# बिहार समेत कई राज्यों में कटहल के बागों पर मंडराया सड़न रोग का खतरा, विशेषज्ञ ने बताए बचाव के 4 वैज्ञानिक उपाय

> अनियमित बारिश और जलभराव के कारण कटहल के पेड़ सूख रहे हैं। फल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के. सिंह ने जड़ सड़न से बचाने के लिए प्रभावी उपाय बताए हैं।

**Type:** article · **Category:** बिहार · **Published:** 2026-08-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bihar/bihar-sameta-kai-rajyon-men-katahala-ke-bagon-para-mndaraya-sarana-roga-ka-khatara-visheshajna-ne-batae-bachava-ke-4-vaijnanika-up-15356 · **Language:** Hindi
**Tags:** कटहल की खेती, पौधों की बीमारी, एस के सिंह, कृषि सलाह, जड़ सड़न रोग, बिहार कृषि

दरभंगा में फल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने कटहल के पेड़ों में तेजी से फैल रहे जड़ सड़न और मुरझान रोग को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में इस समय कटहल के बागों को काफी नुकसान पहुंच रहा है। मौसम के अचानक बदलाव, लंबे सूखे के बाद होने वाली मूसलाधार बारिश और खेतों में पानी रुकने के कारण पेड़ तेजी से सूख रहे हैं। पोषण सुरक्षा का पेड़ माने जाने वाले कटहल की खेती हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है, जिससे किसान इस संकट को लेकर खासे चिंतित हैं।

## रोग के मुख्य कारण और शुरुआती लक्षण
डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, कटहल के पेड़ों का अचानक पीला पड़ना और सूखना फफूंद के संक्रमण का परिणाम है। इस बीमारी के पीछे मुख्य रूप से फाइटोफ्थोरा, फ्यूजेरियम और पायथियम जैसे फफूंद जिम्मेदार हैं, जो सीधे जड़ों पर हमला करके पौधे की पोषण आपूर्ति रोक देते हैं। शुरुआती चरण में पेड़ की पत्तियां हल्की पीली होने लगती हैं और उनके किनारे सूखकर झड़ने लगते हैं। इसके बाद पौधे का विकास पूरी तरह रुक जाता है और उस पर लगे फल बहुत छोटे रह जाते हैं। यदि प्रभावित पेड़ की जड़ों की खुदाई करके जांच की जाए, तो वे भूरी या काली पड़कर सड़ने लगती हैं और उनसे बदबू आती है। इसके साथ ही तने के निचले हिस्से की छाल भी ढीली होकर आसानी से निकलने लगती है।

## बचाव और प्रबंधन के 4 वैज्ञानिक उपाय
इस गंभीर बीमारी से कटहल के बागों को सुरक्षित रखने के लिए डॉ. सिंह ने चार प्रमुख वैज्ञानिक कदम उठाने की सलाह दी है

- **उत्कृष्ट जल निकासी व्यवस्था:** कटहल के बाग हमेशा ऊंची क्यारियों या मेड़ पर ही लगाएं। मानसून के दौरान खेत में जमा होने वाले अतिरिक्त पानी की तत्काल निकासी सुनिश्चित करें। सिंचाई के लिए ड्रिप प्रणाली अपनाएं और पानी को तने के सीधे संपर्क में न आने दें, क्योंकि कटहल का पौधा जलभराव को बिल्कुल सहन नहीं कर पाता।
- **जैविक कवकनाशी का प्रयोग:** अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में ट्राइकोडर्मा और बैसिलस जैसे जैव कवकनाशी मिलाकर पौधों के जड़ क्षेत्र में डालें। ये मित्र कवक और जीवाणु हानिकारक फफूंद को खत्म करके जड़ों को मजबूती प्रदान करते हैं।
- **जैविक खाद और कंपोस्ट:** हर वर्ष मिट्टी में जैविक खाद और कंपोस्ट नियमित रूप से मिलाएं। इससे मिट्टी में उपयोगी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे पौधों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
- **रासायनिक उपचार का अंतिम विकल्प:** यदि बीमारी बहुत ज्यादा फैल चुकी हो, तो मेटालैक्सिल + मैनकोज़ेब या फोसेटाइल-एएल जैसी कवकनाशी दवाओं के घोल से जड़ों के आसपास ड्रेंचिंग करें। हालांकि, रासायनिक दवाओं का उपयोग अंतिम उपाय के रूप में ही करने का परामर्श दिया गया है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** कटहल उगाने वाले किसान सही जल निकासी और जैविक कवकनाशी अपनाकर फसल को नष्ट होने से बचा सकते हैं।

**बिहार और पूर्वी भारत में:** वर्षाकाल के दौरान जलभराव रोकने से कटहल के पेड़ों को सड़न और मुरझान रोग से सुरक्षित रखा जा सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. कटहल के पेड़ों में जड़ सड़न और मुरझान रोग किस कारण होता है?
यह बीमारी मुख्य रूप से फाइटोफ्थोरा, फ्यूजेरियम और पायथियम नाम के फफूंद के कारण होती है, जो जलभराव और मौसम के बदलाव में जड़ों पर हमला करते हैं।

### 2. कटहल के पेड़ में सड़न रोग के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
शुरुआत में पत्तियां हल्की पीली पड़कर किनारों से सूखने लगती हैं, पौधे का विकास रुक जाता है, और फल छोटे रह जाते हैं।

### 3. कटहल के बाग को जलभराव से बचाने के लिए क्या करना चाहिए?
बाग को हमेशा ऊंची क्यारियों या मेड़ पर लगाएं, मानसून में अतिरिक्त पानी निकालें और ड्रिप सिंचाई प्रणाली का उपयोग करें।

### 4. जड़ सड़न से बचाव के लिए कौन से जैविक कवकनाशी उपयोग करने चाहिए?
सड़ी हुई गोबर की खाद में ट्राइकोडर्मा और बैसिलस जैसे जैव कवकनाशी मिलाकर जड़ों में डालना फायदेमंद होता है।

### 5. बीमारी अधिक फैलने पर किन रसायनों से ड्रेंचिंग की सलाह दी गई है?
बीमारी गंभीर होने पर मेटालैक्सिल + मैनकोज़ेब या फोसेटाइल-एएल जैसी दवाओं के घोल से जड़ क्षेत्र की ड्रेंचिंग की जा सकती है।

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