# बोफोर्स मामले में आखिरी कानूनी दरवाजा भी बंद, सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज होने के साथ चार दशक पुराना विवाद समाप्त

> बोफोर्स तोप सौदे से जुड़ी आखिरी व्यक्तिगत याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। इसके साथ ही 1986 के इस रक्षा सौदे से उठे राजनीतिक और कानूनी बवंडर का 40 साल बाद पूर्ण अंत हो गया है।

**Type:** article · **Category:** बिहार · **Published:** 2026-08-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bihar/bofors-mamale-men-akhiri-kanuni-daravaja-bhi-bnda-supreme-court-se-yachika-kharija-hone-ke-satha-chara-dashaka-purana-vivada-samap-14581 · **Language:** Hindi
**Tags:** बोफोर्स घोटाला, सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई, राजीव गांधी, हिंदुजा ब्रदर्स, कारगिल युद्ध, रक्षा सौदा

स्वीडिश तोप निर्माता कंपनी के साथ हुए चर्चित रक्षा सौदे से उठे कानूनी विवाद का लगभग चार दशक बाद अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 के दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली अंतिम बची हुई व्यक्तिगत याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत के इस रुख के बाद भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था के इतिहास में सबसे लंबे समय तक खिंचे भ्रष्टाचार के मामलों में से एक पर अब पूर्ण विराम लग गया है।

 

## सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने खारिज की अंतिम याचिका

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता एवं बीजेपी नेता अजय के अग्रवाल की ओर से समय मांगने की अर्जी को साफ तौर पर अस्वीकार कर दिया। अधिवक्ता अजय के अग्रवाल ने वर्ष 2005 में आए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। शीर्ष अदालत की बेंच ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि वर्ष 2018 से लंबित पड़े इस मामले को केवल सुनवाई टालने के आग्रह पर आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

 सुनवाई के दौरान पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान आकर्षित कराया। अदालत ने टिप्पणी की कि जब मुख्य जांच एजेंसी, यानी सीबीआई, की खुद की चुनौती याचिका कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी थी और एजेंसी ने उसके बाद आगे कोई अपील दाखिल नहीं की, तो ऐसे में किसी अन्य व्यक्ति की व्यक्तिगत अपील कैसे विचारणीय बनी रह सकती है। इन्हीं तर्कों के आधार पर पीठ ने लंबित अर्जी को खारिज करते हुए मामले को बार-बार टालने की संभावनाओं को पूरी तरह समाप्त कर दिया।

 इस कानूनी प्रक्रिया के दौरान मामले से जुड़े कई प्रमुख प्रतिवादियों का परिदृश्य भी बदल चुका है। हिंदुजा ग्रुप के दो वरिष्ठ भाइयों, श्रीचंद पी हिंदुजा और गोपीचंद पी हिंदुजा, का काफी समय पहले ही निधन हो चुका है। इस याचिका में नामजद प्रतिवादियों में प्रकाश पी हिंदुजा शामिल थे, जो वर्तमान में यूरोप में हिंदुजा ग्रुप के चेयरमैन के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

 

## 2005 का दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय और 250 करोड़ का जांच खर्च

बोफोर्स मामले की औपचारिक कानूनी जांच की शुरुआत वर्ष 1990 में हुई थी, जब सीबीआई ने पहली बार एफआईआर दर्ज कर तफ्तीश का दायरा बढ़ाया था। यह जांच न केवल भारत तक सीमित रही, बल्कि स्विट्जरलैंड सहित कई अन्य विदेशी मुल्कों तक फैली हुई थी। जांच एजेंसियों ने विदेशी अदालतों में कानूनी लड़ाई लड़ने, महत्वपूर्ण बैंक रिकॉर्ड और गुप्त दस्तावेज हासिल करने, आधिकारिक पत्राचार के अनुवाद कराने और अधिकारियों के बार-बार विदेश दौरों पर भारी संसाधन झोंके। अनुमानों के अनुसार, चार दशकों तक चली इस बहुराष्ट्रीय जांच प्रक्रिया में सरकारी खजाने से लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हुए। हालांकि, इस विशाल धनराशि और लंबे समय के बावजूद एजेंसियां अदालत के समक्ष ऐसे ठोस और अकाट्य सबूत पेश नहीं कर सकीं, जिनसे लगाए गए आरोपों को कानूनी रूप से सिद्ध किया जा सके।

