भारत के बढ़ते ऑटो बाजार में क्यों पिछड़ रही हैं स्कोडा, फॉक्सवैगन, रेनो और सिट्रोएन की गाड़ियां? भारत का पैसेंजर व्हीकल बाजार तेजी से बढ़ रहा है और रिकॉर्ड बिक्री दर्ज कर रहा है, लेकिन स्कोडा, फॉक्सवैगन, रेनो और सिट्रोएन जैसे यूरोपीय ब्रांड्स की बाजार हिस्सेदारी लगातार घटती जा रही है। भारत का पैसेंजर व्हीकल बाजार इन दिनों जोरदार रफ्तार से आगे बढ़ रहा है और नए मुकाम हासिल कर रहा है। देश में एसयूवी की मांग आसमान छू रही है, ग्राहक आधुनिक तकनीक और बेहतरीन फीचर्स से लैस गाड़ियां पसंद कर रहे हैं, और ऑटो कंपनियां लगातार नए मॉडल बाजार में उतार रही हैं। लेकिन इस तेजी से फैलते और फलते-फूलते बाजार में चार प्रमुख यूरोपीय मास-मार्केट ब्रांड्स की कहानी बिल्कुल उलट दिशा में जा रही है। स्कोडा, फॉक्सवैगन, रेनो और सिट्रोएन ने भारत में स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाया, नए उत्पाद पेश किए और एसयूवी सेगमेंट में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की पूरी कोशिश की। इसके बावजूद इन चारों ब्रांड्स की कुल बिक्री और बाजार हिस्सेदारी में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश का कार बाजार तो बड़े पैमाने पर फैला, लेकिन इन कंपनियों का हिस्सा उस बढ़ती हुई पाई में लगातार सिमटता चला गया। बाजार बढ़ा लेकिन बिक्री और हिस्सेदारी दोनों घटी वित्तीय वर्ष 2023 में भारत में कुल पैसेंजर व्हीकल की बिक्री का आंकड़ा लगभग 38.90 लाख यूनिट्स पर था। वित्तीय वर्ष 2026 तक आते-आते यह बढ़कर 46.43 लाख यूनिट्स के स्तर पर पहुंच गया। इसका मतलब यह हुआ कि महज तीन साल के भीतर देश के ऑटो बाजार में करीब 7.5 लाख अतिरिक्त कारों की बिक्री जुड़ गई और कुल बाजार में लगभग 19 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई। लेकिन ठीक इसी समयावधि के दौरान स्कोडा, फॉक्सवैगन, रेनो और सिट्रोएन की संयुक्त बिक्री 1.82 लाख यूनिट्स से फिसलकर महज 1.65 लाख यूनिट्स पर सिमट गई। इस गिरावट का सीधा असर इन सभी कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी पर पड़ा। वित्तीय वर्ष 2023 में इन चारों की कुल संयुक्त हिस्सेदारी 4.67 प्रतिशत थी, जो वित्तीय वर्ष 2026 में घटकर केवल 3.55 प्रतिशत रह गई। इस तरह जिस भारतीय बाजार में नए अवसर और ग्राहक लगातार बढ़ रहे थे, वहां इन विदेशी कंपनियों की पकड़ मजबूत होने के बजाय कमजोर होती चली गई। एसयूवी सेगमेंट में पिछड़ने की मुख्य वजह भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार की दिशा और दशा तय करने में एसयूवी सेगमेंट की भूमिका सबसे अहम हो चुकी है। वित्तीय वर्ष 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में कॉम्पैक्ट एसयूवी की बिक्री लगभग 11.95 लाख यूनिट्स दर्ज की गई। यह कुल एसयूवी बिक्री का करीब 44.76 प्रतिशत और पूरे पैसेंजर व्हीकल बाजार का 25.39 प्रतिशत हिस्सा था। साफ है कि अगर किसी भी कंपनी को भारत के विशाल बाजार में बड़ी मात्रा में गाड़ियां बेचनी हैं, तो उसका एसयूवी पोर्टफोलियो बेहद मजबूत होना अनिवार्य है। यहीं पर यूरोपीय ब्रांड्स सबसे ज्यादा कमजोर साबित होते हैं। फॉक्सवैगन और सिट्रोएन के पास फिलहाल कोई भी कॉम्पैक्ट एसयूवी मौजूद नहीं है, जबकि स्कोडा के पोर्टफोलियो में काइलैक और रेनो के पास काइगर उपलब्ध है। प्रमुख मॉडलों की बिक्री के आंकड़े अप्रैल से जुलाई के दौरान वित्तीय वर्ष 2027 में स्कोडा काइलैक की बिक्री 15,289 यूनिट्स रही। इसी समान अवधि में टाटा नेक्सॉन की बिक्री 