बिहार के समस्तीपुर में बाढ़ का खौफ: पानी से घिरे टापू पर जिंदगी और मौत से जूझती महिलाओं की दर्दनाक कहानी बिहार के समस्तीपुर जिले में गंगा नदी के जलस्तर में वृद्धि के कारण दियारा क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं का जीवन नर्क बन जाता है। इस प्राकृतिक आपदा के दौरान घरों में पानी घुसने से शौच जाने, भोजन जुटाने और मवेशियों को बचाने जैसी बुनियादी जरूरतें भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती साबित होती हैं। बिहार के समस्तीपुर जिले के अंतर्गत आने वाला मोहनपुर प्रखंड हर साल एक भयानक प्राकृतिक आपदा का गवाह बनता है। यहां गंगा नदी के बीच बसा दियारा इलाका मॉनसून के दौरान पूरी तरह से एक जलमग्न टापू में तब्दील हो जाता है। चारों तरफ उफनती नदी का पानी घिर जाने के कारण यहां के निवासियों का जीवन ठहर सा जाता है। यह जलभराव केवल एक भौगोलिक समस्या नहीं है, बल्कि यह अपने साथ अनगिनत मुसीबतें लेकर आता है, जिनका सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक खामियाजा इस क्षेत्र की महिलाओं को उठाना पड़ता है। बाढ़ का पानी गांवों की पगडंडियों और घरों में प्रवेश करते ही जीवन की रफ्तार रुक जाती है और बाजार से संपर्क पूरी तरह कट जाता है। परिवार के लिए दो वक्त का भोजन और अन्य आवश्यक सामग्री जुटाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है। हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि कई परिवारों के पास एक या दो दिन तक अन्न का एक दाना नहीं होता और उन्हें लाचारी में भूखे पेट ही रातें गुजारनी पड़ती हैं। इसके साथ ही, बाढ़ के पानी के कारण सांप और बिच्छू जैसे जहरीले जीवों का घरों में घुसने का खतरा लगातार मंडराता रहता है, जिससे परिवार का हर सदस्य खौफ के साए में दिन रात गुजारता है। शौच और बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव दियारा इलाके की निवासी जीरा देवी इस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताती हैं कि बाढ़ के उन भयानक दिनों का वर्णन करना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन है। "पुरुष तो किसी न किसी तरह घर से बाहर जाकर अपनी जरूरतें पूरी कर लेते हैं," जीरा देवी कहती हैं। लेकिन महिलाओं के लिए स्थिति नर्क से भी बदतर हो जाती है। उनके सामने सबसे बड़ी और गंभीर समस्या शौच जाने की होती है। पूरे इलाके में कमर तक पानी भरा होने के कारण महिलाओं को दिन के उजाले में बाहर निकलने का कोई सुरक्षित स्थान नहीं मिलता। उन्हें अपनी इस बुनियादी जरूरत के लिए दिन भर पानी कम होने या रात के अंधेरे का इंतजार करना पड़ता है। पानी से घिरे होने के कारण यह पीड़ा कई हफ्तों तक बर्दाश्त करनी पड़ती है। जब घर का सारा राशन खत्म हो जाता है, तो भूख और बेबसी से जंग लड़नी पड़ती है। ऐसे कठिन समय में सरकारी मदद का इंतजार ही एकमात्र सहारा होता है, जो अक्सर नाकाफी साबित होता है。 राहत सामग्री वितरण में खामियां और व्यवस्था की विफलता सरकारी तंत्र की ओर से मिलने वाली राहत सामग्री की हकीकत भी काफी निराशाजनक है। सरकार द्वारा बांटे जाने वाले चूड़ा और सत्तू जैसे खाद्य पदार्थ हर जरूरतमंद व्यक्ति के हाथों तक नहीं पहुंच पाते हैं। उन घरों की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय होती है, जहां कमाने वाले पुरुष रोजगार की तलाश में बाहर गए होते हैं और पीछे केवल महिलाएं और मासूम बच्चे रह जाते हैं। कई समाजसेवी संस्थाएं बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए नावों में राशन लेकर आती हैं। लेकिन यह नाव पानी के बीच ही खड़ी रहती है और वहां तक पहुंचने के लिए लोगों को गहरे पानी से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में महिलाएं और छोटे बच्चे गहरे पानी में उतरकर राशन लाने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। इसके परिणामस्वरूप, कई बार उन्हें बिना किसी मदद के, खाली हाथ ही अपने घरों की ओर वापस लौटना पड़ता है। यह वितरण व्यवस्था महिलाओं की बेबसी को और अधिक बढ़ा देती है, जिससे उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है। चूल्हे का