 सुप्रीम कोर्ट द्वारा ताजा याचिका खारिज किए जाने के साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट के 31 मई 2005 के ऐतिहासिक निर्णय से जुड़े सभी कानूनी विवादों का अंतिम समापन हो गया है। तत्कालीन हाई कोर्ट जज जस्टिस आरएस सोढ़ी ने अपने 2005 के फैसले में श्रीचंद पी हिंदुजा, गोपीचंद पी हिंदुजा और प्रकाश पी हिंदुजा के साथ-साथ बोफोर्स कंपनी के खिलाफ लगाए गए सभी आपराधिक आरोपों को निरस्त कर दिया था।

 अपने आदेश में जस्टिस आरएस सोढ़ी ने सीबीआई द्वारा मामले की पैरवी और जांच के तरीकों की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई थी कि इस पूरी निष्फल कसरत में जनता के लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हो गए। गौरतलब है कि सीबीआई ने वर्ष 2005 के इस हाई कोर्ट फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने में 4522 दिनों का भारी विलंब किया था। नवंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की उस देरी से दाखिल याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि जांच एजेंसी इतने वर्षों की देरी का कोई तार्किक या संतोषजनक कारण पेश करने में नाकाम रही थी।

 

## 1986 का हॉवित्जर सौदा और 1987 का स्वीडिश रेडियो का खुलासा

बोफोर्स विवाद की जड़ें 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की प्रसिद्ध हथियार निर्माता कंपनी Bofors AB के बीच हुए एक बड़े रक्षा समझौते से जुड़ी हैं। उस समय भारतीय सेना के तोपखाने के आधुनिकीकरण के उद्देश्य से 155mm FH-77B हॉवित्जर तोपों की खरीद का अनुबंध किया गया था। यह पूरा सौदा करीब 1437 करोड़ रुपये का था, जिसके तहत भारतीय सेना को 410 अत्याधुनिक तोपें प्राप्त होनी थीं। रक्षा विशेषज्ञों और तत्कालीन सरकार ने इसे सेना की मारक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम करार दिया था।

 हालांकि, रक्षा खरीद की यह उपलब्धि एक वर्ष के भीतर ही स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राजनीतिक और वित्तीय स्कैंडल में तब्दील हो गई। 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में यह दावा कर सनसनी फैला दी कि Bofors AB ने भारत में इस अरबों रुपये के अनुबंध को हासिल करने के लिए शीर्ष भारतीय राजनीतिज्ञों, रक्षा अधिकारियों और बिचौलियों को करोड़ों रुपये की रिश्वत दी थी।

 इस खुलासे के सार्वजनिक होते ही भारतीय राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया। संसद से लेकर सड़कों तक हंगामा शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने और मामले को दबाने की कोशिश करने के गंभीर आरोप लगाए। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद के पटल और विभिन्न सार्वजनिक मंचों से इन आरोपों का मजबूती से खंडन किया और स्पष्ट कहा कि सौदे में किसी भी प्रकार की दलाली या रिश्वतखोरी नहीं हुई थी।

 

## बिचौलिए, अंतरराष्ट्रीय उलझनें और चार दशक की कानूनी बाधाएं

सीबीआई की लंबी जांच के दौरान देश और विदेश के कई प्रमुख चेहरे जांच के घेरे में आए। इनमें इतालवी कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोच्ची, हथियार एजेंट विन चड्ढा, हिंदुजा ब्रदर्स और कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय बिचौलियों के नाम प्रमुखता से उभरे। आरोप लगाया गया कि इन व्यक्तियों और फर्जी कंपनियों के माध्यम से कथित कमीशन की रकम ट्रांसफर की गई थी। परंतु, कई देशों की जटिल न्याय प्रणालियों और लंबी अदालती बहसों के बावजूद अभियोजन पक्ष इन दावों को अदालत में साबित करने में विफल रहा।

