पुरानी पल्सर के इंजन से जबलपुर के छात्रों ने बनाई फॉर्मूला स्टाइल रेसिंग कार जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के 30 मैकेनिकल इंजीनियरिंग छात्रों ने 1.50 लाख रुपये में 150 किमी प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ने वाली गोकार्ट रेसिंग कार तैयार की है. मध्य प्रदेश के सबसे पुराने तकनीकी संस्थान जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थियों ने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में शानदार तकनीकी प्रयोग पेश किया है. कॉलेज के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने एक सेकंड हैंड पल्सर 150 बाइक के इंजन का इस्तेमाल करके तेज रफ्तार फॉर्मूला स्टाइल रेसिंग कार तैयार की है. सामान्य तौर पर बाजार में ऐसी गोकार्ट रेसिंग कारों की लागत तीन से चार लाख रुपये तक पहुंच जाती है, लेकिन विद्यार्थियों के इस दल ने इसे महज 1.50 लाख रुपये के सीमित बजट में बनाकर तैयार कर दिया है. यह वाहन 150 किलोमीटर प्रति घंटे की शीर्ष रफ्तार तक दौड़ने की क्षमता रखता है. छह महीने की तकनीकी मेहनत और 30 छात्रों का दल इस अनूठी रेसिंग कार के निर्माण में कॉलेज के 30 मैकेनिकल इंजीनियरिंग विद्यार्थियों की टीम ने लगातार छह महीने तक पसीना बहाया है. परियोजना के तकनीकी दल का नेतृत्व छात्र मोहम्मद हुसैन ने किया. दल के सदस्यों ने इस वाहन की रूपरेखा पूरी तरह स्थानीय स्तर पर जबलपुर में ही तैयार की और उसकी असेंबलिंग भी कॉलेज में ही पूरी की. परियोजना पर काम कर रहे छात्रों का मुख्य उद्देश्य कम से कम लागत में एक पूर्णत सुरक्षित और प्रतिस्पर्धी रेसिंग वाहन विकसित करना था. देश के प्रमुख शहरों से जुटाए गए तकनीकी कलपुर्जे वाहन के लिए आवश्यक सभी पार्ट्स स्थानीय बाजार में उपलब्ध नहीं थे, इसलिए छात्रों ने देश के अलग-अलग औद्योगिक शहरों से जरूरी सामान मंगाया. चेचिस तैयार करने के लिए विशेष फ्रेम पाइप और संबंधित सामग्री दिल्ली से मंगाई गई. सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए सभी आवश्यक सेफ्टी गियर पुणे से खरीदे गए. वाहन के चारों पहियों के लिए विशेष रेसिंग टायर इंदौर से लाए गए. इन सभी हिस्सों को जबलपुर लाकर टीम ने इंजीनियरिंग मानकों के अनुरूप संयोजित किया. गोकार्ट कार के तकनीकी फीचर्स और बनावट तकनीकी संरचना के लिहाज से इस गोकार्ट वाहन में पल्सर 150 का पेट्रोल इंजन लगाया गया है, जो 5 गियर ट्रांसमिशन प्रणाली पर काम करता है. वाहन के ईंधन के लिए इसमें 4.5 लीटर क्षमता का पेट्रोल टैंक फिट किया गया है. कार में लगे चारों टायरों की लंबाई लगभग 6 इंच है. यह वाहन पूरी तरह से सीमेंटेड ट्रैक पर चलने के लिए डिजाइन किया गया है और इसे सामान्य डामर या कच्ची सड़कों पर नहीं चलाया जा सकता. ट्रैक पर बेहतर संतुलन बनाए रखने के लिए इसका ग्राउंड क्लीयरेंस बेहद कम रखा गया है, जिससे यह जमीन से महज 2.5 सेंटीमीटर ऊपर रहकर चलती है. वर्तमान में वाहन पर अंतिम स्तर का काम चल रहा है, जिसके तहत बॉडी पेंटिंग और सुरक्षा बंपर लगाने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है. कोल्हापुर में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भाग लेने की तैयारी छात्रों की टीम इस वाहन को लेकर राष्ट्रीय स्तर की रेसिंग प्रतियोगिता में उतरने की योजना बना रही है. विद्यार्थियों ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर में आयोजित होने वाली इंडियन कार्टिंग चैंपियनशिप के लिए आधिकारिक पंजीकरण करा लिया है. छात्र दल का लक्ष्य प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन करके अपने संस्थान का नाम राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है. इसका आप पर असर यह नवाचार इंजीनियरिंग छात्रों और मोटरस्पोर्ट्स प्रेमियों के लिए किफायती तकनीक के नए रास्ते खोलता है. • भारत में: इंजीनियरिंग छात्रों के लिए यह प्रोजेक्ट साबित करता है कि सीमित बजट में भी मोटरस्पोर्ट्स प्रोटोटाइप बनाए जा सकते हैं. यह अन्य संस्थानों के युवाओं को पुराने ऑटोमोबाइल पार्ट्स के पुनर्चक्रण और इनोवेशन के लिए