सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को, जानें कुतुप और रौहिण मुहूर्त के साथ श्राद्ध का महत्व पितृ पक्ष के समापन पर सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी, जिस दिन शनिवार होने से शनिश्चरी अमावस्या का विशेष संयोग भी बन रहा है। पितृ पक्ष का समापन आश्विन मास की अमावस्या तिथि के साथ होता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इस वर्ष अमावस्या तिथि की शुरुआत 9 अक्टूबर की रात से हो रही है। चूंकि श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान दिन के समय और सूर्य के प्रकाश में संपन्न किए जाते हैं, इसलिए श्राद्ध कर्म के लिए मुख्य तिथि 10 अक्टूबर मान्य होगी। 10 अक्टूबर को पूरे दिन अमावस्या तिथि व्याप्त रहेगी, जिससे श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त सभी आवश्यक विधि-विधान पूरे कर सकेंगे। शनिश्चरी अमावस्या का विशेष धार्मिक संयोग इस बार सर्वपितृ अमावस्या के दिन एक विशिष्ट धार्मिक संयोग बन रहा है। 10 अक्टूबर को शनिवार होने की वजह से इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जा रहा है। सनातन धार्मिक परंपराओं में शनिवार और अमावस्या के इस मिलन को अत्यंत फलदायी और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण करने के साथ-साथ दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और कुल के पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। श्राद्ध और तर्पण के लिए शुभ मुहूर्त पंचांग गणना के आधार पर सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों की शांति के लिए विशेष मुहूर्तों का निर्धारण किया गया है। धार्मिक विधान के अनुसार दोपहर के समय किए जाने वाले श्राद्ध को सर्वोत्तम माना जाता है। इस दिन के प्रमुख शुभ समय इस प्रकार हैं • कुतुप मुहूर्त: श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप काल को बेहद प्रशस्त माना गया है, जो 10 अक्टूबर को सुबह करीब 11 बजकर 44 मिनट से आरंभ होकर दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक बना रहेगा। • रौहिण मुहूर्त: कुतुप काल समाप्त होते ही रौहिण मुहूर्त शुरू होगा, जो दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से दोपहर 1 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दोनों मुहूर्तों की अवधि में ब्राह्मण भोजन, तर्पण, पिंडदान और पंचबलि कर्म करना विशेष रूप से श्रेयस्कर और फलदायी रहता है। अज्ञात तिथि वाले पूर्वजों के लिए मुक्ति का दिन सर्वपितृ अमावस्या का महत्व उन परिवारों के लिए सबसे अधिक माना जाता है, जिन्हें अपने किसी दिवंगत पूर्वज की सही मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती। इसके अतिरिक्त यदि पितृ पक्ष के दौरान किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध कर्म छूट गया हो या संपन्न न हो पाया हो, तो इस अंतिम दिन उन सभी पितरों के निमित्त एक साथ श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है। धार्मिक आस्था के अनुसार पितृ पक्ष के इस अंतिम अवसर पर यदि श्रद्धापूर्वक पूर्वजों का स्मरण किया जाए और सामर्थ्य के अनुरूप जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान दिया जाए, तो पितरों का आशीर्वाद सदैव परिवार पर बना रहता है। इससे घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की वृद्धि होती है, इसलिए पितृ पक्ष के समापन पर हर व्यक्ति को अपनी क्षमता अनुसार तर्पण और दान अवश्य करना चाहिए। इसका आप पर असर सर्वपितृ अमावस्या की सही तारीख और शुभ मुहूर्त स्पष्ट होने से श्रद्धालु अपने पितरों के तर्पण की पूरी तैयारी समय रहते व्यवस्थित कर सकते हैं। • पूजा का सही दिन: तिथि 9 अक्टूबर की रात शुरू होने के बावजूद मुख्य श्राद्ध कर्म 10 अक्टूबर को दिन के समय ही करना मान्य होगा। रात के समय श्राद्ध कर्म निषेध होने के कारण श्रद्धालु 10 अक्टूबर के दिनभर की अवधि का उपयोग कर सकते हैं। • मुहूर्त का समय: तर्पण और पिंडदान के मुख्य अनुष्ठान सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 1 बजकर 17 मिनट के बीच पूरे करने चाहिए। कुतुप और रौहिण मुहूर्त की इस समयावधि में ब्राह्मण भोजन और पंचबलि कराना सबसे फलदायी माना गया है। • छूटे हुए श्राद्ध का समाधान: जिन पूर्वजों की तिथि याद न हो या जिनका श्राद्ध पक्ष में छूट गया हो, उनका तर्पण इसी एक दिन किया जा सकता है। इससे अलग-अलग तिथियों को लेकर असमंजस में पड़े परिवारों को सभी पितरों की शांति का अवसर मिलता है। • दान और परोपकार: इस दिन अपनी क्षमतानुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अनाज दान करने का विशेष महत्व है। शनिवार के दिन पड़ने की वजह से शनिश्चरी अमावस्या के निमित्त भी दान पुण्य किया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ सर्वपितृ अमावस्या की तिथि को लेकर बना संशय पंचांग में तिथि के रात में आरंभ होने और हिंदू परंपरा में उदयातिथि व मध्याह्न काल के नियमों के कारण उत्पन्न हुआ। • तिथि का रात्रि प्रारंभ: अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की देर रात शुरू हो रही है, जिससे तारीख को लेकर भ्रम हुआ। सनातन धर्म में पितृ कर्म दिन के उजाले और दोपहर के समय करने का विधान है, इसलिए यह 10 अक्टूबर को मान्य हुई। • दिनभर अमावस्या की उपस्थिति: 10 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद दिनभर अमावस्या तिथि विद्यमान रहेगी। इस कारण मध्याह्न काल और कुतुप मुहूर्त इसी दिन उपलब्ध हो रहे हैं। • शनिवार का संयोग: 10 अक्टूबर को शनिवार का दिन होने के कारण अमावस्या और शनिवार का दुर्लभ योग बना। इसी वजह से इसे शनिश्चरी अमावस्या के रूप में भी रेखांकित किया गया है। सवाल-जवाब 1. सर्वपितृ अमावस्या 2026 में किस दिन मनाई जाएगी? श्राद्ध कर्म के लिए मुख्य सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी, क्योंकि 10 अक्टूबर को दिनभर अमावस्या तिथि रहेगी। 2. श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप मुहूर्त का समय क्या है? सर्वपितृ अमावस्या पर कुतुप मुहूर्त 10 अक्टूबर को सुबह करीब 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। 3. रौहिण मुहूर्त का समय कब से कब तक रहेगा? रौहिण मुहूर्त 10 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से दोपहर 1 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। 4. इस बार सर्वपितृ अमावस्या को शनिश्चरी अमावस्या क्यों कहा जा रहा है? इस बार सर्वपितृ अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जा रहा है। 5. जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि मालूम न हो, उनका श्राद्ध कब करना चाहिए? जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि मालूम न हो, उनका श्राद्ध और तर्पण सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जा सकता है। https://trendkia.com/astrology/sarva-pitru-amavasya-10-october-ko-janen-kutup-aura-rohin-muhurta-ke-satha-shradh-ka-mahatva-44790 TrendKia — Har trend, sabse pehle.