73,032 यूनिट्स, मारुति सुजुकी ब्रेजा की 49,543 यूनिट्स और हुंडई वेन्यू की 46,005 यूनिट्स तक पहुंच गई। दूसरी ओर रेनो काइगर इस दौरान केवल 2,575 यूनिट्स ही बेच पाई। इससे साफ पता चलता है कि जिस सेगमेंट में देश के सबसे ज्यादा ग्राहक मौजूद हैं, वहां यूरोपीय ऑटो कंपनियां अभी तक उस बड़े पैमाने पर बिक्री के आंकड़े को छूने में नाकाम साबित हो रही हैं। मिड-साइज एसयूवी बाजार का हाल मिड-साइज एसयूवी सेगमेंट भी अब भारतीय कार बाजार का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन चुका है, जिसमें स्कोडा कुशाक, फॉक्सवैगन टाइगुन और रेनो डस्टर जैसी गाड़ियां मुकाबला करती हैं। अप्रैल से जुलाई वित्तीय वर्ष 2027 के दौरान टाइगुन की बिक्री 5,231 यूनिट्स, डस्टर की 5,149 यूनिट्स और कुशाक की 4,986 यूनिट्स दर्ज की गई। इसके अलावा सिट्रोएन की बासाल्टएक्स और एयरक्रॉसएक्स ने मिलकर केवल 413 यूनिट्स का योगदान दिया। इन सभी पांच यूरोपीय मॉडलों की कुल बिक्री जोड़ ली जाए तो यह आंकड़ा लगभग 15,779 यूनिट्स बैठता है। इसके मुकाबले केवल हुंडई क्रेटा ने इसी समान अवधि में अकेले 55,782 यूनिट्स बेच डालीं, जबकि मारुति सुजुकी विक्टोरिस की बिक्री 45,923 और किया सेल्टोस की 43,358 यूनिट्स रही। इन आंकड़ों से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि समस्या सिर्फ यह नहीं है कि यूरोपीय कंपनियों की गाड़ियां एसयूवी सेगमेंट में मौजूद नहीं हैं, बल्कि असली समस्या यह है कि उनकी बिक्री का पैमाना भारतीय बाजार के हिसाब से बहुत छोटा है। पचास प्रतिशत से ज्यादा लोकलाइजेशन के बावजूद क्यों नहीं मिल रहा फायदा? अगर यह माना जाए कि विदेशी कार होने की वजह से ग्राहकों को झिझक है, तो कंपनियों ने गाड़ियों का स्थानीयकरण यानी लोकलाइजेशन क्यों नहीं बढ़ाया? हकीकत यह है कि इन कंपनियों ने ऐसा किया भी है। रेनो का दावा है कि भारत में उसके स्थानीय स्तर पर उत्पादित होने वाले वाहनों में पंचानवे प्रतिशत से ज्यादा लोकलाइजेशन है। इसी तरह स्कोडा की काइलैक, कुशाक और स्लाविया तथा फॉक्सवैगन की टाइगुन और वर्टस भारत के लिए खास तौर पर तैयार किए गए एमक्यूबी-एओ-आईएन प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं और इनमें भी करीब पंचानवे प्रतिशत लोकलाइजेशन किया गया है। इसके बावजूद सिर्फ लोकलाइजेशन होने मात्र से बड़ी संख्या में गाड़ियां बिकने की गारंटी नहीं मिल जाती। कोई भी कार भले ही देश के भीतर ही तैयार की गई हो, लेकिन ग्राहक उसे तभी खरीदेगा जब उसकी कीमत, फीचर्स, आफ्टर-सेल्स सर्विस, माइलेज, रीसेल वैल्यू और ब्रांड पर भरोसा हर लिहाज से खरा उतरेगा। यही वह मोर्चा है जहां यूरोपीय ब्रांड्स को अभी काफी लंबा सफर तय करना बाकी है। कुछ चुनिंदा मॉडलों पर अत्यधिक निर्भरता इन विदेशी कंपनियों के उत्पाद पोर्टफोलियो का गहराई से विश्लेषण करने पर एक और बड़ी कमजोरी खुलकर सामने आती है। स्कोडा, फॉक्सवैगन और सिट्रोएन भारत के बाजार में पांच-पांच मॉडल पेश करते हैं, जबकि रेनो के पास कुल चार मॉडल उपलब्ध हैं। हालांकि इन सभी का पूरा पोर्टफोलियो एक समान ताकत के साथ बाजार में नहीं बिकता है। अप्रैल से जुलाई वित्तीय वर्ष 2027 के दौरान फॉक्सवैगन की घरेलू बिक्री का छियानवे दशमलव चार प्रतिशत हिस्सा अकेले वर्टस और टाइगुन से आया। वहीं स्कोडा के मामले में काइलैक, कुशाक और स्लाविया ने मिलकर संतानवे दशमलव आठ प्रतिशत बिक्री का योगदान दिया। यानी अगर इनमें से कुछ चुनिंदा मॉडलों की बिक्री में जरा भी कमजोरी आती है, तो पूरी कंपनी