पहाड़ों के सफर पर निकलने से पहले सीखें सुरक्षित ड्राइविंग के तौर-तरीके अक्तूबर के लॉन्ग वीकेंड में पहाड़ों का रुख करने वाले चालकों के लिए सुरक्षित ड्राइविंग के नियमों और तकनीकी सावधानियों का पालन करना बेहद जरूरी है। अक्तूबर 2026 की शुरुआत में 2 अक्तूबर से 4 अक्तूबर के लंबे सप्ताहांत पर दिल्ली-एनसीआर से बड़ी तादाद में लोग शिमला, मनाली, मसूरी, नैनीताल अथवा उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सुरम्य हिल स्टेशनों की ओर रुख करने की योजना बना रहे हैं। इस मौसम में पहाड़ों का मिजाज काफी सुहावना रहता है, सैलानियों की भारी भीड़ भी तुलनात्मक रूप से कम मिलती है और मार्ग भी अमूमन ठीक स्थिति में रहते हैं। हालांकि मैदानी इलाकों के चौड़े रास्तों के मुकाबले घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाना बिल्कुल अलग तरह की चुनौती पेश करता है। संकरी गलियां, तीखे अंध मोड़, अप्रत्याशित रूप से घिरने वाला कोहरा, भूस्खलन का अंदेशा और अंतहीन ढलान के दौरान जरा सी भी असावधानी भीषण संकट की वजह बन सकती है। पर्वतीय अंचलों में सामने आने वाले अधिकतर सड़क हादसों के पीछे ब्रेक का अचानक फेल होना, तेज रफ्तार अथवा गलत गियर का चयन प्रमुख वजह बनता है। केवल घूमने-फिरने का उत्साह रखने के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि हर चालक तकनीकी बारीकियों और सुरक्षा के स्थापित कायदों को समझे। सुव्यवस्थित तैयारी और सही ड्राइविंग शैली के जरिए ही यात्रा को जोखिम मुक्त और सुखद बनाया जा सकता है। इसके लिए पांच बुनियादी सावधानियों पर अमल करना अनिवार्य माना गया है। सफर शुरू करने से पहले जरूरी तकनीकी जांच घर से निकलने से पूर्व गाड़ी की मुकम्मल सर्विसिंग सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसमें ब्रेक पैड, डिस्क, ब्रेक फ्लूइड, कूलेंट, इंजन ऑयल और बैटरी की कार्यक्षमता को बारीकी से परखना शामिल है। टायरों की ट्रेड डेप्थ कम से कम 3 मिमी होनी चाहिए, क्योंकि घिसे हुए टायर नम रास्तों पर पकड़ खो देते हैं। पहाड़ों पर ब्रेक का धोखा देना जानलेवा साबित होता है। इसके साथ ही वाहन में स्पेयर टायर, जैक, टूल किट, टॉर्च, पीने के पानी की बोतलें और प्राथमिक उपचार किट जरूर रखी जानी चाहिए। खड़ी चढ़ाई पर इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है जिससे वह तेजी से गर्म हो सकता है, इसलिए रेडिएटर में पानी का स्तर पूरा रखें। किसी भी असुविधा से बचने के लिए फास्टैग में पर्याप्त बैलेंस और फ्यूल टैंक को हमेशा फुल रखना चाहिए। गति सीमा का पालन और सही गियर तकनीक पहाड़ों के घुमावदार मोड़ों पर वाहन की गति कभी भी 30-40 किमी प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए। रफ्तार अधिक होने पर अचानक नियंत्रण खोने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। चढ़ाई पर वाहन चलाते समय दूसरे या तीसरे जैसे लोअर गियर का उपयोग करना चाहिए ताकि इंजन को चढ़ने के लिए आवश्यक ताकत मिलती रहे। इसी प्रकार उतराई के वक्त भी लो