# हिंदी सिनेमा में छठ और लोक संस्कृति का बढ़ता दखल, रितेश पांडे ने बताई इसके पीछे की असली वजह

> फिल्म 'द वन' में छठ महापर्व के चित्रण पर गायक रितेश पांडे ने कहा कि यह कोई सांस्कृतिक बदलाव नहीं बल्कि दर्शकों को खींचने की व्यावसायिक मजबूरी है।

**Type:** article · **Category:** भोजपुरी · **Published:** 2026-09-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bhojpuri/hindi-sinema-men-chhatha-aura-loka-snskriti-ka-barhata-dakhala-ritesh-pandey-ne-batai-isake-pichhe-ki-asali-vajaha-38570 · **Language:** Hindi
**Tags:** रितेश पांडे, द वन, छठ महापर्व, भोजपुरी सिनेमा, छठी मैया, मनोज तिवारी, रवि किशन, बॉलीवुड

सिनेमा जगत में क्षेत्रीय परंपराओं और लोकपर्वों को लेकर एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। बड़े पर्दे पर रिलीज हुई नई फिल्म 'द वन' (The Vvan) में पहली बार आस्था के महापर्व छठ और छठी मैया के पूजन को प्रमुखता से दर्शाया गया है। अमूमन हिंदी फिल्मों में करवाचौथ, दिवाली या होली जैसे त्योहारों को भव्य अंदाज में दिखाया जाता रहा है, लेकिन पूर्वांचल और बिहार की गहरी आस्था से जुड़े छठ पर्व को किसी बड़ी हिंदी फिल्म में मुख्य केंद्र बनाना अपने आप में एक अनोखी पहल मानी जा रही है। इस नए चलन पर भोजपुरी संगीत और सिनेमा जगत के चर्चित कलाकार रितेश पांडे ने खुलकर अपने विचार रखे हैं।

## सांस्कृतिक बदलाव नहीं, व्यावसायिक मजबूरी है यह कदम
जब मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में भोजपुरी संस्कृति, संगीत, छठ पर्व और वहां के कलाकारों को शामिल करने के रुझान पर चर्चा हुई, तो रितेश पांडे ने इसे किसी भावनात्मक बदलाव के बजाय सीधे तौर पर व्यावसायिक जरूरत करार दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कोई बदलाव नहीं है, बल्कि उनकी जरूरत है। उनके अनुसार बाजार की मांग ही किसी भी उद्योग की दिशा तय करती है, और जब निर्माताओं को यह समझ आता है कि किसी खास संस्कृति या क्षेत्र के तत्वों को जोड़ने से फिल्में अधिक मुनाफा कमा सकती हैं, तो वे उसी रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।

रितेश पांडे ने इस बात को विस्तार से समझाते हुए कहा कि जरूरत इंसान और उद्योग से सब कुछ करवाती है। उन्होंने रेखांकित किया कि इन प्रयोगों के जरिए फिल्मों को ज्यादा दर्शक और व्यूज मिल रहे हैं, जिसके चलते लोग टिकट खिड़की तक खींचे चले आ रहे हैं। यही मुख्य वजह है कि अब मुंबई के फिल्म निर्माता भोजपुरी कलाकारों, गायकों और वहां की लोककथाओं को अपनी परियोजनाओं में शामिल करने के लिए लगातार आमंत्रित कर रहे हैं।

## पंजाबी दौर से भोजपुरी की ओर मुड़ता सिनेमा का पहिया
भारतीय सिनेमा के ऐतिहासिक रुझानों का हवाला देते हुए रितेश पांडे ने एक बेहद सटीक तुलना पेश की। उन्होंने याद दिलाया कि एक समय ऐसा था जब हिंदी फिल्मों में पंजाबी संगीत, गायकों और पृष्ठभूमि को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता था। उस दौर में ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उस समय उन कलाकारों और उस शैली से फिल्मों को भारी व्यूज और सफलता मिल रही थी। आज दर्शक वर्ग की पसंद बदल रही है और हिंदी पट्टी की क्षेत्रीय पहचान को नया मंच मिल रहा है।

रितेश पांडे ने कहा कि भले ही इसके पीछे कारोबारी हित हों, लेकिन यह समूचे भोजपुरी समाज और सिनेमा के लिए बेहद सुखद संकेत है। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि छठी मैया पर फिल्म बनना और उस संस्कृति को बड़े कैनवास पर उतारा जाना गर्व की बात है। यह हमारी समृद्ध परंपरा और संस्कारों का वास्तविक सम्मान है, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारा जा रहा है।

## संसद से विधानसभा तक भोजपुरी कलाकारों की मजबूत धाक
सिनेमाई पर्दे के अलावा रितेश पांडे ने राजनीति और देश के शीर्ष नीति-निर्धारक मंचों पर भोजपुरी कलाकारों की बढ़ती धमक पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने देश की संसद का जिक्र करते हुए कहा कि जहां से यह पूरा देश संचालित होता है, वहां भोजपुरी जगत के प्रतिनिधि मौजूद हैं। इस क्रम में उन्होंने बड़े भाई मनोज तिवारी, बड़े भैया रवि किशन और दिनेश यादव का नाम लिया, जिन्होंने इन सर्वोच्च मंचों पर अपनी आवाज बुलंद की है।

राजनीतिक परिदृश्य में भोजपुरी हस्तियों के प्रभाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने बिहार विधानसभा का भी उल्लेख किया। उन्होंने गर्व के साथ बताया कि भोजपुरी क्षेत्र से जुड़े बड़े भैया पप्पू सिंह बिहार में विधायक के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कला जगत से निकलकर शासन और राजनीति के शीर्ष पर पहुंचना पूरे भोजपुरी समुदाय के लिए एक बड़ी उपलब्धि और गौरव का विषय है।