के बिजनेस पर इसका सीधा असर पड़ता है। इसके ठीक विपरीत, भारत के बाजार में मजबूत पकड़ रखने वाली बड़ी कंपनियों के पास अलग-अलग कीमत और श्रेणियों में बेहद व्यापक पोर्टफोलियो मौजूद होता है। आज का भारतीय ग्राहक पूरा पैकेज तलाश रहा है आज का दौर बदल चुका है और भारतीय कार खरीदार केवल किसी गाड़ी का डिजाइन या इंजन देखकर फैसला नहीं लेता। पांच साल बाद इस्तेमाल करने के बाद उनकी गाड़ी बाजार में कितने दाम पर बिकेगी, यह सवाल भी बहुत मायने रखता है। इस बारे में विशेषज्ञों से बातचीत करने पर यह बात सामने आती है कि भारतीय बाजार में लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए केवल एक अच्छी गाड़ी का निर्माण करना ही काफी नहीं है। ऑटो कंपनियों को बेहद आक्रामक कीमतें रखनी होंगी, स्थानीय उत्पादन को और बढ़ाना होगा, एक मजबूत एसयूवी पोर्टफोलियो तैयार करना होगा और अपना बिक्री व सर्विस नेटवर्क काफी फैलाना होगा। इसका मतलब साफ है कि आज के ग्राहक का भरोसा केवल शोरूम में जाकर गाड़ी की चमक-दमक देखने से नहीं बनता, बल्कि वह गाड़ी खरीदने के बाद मिलने वाले पूरे ओनरशिप एक्सपीरियंस को परखता है। सुरक्षा और तकनीक पर बढ़ रहा है ग्राहकों का जोर एक बड़े सर्वे में शामिल हुए हजारों लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह बात सामने आई कि दो-तिहाई से ज्यादा लोग एसयूवी को अपनी सबसे पसंदीदा बॉडी स्टाइल मानते हैं। इसके अलावा एक तिहाई से ज्यादा लोगों के लिए सुरक्षा किसी भी गाड़ी को खरीदने का सबसे महत्वपूर्ण कारक था, जबकि अधिकांश लोगों ने टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन यानी आधुनिक तकनीकी फीचर्स को अपनी प्राथमिकता सूची में रखा। इन तमाम बातों से यह शीशे की तरह साफ हो जाता है कि भारतीय कार खरीदार की पसंद और प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। उसे एसयूवी चाहिए, मजबूत सुरक्षा मानक चाहिए, कनेक्टेड फीचर्स चाहिए और ऐसी गाड़ी चाहिए जिसका रखरखाव और मालिकाना हक बेहद आसान हो। हालांकि इन तमाम चुनौतियों के बावजूद सबसे दिलचस्प और गौर करने वाली बात यह है कि ये यूरोपीय कंपनियां फिलहाल भारत के बाजार से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर पीछे हटने की कोई तैयारी नहीं कर रही हैं। इसका आप पर असर भारत में: देश का पैसेंजर व्हीकल बाजार और एसयूवी सेगमेंट लगातार बढ़ रहा है, जिसका सीधा फायदा मारुति, टाटा और हुंडई जैसी कंपनियों को मिल रहा है, जबकि यूरोपीय ब्रांड्स अपनी कम बिक्री के कारण संघर्ष कर रहे हैं। सवाल-जवाब 1. भारत में किन यूरोपीय ब्रांड्स की बिक्री और बाजार हिस्सेदारी घटी है? स्कोडा, फॉक्सवैगन, रेनो और सिट्रोएन की संयुक्त बिक्री और बाजार हिस्सेदारी में गिरावट दर्ज की गई है। 2. वित्तीय वर्ष 2023 से 2026 के बीच कुल पैसेंजर व्हीकल बाजार कितना बढ़ा? इस अवधि के दौरान कुल पैसेंजर व्हीकल बाजार करीब 19 प्रतिशत बढ़कर 38.90 लाख यूनिट्स से 46.43 लाख यूनिट्स हो गया। 3. यूरोपीय ब्रांड्स के पास किस लोकप्रिय सेगमेंट में गाड़ियों की कमी है? फॉक्सवैगन और सिट्रोएन के पास फिलहाल कॉम्पैक्ट एसयूवी सेगमेंट में कोई मॉडल उपलब्ध नहीं है। 4. अप्रैल-जुलाई FY27 के दौरान स्कोडा काइलैक की कुल कितनी बिक्री दर्ज की गई? इस अवधि में स्कोडा काइलैक की कुल 15,289 यूनिट्स बिकीं। https://trendkia.com/auto/why-are-skoda-volkswagen-renault-and-citroen-lagging-behind-despite-growing-car-sales-in-india-21898 TrendKia — Har trend, sabse pehle.