बांग्लादेश के साथ गंगा जल समझौते के नवीनीकरण से पहले बिहार ने उठाई मांग, 2050 तक की जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन करने की सिफारिश भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुआ 30 साल का फरक्का जल समझौता दिसंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। इसके नवीनीकरण से पहले बिहार ने राज्य की पेयजल और सिंचाई आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से मूल्यांकन की मांग की है। गंगा नदी के पानी के न्यायसंगत वितरण को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच तीन दशक पहले हुआ ऐतिहासिक समझौता अपनी सीमा पूरी करने के करीब है। 12 दिसंबर 2026 को इस 30 वर्षीय द्विपक्षीय संधि की म्याद खत्म हो रही है। इस अहम मोड़ पर बिहार की ओर से एक मजबूत मांग सामने आई है, जिसमें केंद्र सरकार से यह आग्रह किया गया है कि पुरानी शर्तों के आधार पर इस समझौते का हुबहू नवीनीकरण न किया जाए। इसके बजाय, गंगा बेसिन पर बसे भारतीय राज्यों की वर्ष 2050 तक की अनुमानित पानी की जरूरतों का नया वैज्ञानिक आकलन कराया जाए। राज्य का मानना है कि पिछले 30 वर्षों में जमीनी और पारिस्थितिक स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं, इसलिए किसी भी नए करार से पहले बिहार के दीर्घकालिक जल हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 30 साल पुराने समझौते की म्याद और गंगा बेसिन का संकट भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को गंगा जल बंटवारा संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते का मुख्य केंद्र बिंदु पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज पर जल का प्रवाह और उसका विभाजन तय करना रहा है। इस व्यवस्था के अंतर्गत हर वर्ष 1 जनवरी से 31 मई तक चलने वाले कम प्रवाह वाले मौसम यानी शुष्क काल के दौरान दोनों देशों के बीच तयशुदा फॉर्मूले के तहत पानी का वितरण किया जाता है। इस पूरे तंत्र की निगरानी दोनों देशों के अधिकारियों की एक संयुक्त समिति द्वारा की जाती है। समझौते के अनुच्छेद XII में स्पष्ट प्रावधान है कि इसकी कुल परिचालन अवधि 30 वर्षों की होगी और दोनों पक्षों की आपसी सहमति से इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। वर्ष 2026 का अंत भारत और बांग्लादेश के बीच जल कूटनीति के नजरिए से अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक माना जा रहा है। हालांकि, बिहार के प्रतिनिधि तंत्र और विशेषज्ञों का तर्क है कि 1996 में जब यह व्यवस्था आकार ले रही थी, तब उच्च बेसिन वाले राज्यों की भविष्य की मांगों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया था। बिहार के बदलते जल परिदृश्य और 2,050 तक का विज़न राज्यसभा में जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद संजय कुमार झा ने बिहार के जल संकट को प्रमुखता से रेखांकित किया। उनका कहना है कि तीन दशक पूर्व जिस जल उपलब्धता को आधार मानकर फॉर्मूला तय किया गया था, वह आज के जमीनी यथार्थ से मेल नहीं खाता। खासतौर पर दक्षिण बिहार के जिलों में भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है, जिसके कारण पेयजल आपूर्ति और कृषि सिंचाई के लिए गंगा के सतही जल पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। इसी पृष्ठभूमि में बिहार सरकार ने यह प्रस्ताव रखा है कि गंगा बेसिन के सभी राज्यों की वर्ष 2050 तक की जल जरूरतों का एक व्यापक और वैज्ञानिक अध्ययन होना अनिवार्य है। आकलन के अनुसार, बिहार को अपनी बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि गतिविधियों को बनाए रखने के लिए भविष्य में कम से कम 2,000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होगी। यदि इस भावी आवश्यकता को दरकिनार कर दिया गया, तो आने वाले दशकों में राज्य के सामने गंभीर जल संकट उत्पन्न हो सकता है। 2,000 क्यूसेक बनाम 900 क्यूसेक: पानी के आंकडे़ और सिफारिशें बिहार की पानी की मांग को लेकर दो अलग-अलग आंकड़े चर्चा में रहे हैं। एक तरफ जहां बिहार सरकार के अपने व्यापक आकलन के आधार पर संसद में 2,000 क्यूसेक अतिरिक्त जल की मांग रखी गई है, वहीं दूसरी तरफ वर्ष 2026 में सामने आई एक रिपोर्ट कुछ अलग आंकड़े दर्शाती है। फरक्का समझौते की समीक्षा के लिए गठित एक आंतरिक समिति ने शुष्क मौसम के दौरान बिहार की तात्कालिक पेयजल और औद्योगिक प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए 900 क्यूसेक पानी आवंटित करने की सिफारिश की है। मांग और आधिकारिक सिफारिश के बीच मौजूद यह 1,100 क्यूसेक का अंतर इस बात को साबित करता है कि विषय पर अभी अधिक गहराई से अध्ययन की जरूरत है। विश्लेषकों का मानना है कि केवल अल्पकालिक औद्योगिक जरूरतों को देखना नाकाफी होगा। बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए सिंचाई और घटते भूजल स्तर के पुनर्भरण को ध्यान में रखकर ही अंतिम आवंटन तय किया जाना चाहिए। फरक्का बैराज, गाद समस्या और उत्तर-दक्षिण बिहार का दोहरा संकट प्रसिद्ध भूगोलविद प्रो आरबी सिंह के अनुसार, फरक्का बैराज का प्राथमिक निर्माण हुगली नदी में पर्याप्त पानी भेजकर कोलकाता पोर्ट की नौवहन क्षमता को बनाए रखने के लिए किया गया था। लेकिन 12 दिसंबर 1996 को तात्कालिक यूपीए सरकार के शासनकाल के दौरान जो जल बंटवारा समझौता लागू हुआ, उसने बिहार की जल सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाला। शुष्क महीनों में जब नदी का कुल प्रवाह घट जाता है, तब बिहार के ऊपरी इलाकों को पानी की अत्यधिक कमी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा बिहार को एक ही समय में दो विपरीत प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। उत्तर बिहार का एक बड़ा क्षेत्र हर साल विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आता है, जबकि दक्षिण बिहार के अनेक हिस्से ग्रीष्मकाल में भयंकर सूखे और पेयजल किल्लत से जूझते हैं। फरक्का बैराज के अपस्ट्रीम में भारी मात्रा में गाद जमा होने की समस्या ने गंगा नदी की जल धारण क्षमता को कम कर दिया है। इससे बाढ़ के दौरान पानी का फैलाव बढ़ता है और शुष्क मौसम में पानी का बहाव अवरुद्ध होता है। बिहार लगातार यह आवाज उठाता रहा है कि गाद प्रबंधन और जल भंडारण की नई नीतियां बनाई जाएं ताकि बाढ़ के पानी का उपयोग सूखे के दिनों में किया जा सके। कूटनीतिक मंथन, तकनीकी आकलन और भविष्य का रास्ता फरवरी 2026 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि भारत और बांग्लादेश के बीच समझौते के नवीनीकरण को लेकर आधिकारिक द्विपक्षीय बातचीत औपचारिक रूप से शुरू नहीं हुई थी। हालांकि, इसके बाद नदी में पानी के वास्तविक प्रवाह और जमीनी परिस्थितियों का तकनीकी मूल्यांकन करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस समझौते के पुनर्मूल्यांकन को लेकर बहस तेज हुई है। भारतीय विश्व मामलों की परिषद ने वर्ष 2026 में अपने आकलन में कहा है कि जलवायु परिवर्तन और बदलती हाइड्रोलॉजी के कारण तीन दशक पुराने ढांचे की समीक्षा करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। बारिश के ढर्रे में आ रहे बदलाव, हिमनदों के पिघलने की दर और तापमान में वृद्धि जैसे कारक गंगा के प्रवाह को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में फरक्का समझौते का नवीनीकरण केवल दो देशों के बीच कूटनीतिक औपचारिकता भर नहीं हो सकता। इसमें बिहार समेत सभी बेसिन राज्यों के जल अधिकारों और 2050 तक की वैज्ञानिक जरूरतों को शामिल करना ही एक स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है। इसका आप पर असर • भारत में: भारत-बांग्लादेश के बीच जल कूटनीति और गंगा बेसिन प्रबंधन की नीतियां प्रभावित होंगी, जिससे सीमापार नदियों के न्यायसंगत बंटवारे पर असर पड़ेगा। • बिहार में: 2050 तक की पेयजल और सिंचाई आवश्यकताओं का नया आकलन स्वीकृत होने से दक्षिण बिहार में भूजल स्तर में सुधार और कृषि जल सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। सवाल-जवाब 1. फरक्का जल समझौता कब हुआ था और इसकी अवधि कितनी है? यह समझौता भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को हुआ था और इसकी अवधि 30 वर्ष है, जो 12 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रही है। 2. संजय कुमार झा ने केंद्र सरकार से क्या मांग की है? उन्होंने मांग की है कि 1996 के समझौते को मौजूदा रूप में नवीनीकृत करने के बजाय वर्ष 2050 तक बिहार सहित गंगा बेसिन राज्यों की पानी की जरूरतों का नया वैज्ञानिक आकलन किया जाए। 3. बिहार को भविष्य की जरूरतों के लिए कितने अतिरिक्त पानी की आवश्यकता है? बिहार सरकार के आकलन के अनुसार भविष्य में 2,000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की आवश्यकता है, जबकि एक आंतरिक समीक्षा समिति ने शुष्क मौसम के लिए 900 क्यूसेक की सिफारिश की है। 4. फरक्का बैराज से बिहार में पानी की क्या समस्या पैदा हुई है? शुष्क मौसम के दौरान बिहार को पानी की कमी झेलनी पड़ती है, दक्षिण बिहार में भूजल स्तर गिर रहा है और अपस्ट्रीम में गाद जमा होने से बाढ़ व सूखे का दोहरा संकट बना रहता है। 5. क्या भारत और बांग्लादेश के बीच नवीनीकरण पर औपचारिक बातचीत शुरू हुई है? फरवरी 2026 में लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत शुरू नहीं हुई थी, हालांकि जल प्रवाह के तकनीकी आकलन की प्रक्रिया शुरू की गई थी। https://trendkia.com/bihar/bangladesh-ke-satha-gnga-jala-samajhaute-ke-navinikarana-se-pahale-bihar-ne-uthai-manga-2050-taka-ki-jaruraton-ka-vaijnanika-akala-15664 TrendKia — Har trend, sabse pehle.