## आने वाले दिनों में लोक संस्कृति की कई और झलकियां
छठ पर्व की भव्यता को पेश करने वाली फिल्म 'द वन' के सिनेमाघरों में आने के बाद दर्शकों के सामने जल्द ही इसी तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर आधारित और भी कहानियां आने वाली हैं। इसी कड़ी में आयुष्मान खुराना और शरवरी वाद्य की आगामी फिल्म 'यह प्रेम मोल लिया' भी कतार में है, जो 27 नवंबर के दिन सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तय की गई है। बड़े सितारों की फिल्मों में इस तरह के जमीनी विषयों का आना यह साबित करता है कि दर्शक अब अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियों को बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं।

## इसका आप पर असर
सिनेमा और मनोरंजन जगत में लोकसंस्कृति के प्रवेश का असर दर्शकों की पसंद और टिकट खिड़की के रुझानों पर साफ नजर आता है।

- **पूर्वांचल और बिहार के दर्शकों के लिए:** अपनी आस्था और लोकपरंपराओं को बड़े पर्दे पर देखना क्षेत्रीय दर्शकों के लिए एक बड़ा सम्मान है। इससे नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़ने और बड़े सिनेमाघरों में खुद की कहानियों को देखने का अवसर मिलता है।
- **मनोरंजन उद्योग के कलाकारों के लिए:** मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में क्षेत्रीय कला और गायकों के लिए नए रोजगार और काम के बड़े अवसर खुल रहे हैं। निर्माताओं द्वारा क्षेत्रीय संगीत को अपनाने से जमीनी कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान मिल रही है।
- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** दर्शकों को घिसे-पिटे पारिवारिक फॉर्मूलों के बजाय नई और प्रामाणिक सांस्कृतिक कहानियां देखने को मिलेंगी। इससे बॉक्स ऑफिस पर विविध विषयों और परंपराओं पर आधारित फिल्में देखने का विकल्प मिलेगा।
- **सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार के लिए:** छठ महापर्व जैसे पारंपरिक त्योहारों की महत्ता पूरे देश और दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचेगी। इससे राष्ट्रीय स्तर पर लोक पर्वों के प्रति जागरूकता और सम्मान में इजाफा होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
फिल्म उद्योग में भोजपुरी संगीत, कलाकारों और छठ जैसे पावन पर्वों को शामिल करने के पीछे गहरे व्यावसायिक और सामाजिक कारण काम कर रहे हैं।

- **दर्शकों की संख्या और राजस्व बढ़ाने की चाह:** हिंदी पट्टी के विशाल दर्शक वर्ग को सिनेमाघरों तक आकर्षित करने के लिए निर्माताओं को प्रामाणिक क्षेत्रीय विषयों की सख्त आवश्यकता है। जब इन विषयों और कलाकारों को जोड़ने से फिल्मों को अधिक व्यूज और टिकट बिक्री मिलने लगती है, तो निर्माता स्वाभाविक रूप से इस ओर रुख करते हैं।
- **पंजाबी संगीत के दौर जैसा बदलाव:** जिस प्रकार एक दौर में पंजाबी बीट्स और गायकों की बदौलत फिल्मों को अपार लोकप्रियता मिली, उसी तरह अब भोजपुरी संस्कृति मनोरंजन का नया आकर्षण बन चुकी है। बाजार का यह चक्र हमेशा उस भाषा और शैली की तरफ झुकता है जिसकी जनता में सबसे ज्यादा मांग होती है।
- **क्षेत्रीय कलाकारों की राष्ट्रीय स्वीकार्यता:** भोजपुरी जगत से जुड़े कई दिग्गज कलाकार देश की राजनीति और संसद तक पहुंचे हैं, जिससे इस संस्कृति का रुतबा बढ़ा है। इस व्यापक सामाजिक प्रभाव ने बड़े स्टूडियोज को इन क्षेत्रीय परंपराओं को सम्मान देने के लिए प्रेरित किया है।

## सवाल-जवाब

### 1. फिल्म 'द वन' में किस पारंपरिक पर्व को दर्शाया गया है?
इस फिल्म में पहली बार बड़े पर्दे पर लोक आस्था के महापर्व छठ और छठी मैया की पूजा-अर्चना को प्रमुखता से दिखाया गया है।

### 2. बॉलीवुड में भोजपुरी कलाकारों की मांग पर रितेश पांडे ने क्या कहा?
रितेश पांडे ने कहा कि यह कोई सांस्कृतिक बदलाव नहीं बल्कि व्यावसायिक जरूरत है, क्योंकि इससे फिल्मों को ज्यादा व्यूज और दर्शक मिलते हैं।

### 3. रितेश पांडे ने भोजपुरी के दौर की तुलना किस इंडस्ट्री से की?
उन्होंने इसकी तुलना पंजाबी इंडस्ट्री से की, जिनके कलाकारों को पहले फिल्मों में ज्यादा व्यूज और लोकप्रियता हासिल करने के लिए बुलाया जाता था।

### 4. रितेश पांडे ने राजनीति में किन भोजपुरी कलाकारों का उदाहरण दिया?
उन्होंने देश की संसद में बैठने वाले मनोज तिवारी, रवि किशन और पूर्व में रहे दिनेश यादव के साथ-साथ बिहार के विधायक पप्पू सिंह का उदाहरण दिया।

### 5. आयुष्मान खुराना की अगली फिल्म 'यह प्रेम मोल लिया' कब रिलीज हो रही है?
आयुष्मान खुराना और शरवरी वाद्य अभिनीत यह फिल्म 27 नवंबर के दिन सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।

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