प्रोत्साहित करता है. • जबलपुर में: स्थानीय तकनीकी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से क्षेत्र के इंजीनियरिंग कॉलेजों को प्रतिष्ठा मिलेगी. इससे शहर में तकनीकी शिक्षा हासिल कर रहे युवाओं को व्यावहारिक प्रयोग करने की नई प्रेरणा मिलती है. • लागत बचत: तीन से चार लाख रुपये में मिलने वाले रेसिंग गोकार्ट के मुकाबले इसे केवल 1.50 लाख रुपये में तैयार किया गया है. कम खर्च में प्रोटोटाइप तैयार होने से छात्र प्रतियोगिताओं में अधिक आसानी से भाग ले सकेंगे. • सुरक्षा और नियम: यह वाहन सामान्य सड़कों के लिए नहीं बल्कि केवल विशेष सीमेंटेड रेसिंग ट्रैक के लिए अधिकृत है. इसे आम यातायात में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होती है. ऐसा क्यों हुआ यह रेसिंग गोकार्ट छात्रों के छह महीने के सहयोगात्मक प्रयास और राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की महत्वाकांक्षा के कारण साकार हुआ. • प्रतियोगिता की तैयारी: छात्रों ने कोल्हापुर में होने वाली इंडियन कार्टिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए इस वाहन का निर्माण किया. राष्ट्रीय स्तर के मंच पर कॉलेज का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा ने इस पूरी परियोजना को गति दी. • किफायती नवाचार: बाजार में मौजूद गोकार्ट कारों की तीन से चार लाख रुपये की भारी लागत के विकल्प के रूप में छात्रों ने सेकंड हैंड बाइक इंजन चुना. इस कदम से पूरी निर्माण लागत घटकर सीधे 1.50 लाख रुपये पर आ गई. • अंतर-शहरीय कलपुर्जा आपूर्ति: जबलपुर में विशेष पार्ट्स न मिलने के कारण टीम ने दिल्ली, पुणे और इंदौर से सामान मंगाया. विभिन्न शहरों से फ्रेम पाइप, सुरक्षा उपकरण और टायर जुटाकर असेंबलिंग पूरी की गई. सवाल-जवाब 1. यह रेसिंग कार किस कॉलेज के छात्रों ने बनाई है? इस गोकार्ट रेसिंग कार को मध्य प्रदेश के जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने बनाया है. 2. इस रेसिंग कार को बनाने में कितनी लागत आई है? इस कार को बनाने में कुल 1.50 लाख रुपये की लागत आई है, जबकि बाजार में ऐसी कारें 3 से 4 लाख रुपये में मिलती हैं. 3. इस गोकार्ट की अधिकतम गति कितनी है? यह रेसिंग कार 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक दौड़ने में सक्षम है. 4. कार में किस वाहन का इंजन इस्तेमाल किया गया है? छात्रों ने इसमें सेकंड हैंड पल्सर 150 बाइक के पेट्रोल इंजन का उपयोग किया है. 5. इसे बनाने में कितना समय लगा और टीम में कितने छात्र शामिल थे? इस रेसिंग कार को 30 विद्यार्थियों की टीम ने मिलकर छह महीने में तैयार किया है. 6. कार के पार्ट्स किन शहरों से मंगवाए गए हैं? इसके टायर इंदौर से, चेचिस और फ्रेम पाइप दिल्ली से और सेफ्टी गियर पुणे से मंगाए गए हैं. 7. छात्र इस कार को किस प्रतियोगिता में ले जाने वाले हैं? छात्र इसे महाराष्ट्र के कोल्हापुर में आयोजित होने वाली इंडियन कार्टिंग चैंपियनशिप में ले जाएंगे. प्रेरणा और सबक जबलपुर के छात्रों का यह प्रयास साबित करता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद लगन और सही योजना से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं. • सीमित बजट में बड़ा नवाचार: बाजार की महंगी कारों पर निर्भर रहने के बजाय छात्रों ने कबाड़ या पुराने पार्ट्स का इस्तेमाल कर लागत आधी से भी कम कर दी. समझदारी भरी योजना किसी भी वित्तीय बाधा को पार कर सकती है. • टीमवर्क की ताकत: छह महीने तक 30 छात्रों ने मिलकर काम किया और सभी बाधाओं को दूर किया. सामूहिक प्रयास जटिल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक पूरा करने की कुंजी है. • समस्या का व्यावहारिक समाधान: स्थानीय बाजार में पार्ट्स न मिलने पर छात्रों ने हार नहीं मानी और कई शहरों से आवश्यक सामग्री मंगाई. दृढ़ संकल्प और वैकल्पिक रास्तों की खोज सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है. https://trendkia.com/auto/purani-pulsar-ke-injana-se-jabalpur-ke-chhatron-ne-banai-formula-staila-resinga-kara-44885 TrendKia — Har trend, sabse pehle.