-narayan-rajyoga-ka-mahatva-aura-kina-rashiyon-ko-milega-isaka-shubha-phala-52494 TrendKia — Har trend, sabse pehle.