शारदीय नवरात्रि में महाअष्टमी और महानवमी की तिथियों का पंचांग विवरण एवं सरल पूजन पद्धति हिंदू पंचांग और मिथिला पंचांग के अनुसार महाअष्टमी का व्रत 18 अक्टूबर को रखा जाएगा, जबकि उदया तिथि के आधार पर 20 अक्टूबर को नवमी पूजन और कन्या भोज के अनुष्ठान संपन्न होंगे। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर महाअष्टमी और महानवमी की तिथियों को लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्सुकता रहती है। हिंदू पंचांग की गणनाओं के आधार पर इस बार तिथियों के विशेष संयोग के चलते अष्टमी व्रत रविवार, 18 अक्टूबर को रखा जा रहा है। व्रत का पारण अगले दिन सोमवार, 19 अक्टूबर को किया जाएगा। इसके पश्चात महानवमी से जुड़े समस्त मुख्य धार्मिक अनुष्ठान मंगलवार, 20 अक्टूबर को संपन्न किए जाएंगे। पंचांग के अनुसार तिथियों के समय चक्र को समझकर विधिवत पूजन करने से व्रतियों को विशेष आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है। पंचांग गणना और तिथियों का समय मिथिला पंचांग के अनुसार इस वर्ष तिथियों के फेरबदल के कारण महाअष्टमी व्रत के लिए 18 अक्टूबर, रविवार का दिन निर्धारित हुआ है। पंचांग के गणित के मुताबिक 19 अक्टूबर सोमवार को सुबह 8 बजकर 04 मिनट तक अष्टमी तिथि प्रभावी रहेगी। इसके उपरांत नवमी तिथि का आरंभ होगा, जो अगले दिन 20 अक्टूबर मंगलवार को सुबह 9 बजकर 46 मिनट तक मान्य रहेगी। सनातन परंपरा में उदया तिथि का अत्यंत महत्व माना जाता है, इसलिए सूर्योदय कालीन तिथि की मान्यता के अनुसार मंगलवार को ही नवमी तिथि के मुख्य धार्मिक कर्मकांड पूरे किए जाएंगे। महानवमी पर हवन और कन्या पूजन नवमी के दिन भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है। मंगलवार, 20 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 46 मिनट से पूर्व उदया कालीन नवमी तिथि में हवन, आहुति और कन्या पूजन जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। नवरात्रि व्रत के समापन पर नौ कन्याओं और एक बटुक को आदरपूर्वक घर बुलाकर भोजन कराने और उपहार भेंट करने की परंपरा है। इस दिन परिवार के सभी सदस्य एकत्रित होकर अग्नि देव को आहुति समर्पित करते हैं और देवी मां से सुख, शांति और समृद्धि की मंगल कामना करते हैं। घर पर देवी पूजन की सरल एवं प्रामाणिक विधि सामान्य गृहस्थ भक्त बिना किसी जटिलता के घर पर भी पूरी श्रद्धा के साथ भगवती का पूजन कर सकते हैं। पूजा की शुरुआत सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर करनी चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर अथवा पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। पवित्र वातावरण तैयार करने के पश्चात देवी दुर्गा और सभी आराध्य देवी-देवताओं का शुद्ध जल से अभिषेक करें। इसके बाद सभी विग्रहों पर तिलक लगाएं और ताजे फल एवं पुष्प अर्पित करें। भगवती की प्रतिमा या चित्र को अक्षत, लाल चंदन और लाल चुनरी अर्पित की जाती है। देवी मां को सफेद और लाल पुष्प विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं, इसलिए इन्हें मां के चरणों में अवश्य अर्पित करें। पूजा स्थल पर धूपबत्ती सुलगाएं और गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। अंत में एक साफ पान का पत्ता लेकर उस पर कपूर की टिकिया और दो साबुत लौंग रखें। इस प्रकार तैयार दीपक या कपूर की लौ से पूरी भक्ति भावना के साथ मां दुर्गा की आरती