गियर लगाकर इंजन ब्रेकिंग का सहारा लेना मुफीद रहता है। ढलान पर लगातार ब्रेक दबाए रखने से ब्रेक अत्यधिक गर्म होकर पूरी तरह फेल हो सकते हैं। गियर के माध्यम से गति नियंत्रित करने की तकनीक सीखने से वाहन पर ठोस पकड़ बनी रहती है और दुर्घटना की आशंका घट जाती है। अंधे मोड़ों पर सतर्कता और अपनी लेन में बने रहना पहाड़ी रास्तों पर पड़ने वाले अंधे मोड़ों यानी ब्लाइंड कर्व्स पर मुड़ने से पहले हमेशा हॉर्न बजाने की आदत डालें। सड़क किनारे लगे हॉर्न प्लीज के साइनबोर्ड को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चालक को हमेशा बाईं तरफ अपनी निर्धारित लेन में बने रहना चाहिए और बीच की विभाजक रेखा पार करने की गलती नहीं करनी चाहिए। ओवरटेकिंग केवल उसी समय की जानी चाहिए जब आगे की सड़क बिल्कुल सीधी और दूर तक साफ दिखाई दे रही हो। मोड़ के ठीक बीच में अचानक ब्रेक लगाकर गति धीमी करने की कोशिश खतरनाक होती है, इसके बजाय मोड़ आने से पहले ही गियर डाउन करके गति को नियंत्रित कर लेना चाहिए। अचानक स्टीयरिंग घुमाने या अचानक एक्सीलेटर दबाने से बचना सुरक्षित सफर की कुंजी है। चढ़ाई करने वाले वाहनों को प्राथमिकता पहाड़ी यातायात का यह बुनियादी नियम है कि ऊपर की ओर चढ़ाई कर रहे वाहन को प्राथमिकता यानी राइट ऑफ वे दिया जाता है। ढलान से नीचे उतर रही गाड़ी के चालक का यह कर्तव्य है कि वह अपने वाहन को साइड में रोककर चढ़ाई वाले वाहन को रास्ता दे। संकरे मार्गों पर आमने-सामने आने पर धैर्य का परिचय देना चाहिए और सामने से आ रही गाड़ी को सुगमता से निकलने देना चाहिए। लंबे ढलान पर केवल फुट ब्रेक पर निर्भर न रहकर लो गियर में इंजन की सहायता से रफ्तार थामनी चाहिए। ड्राइविंग के दौरान शारीरिक या मानसिक थकान महसूस होते ही वाहन रोक देना चाहिए। हर दो घंटे की लगातार ड्राइविंग के बाद 10-15 मिनट का विराम लेना अनिवार्य है, क्योंकि थका हुआ चालक पर्वतीय रास्तों पर भारी जोखिम बन जाता है। मौसम के उतार-चढ़ाव और रात के सफर से बचाव पहाड़ों में वातावरण का मिजाज महज 15-20 मिनट के भीतर पूरी तरह बदल सकता है। अचानक घना कोहरा छाने, वर्षा होने या हल्की फुहारें पड़ने की स्थिति में वाहन की गति तुरंत और धीमी कर लेनी चाहिए। ऐसे मौसम में लो बीम हेडलाइट्स और फॉग लाइट्स चालू रखना बेहद जरूरी होता है। यात्रा पर आगे बढ़ने से पहले सीमा सड़क संगठन अथवा स्थानीय प्रशासनिक स्रोतों से सड़कों की वास्तविक स्थिति की जानकारी ले लेनी चाहिए। जलभराव या फिसलन भरी मिट्टी वाले हिस्सों से गाड़ी को अत्यधिक सतर्कता के साथ निकालना चाहिए। रात के वक्त दृश्यता शून्य के करीब पहुंच जाती है, इसलिए रात्रि में पहाड़ी ड्राइविंग से बचना चाहिए। यदि परिवार साथ है तो आपस में जिम्मेदारियां साझा करें और आवश्यकता पड़ने पर बारी-बारी से गाड़ी चलाएं। इसका आप पर असर पहाड़ी रास्तों पर यात्रा करने वाले वाहन चालकों के लिए सुरक्षा दिशानिर्देशों का पालन करना दुर्घटनाओं से बचने के लिए जरूरी है। • वाहन सुरक्षा: प्रस्थान से पहले