 यह मामला चार दशकों तक इसलिए लटका रहा क्योंकि इसमें कई अंतरराष्ट्रीय कानूनी अड़चनें शामिल थीं। स्विस बैंक खातों के गुप्त ब्योरे प्राप्त करने में ही भारतीय एजेंसियों को कई साल लग गए। इसके अतिरिक्त, अधिकांश मुख्य आरोपी विदेशी नागरिक थे, जिन्हें भारत लाने की प्रत्यर्पण प्रक्रियाएं बार-बार विफल होती रहीं। समय बीतने के साथ-साथ कई प्रमुख आरोपियों और गवाहों की मृत्यु हो गई, महत्वपूर्ण दस्तावेज पुराने पड़ गए और परिस्थितियां बदल गईं। परिणामस्वरूप, साक्ष्यों के अभाव में अदालतों ने अलग-अलग चरणों में आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाहियां समाप्त कर दीं।

 

## 1989 के चुनाव पर राजनीतिक प्रभाव और सत्ता परिवर्तन

बोफोर्स घोटाले के आरोपों का सबसे विनाशकारी असर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के राजनीतिक भविष्य पर पड़ा। 1989 के लोकसभा चुनावों में समूचे विपक्षी गठबंधन ने बोफोर्स में हुए कथित भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी हथियार बनाया।

 राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बोफोर्स विवाद आधुनिक भारतीय चुनावी इतिहास का एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। 'गली-गली में शोर है' जैसे नारों के साथ जनता के बीच सरकार की ईमानदारी पर गहरा अविश्वास पैदा हो गया। भारी जनआक्रोश के कारण 1989 के आम चुनावों में भारी बहुमत वाली कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया।

 

## 1999 के कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोपों की रणनीतिक भूमिका

भारतीय सैन्य इतिहास का एक बड़ा विरोधाभास यह रहा कि जिस बोफोर्स तोप सौदे ने सालों तक देश में राजनीतिक तूफान खड़ा किया, उसी तोप ने युद्ध के मैदान में भारत की जीत की पटकथा लिखी। 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दौरान स्वीडन से खरीदी गई यही 155mm FH-77B हॉवित्जर तोपें भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित हुईं।

 कारगिल की दुर्गम, ऊंची और बर्फीली पहाड़ियों पर छिपकर बैठे दुश्मन के बंकरों और ठिकानों को सटीक निशाने से तबाह करने में बोफोर्स तोपों ने निर्णायक भूमिका निभाई। रक्षा विशेषज्ञों और सैन्य कमांडरों ने स्वीकार किया कि इन तोपों की तीव्र गोलाबारी और उच्च मारक क्षमता ने ही कारगिल की चोटियों को वापस हासिल करने में भारतीय पैदल सेना को बंकर-दर-बंकर आगे बढ़ने का रास्ता दिया।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह फैसला भारत की न्यायिक प्रक्रिया में लंबे समय तक लटकने वाले हाई-प्रोफाइल रक्षा सौदों और भ्रष्टाचार के मुकदमों के अंतिम निस्तारण की मिसाल पेश करता है।

**प्रशासनिक स्तर पर:** सार्वजनिक खजाने से 250 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी सबूतों के अभाव में केस खारिज होना भविष्य की रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में बेहतर पारदर्शिता की जरूरत रेखांकित करता है।

## सवाल-जवाब

### 1. बोफोर्स तोप सौदा क्या था?
24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की Bofors AB के बीच 1437 करोड़ रुपये में 410 हॉवित्जर तोपों की खरीद का अनुबंध हुआ था।

### 2. सुप्रीम कोर्ट ने हाल में क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ बची एकमात्र याचिका को खारिज कर दिया, जिसने हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स के खिलाफ मामले को रद्द किया था।

### 3. सीबीआई ने इस मामले की जांच में कितना खर्च किया था?
सीबीआई ने विदेशी अदालतों, बैंक रिकॉर्ड्स और लंबी जांच प्रक्रिया में लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च किए थे।

### 4. क्या 1999 के कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोपें काम आई थीं?
हां, 155mm FH-77B हॉवित्जर तोपों ने कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर दुश्मन के ठिकानों को तबाह करने में बेहद निर्णायक भूमिका निभाई थी।

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