बुझना और राशन का खत्म होना सरसावा गांव की रहने वाली एक अन्य महिला कलसिया देवी इस त्रासदी को अपनी नियति मान चुकी हैं। उनका कहना है कि यह विकट संघर्ष अब उनके दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। कलसिया देवी बताती हैं कि सामान्य दिनों में भी गंगा नदी को पार करके बाजार से रोजमर्रा का राशन लाना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन जब बाढ़ का पानी पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लेता है, तो यह काम पूरी तरह से नामुमकिन हो जाता है। कलसिया देवी के अनुसार, बाढ़ के कारण घर में रखा जलाने वाला ईंधन पूरी तरह से भीग जाता है। चारों तरफ जलभराव होने की वजह से कई कई दिनों तक घरों में चूल्हा तक नहीं जल पाता है। जब खाना पकाने का कोई साधन नहीं बचता, तो परिवारों को सिर्फ सत्तू, चूड़ा या जो भी थोड़ा बहुत सूखा राशन घर में बचा होता है, उसी पर निर्भर रहना पड़ता है। महिलाओं और बच्चों की विशिष्ट परेशानियों को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली सरकारी योजनाओं का यहां पूरी तरह से अभाव दिखता है। हर साल बाढ़ इसी तरह कहर बरपाती है, लेकिन प्रशासन की तरफ से आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है。 मवेशियों का संकट और कच्चे मकानों का खौफ महिलाओं की चिंता सिर्फ अपने परिवार के भरण पोषण तक सीमित नहीं है। सुंदर देवी नामक एक और ग्रामीण महिला का कहना है कि बाढ़ के समय सबसे बड़ा संकट मवेशियों की जान बचाने को लेकर खड़ा होता है। जलस्तर बढ़ने के कारण गाय और भैंसों के लिए चारे का गंभीर संकट पैदा हो जाता है। इसके अलावा, लगातार हो रही मूसलाधार बारिश और उफनती नदी के बीच कच्चे घरों में रहना अपनी जान को दांव पर लगाने के बराबर है। सुंदर देवी ने बताया कि उनके पड़ोस के कई लोगों को सरकारी योजनाओं के तहत पक्के मकान मिल चुके हैं, लेकिन उन्हें आज तक पक्का घर नसीब नहीं हुआ है। कच्ची दीवारों के गिरने का डर हर पल सताता है और कई बार पूरे परिवार को भूखे प्यासे ही दिन बिताने पड़ते हैं। यह सिर्फ एक या दो घरों की कहानी नहीं है, बल्कि दियारा क्षेत्र में रहने वाले हजारों परिवारों की यही सच्ची दास्तान है। जब बाढ़ का पानी घट जाता है, तब भी वह डर, भूख और लाचारी की वह भयानक यादें इन महिलाओं के जेहन में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं और उनका मानसिक संघर्ष लंबे समय तक खत्म नहीं होता। इसका आप पर असर • भारत में: प्राकृतिक आपदाओं के समय महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष राहत नीतियों की कमी देश भर में एक गंभीर चिंता का विषय है। • बिहार में: समस्तीपुर और अन्य दियारा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को हर साल बाढ़ के कारण भारी आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं के नुकसान का सामना करना पड़ता है। सवाल-जवाब 1. बिहार में बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र कौन सा है? समस्तीपुर जिले के मोहनपुर प्रखंड से होकर गुजरने वाली गंगा नदी का दियारा क्षेत्र हर साल बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होता है। 2. बाढ़ के दौरान महिलाओं को सबसे बड़ी समस्या क्या होती है? महिलाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या शौच जाने की होती है, क्योंकि चारों तरफ पानी भरा होने के कारण उन्हें दिन भर पानी घटने या अंधेरे का इंतजार करना पड़ता है। 3. बाढ़ में राहत सामग्री महिलाओं तक क्यों नहीं पहुंच पाती? समाजसेवी संस्थाएं नाव से राहत सामग्री बांटती हैं, लेकिन गहरे पानी के कारण महिलाएं वहां तक नहीं पहुंच पातीं और खाली हाथ लौट आती हैं। 4. बाढ़ के समय लोगों को भूखा क्यों रहना पड़ता है? बाढ़ का पानी घरों में घुसने से जलाने वाला ईंधन भीग जाता है, जिससे चूल्हा नहीं जल पाता और परिवारों को सूखे राशन पर निर्भर रहना पड़ता है। https://trendkia.com/bihar/bihar-ke-samastipur-men-barha-ka-khaupha-pani-se-ghire-tapu-para-jindagi-aura-mauta-se-jujhati-mahilaon-ki-dardanaka-kahani-9172 TrendKia — Har trend, sabse pehle.