ब्रेक, टायरों और कूलेंट की पूरी तकनीकी जांच कराएं। टायरों की ट्रेड डेप्थ 3 मिमी से अधिक रखने से नम और फिसलन भरी सड़कों पर वाहन अनियंत्रित नहीं होता। • गति और गियर नियंत्रण: ढलान पर उतरते समय केवल ब्रेक पैडल पर निर्भर रहने के बजाय लो गियर का प्रयोग करें। इससे ब्रेक पैड गर्म होकर फेल होने का जोखिम खत्म हो जाता है और गति 30-40 किमी प्रति घंटा बनी रहती है। • यात्रा समय प्रबंधन: पहाड़ों में रात के समय सफर करने से पूरी तरह परहेज करें। हर दो घंटे की ड्राइविंग के बाद 10-15 मिनट का विश्राम लेकर चालक थकान से बच सकते हैं। • मार्ग नियम: चढ़ाई कर रहे वाहनों को हमेशा आगे निकलने का पहला अधिकार दें। संकरे रास्तों पर धैर्यपूर्वक गाड़ी साइड में लगाकर विपरीत दिशा से आ रहे वाहनों को सुरक्षित रास्ता प्रदान करें। ऐसा क्यों हुआ पर्वतीय सड़कों पर ड्राइविंग की भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियां मैदानी रास्तों की तुलना में बिल्कुल विपरीत होती हैं, जिससे चालकों की मामूली त्रुटियां भी घातक साबित होती हैं। • भौगोलिक संरचना: तीखे अंधे मोड़, अत्यधिक ढलान और संकरे रास्ते चालकों के लिए दृश्यता और नियंत्रण की सीमा सीमित कर देते हैं। मैदानी गति पर इन मोड़ों को काटने से गाड़ियां सीधे खाई में गिरने अथवा टकराने का शिकार बनती हैं। • मैकेनिकल ओवरहीटिंग: लंबी चढ़ाई के दौरान इंजन पर लगातार भारी खिंचाव पड़ता है, जबकि लंबी ढलान पर लगातार ब्रेक दबाने से ब्रेक फ्लूइड उबलने लगता है और ब्रेक पैड ग्रिप छोड़ देते हैं। लो गियर और इंजन ब्रेकिंग का ज्ञान न होने से यह स्थिति पैदा होती है। • अस्थिर मौसम प्रणाली: पहाड़ों में अचानक 15-20 मिनट के भीतर भारी कोहरा, वर्षा या भूस्खलन की स्थिति बन जाती है। मौसम और मार्ग की पूर्व सूचना न लेने तथा रात में ड्राइविंग करने से दृश्यता बाधित होकर हादसे होते हैं। सवाल-जवाब 1. पहाड़ों में कार की गति सीमा कितनी रखी जानी चाहिए? पहाड़ी रास्तों पर वाहन की गति 30 से 40 किमी प्रति घंटे के बीच रखी जानी चाहिए ताकि मोड़ पर नियंत्रण न खोए। 2. सफर से पहले टायरों की जांच में क्या देखना जरूरी है? टायरों की ट्रेड डेप्थ कम से कम 3 मिमी होनी चाहिए ताकि नम और फिसलन भरे मोड़ों पर उचित ग्रिप बनी रहे। 3. उतराई के समय बार-बार ब्रेक लगाने से क्या खतरा होता है? लगातार ब्रेक दबाने से ब्रेक पैड अत्यधिक गर्म हो जाते हैं, जिससे अचानक ब्रेक फेल होने का जोखिम बढ़ जाता है। 4. चढ़ाई और उतराई में पहले निकलने का अधिकार किसे मिलता है? पहाड़ी सड़कों पर ऊपर की ओर चढ़ाई कर रहे वाहन को प्राथमिकता मिलती है और नीचे उतर रहे वाहन को रुककर रास्ता देना चाहिए। 5. पहाड़ों में लगातार कितने समय बाद ड्राइविंग ब्रेक लेना चाहिए? हर दो घंटे की ड्राइविंग के बाद चालक को 10 से 15 मिनट का विश्राम अवश्य लेना चाहिए। https://trendkia.com/auto/paharon-ke-saphara-para-nikalane-se-pahale-sikhen-surakshita-driving-ke-taura-tarike-40622 TrendKia — Har trend, sabse pehle.