उतारें। आरती संपन्न होने के उपरांत सभी में प्रसाद वितरित करें और स्वयं भी चरणामृत ग्रहण करें। इसका आप पर असर नवरात्रि के समापन चरणों की सटीक तिथियों की जानकारी से श्रद्धालुओं को अपने उपवास और धार्मिक आयोजनों की सही समय सारिणी बनाने में सुविधा मिलती है। • उपवास योजना: अष्टमी का उपवास 18 अक्टूबर रविवार को रखना है, जिससे व्रती समय पर तैयारी पूरी कर सकेंगे। पारण अगले दिन 19 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 04 मिनट के बाद किया जा सकेगा। • कन्या पूजन समय: कन्या भोज और हवन का मुख्य आयोजन 20 अक्टूबर मंगलवार को संपन्न होगा। सुबह 9 बजकर 46 मिनट से पहले उदया तिथि का लाभ उठाते हुए पूजा संपन्न करना शुभ रहेगा। • सामग्री प्रबंधन: पूजा के लिए लाल चंदन, अक्षत, चुनरी, पान, कपूर और लौंग की व्यवस्था पहले से कर लेनी चाहिए। इससे ऐन वक्त पर पूजा के दौरान किसी बाधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। • पारिवारिक अनुष्ठान: मंगलवार को कार्यालय या व्यापारिक व्यस्तता के बीच सुबह के समय हवन के लिए समय निकालना आवश्यक होगा। इसके अनुसार परिवार के सभी सदस्य अपने दैनिक कार्यक्रम तय कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ चंद्र पंचांग में तिथियों की गणना सूर्य और चंद्रमा की कोणीय दूरी पर आधारित होती है, जिसके कारण तिथियों का आरंभ और समापन अंग्रेजी तारीखों के समान आधी रात को नहीं होता। इसी गणितीय अंतर के कारण इस वर्ष अष्टमी और नवमी के व्रत अलग-अलग दिनों में विभाजित हुए हैं। • तिथि का फेरबदल: अष्टमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 04 मिनट पर समाप्त हो रही है, जिससे पूरे दिन का व्रत 18 अक्टूबर को रखना शास्त्रसम्मत बना। इसी प्रकार नवमी तिथि 20 अक्टूबर की सुबह 9 बजकर 46 मिनट तक ही मान्य है। • उदया तिथि का नियम: हिंदू धर्म में जिस तिथि में सूर्योदय होता है, उसी तिथि को उस पूरे दिन के धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रधान माना जाता है। मंगलवार को सूर्योदय के समय नवमी तिथि उपस्थित रहने के कारण उसी दिन नवमी के अनुष्ठान तय किए गए। • पारण और हवन का क्रम: व्रत रखने के बाद अष्टमी पारण 19 अक्टूबर को किया जाएगा, जबकि नवरात्रि की पूर्णाहुति और हवन 20 अक्टूबर को नवमी के दिन पूरे किए जाएंगे। यह क्रम शास्त्रों में बताए गए तिथि चक्र के अनुसार तय होता है। सवाल-जवाब 1. महाअष्टमी का व्रत किस दिन रखा जाएगा? पंचांग के अनुसार महाअष्टमी का व्रत रविवार, 18 अक्टूबर को रखा जाएगा। 2. अष्टमी तिथि कब समाप्त होगी? अष्टमी तिथि सोमवार, 19 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 04 मिनट तक रहेगी। 3. महानवमी की पूजा और हवन किस दिन होंगे? उदया तिथि की मान्यता के अनुसार नवमी पूजा, हवन और कन्या पूजन मंगलवार, 20 अक्टूबर को संपन्न किए जाएंगे। 4. नवमी तिथि का समापन समय क्या है? नवमी तिथि मंगलवार, 20 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। 5. देवी की आरती में किन विशेष वस्तुओं का उपयोग किया जाता है? आरती के लिए एक साफ पान के पत्ते पर कपूर और दो साबुत लौंग रखकर माता की आरती उतारने का विधान है। https://trendkia.com/astrology/sharadiya-navratri-men-maha-ashtami-aura-maha-navami-ki-tithiyon-ka-panchang-vivarana-evn-sarala-pujana-paddhati-47348 TrendKia — Har trend, sabse pehle.