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  "type": "article",
  "title": "धान की खेती में अंधाधुंध सिंचाई पर बड़ा खुलासा, जानिए एक किलो पैदावार में कितना खर्च होता है पानी",
  "summary": "कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के विशेषज्ञ के अनुसार एक किलो धान उगाने में तीन से पांच हजार लीटर पानी लगता है। भूजल संकट को देखते हुए अब खेतों में सिंचाई इंडिकेटर और आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल जरूरी हो गया है।",
  "content": "बिहार के मैदानी इलाकों में धान की बुआई बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है, और जहानाबाद जिले में भी बड़ी तादाद में किसान मुख्य रूप से इसी फसल पर निर्भर रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में धान की फसल को लेकर एक पुरानी कहावत काफी मशहूर रही है, जिसमें कहा जाता है कि धान और पान को रोजाना स्नान की दरकार होती है। इसका सीधा मतलब यह निकाला जाता रहा है कि अगर धान के खेत हमेशा पानी से लबालब नहीं भरे रहेंगे, तो पैदावार अच्छी नहीं होगी। सदियों से चली आ रही इसी सोच के तहत किसान खेतों को लगातार पानी से सींचते रहे हैं। लेकिन अब पर्यावरण की बदलती परिस्थितियों, भूजल के तेजी से गिरते स्तर और गंभीर जल संकट ने इस पारंपरिक व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खेती के लिए जरूरी पानी का इंतज़ाम भविष्य में कहां से होगा, इस चिंता ने शोधकर्ताओं और कृषि वैज्ञानिकों को नए विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है ताकि कम से कम पानी में भरपूर पैदावार ली जा सके।\n\nएक किलो धान तैयार करने में खर्च होता है हजारों लीटर पानी\nजहानाबाद जिला स्थित कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के कृषि यंत्र विशेषज्ञ इंजीनियर जितेंद्र कुमार ने धान की सिंचाई से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखा है। उनके मुताबिक आम तौर पर किसानों में यह धारणा घर कर चुकी है कि जब तक खेत में भारी मात्रा में पानी जमा न रहे, तब तक अच्छी फसल हासिल नहीं हो सकती। लेकिन वैज्ञानिक हकीकत इससे काफी अलग है। जब आंकड़ों की पड़ताल की जाती है, तो तस्वीर बेहद चौंकाने वाली दिखती है। एक किलो धान की पैदावार हासिल करने के लिए करीब 3000 लीटर से लेकर 5000 लीटर तक पानी की खपत हो जाती है। राज्य भर में जितने बड़े रकबे पर धान बोया जाता है, उस कुल उत्पादन के हिसाब से देखा जाए तो सिंचाई में खपने वाले पानी की कुल मात्रा का अंदाजा लगाना भी आसान नहीं है।\n\nपारंपरिक सोच बनाम जलवायु परिवर्तन की असलियत\nइंजीनियर जितेंद्र कुमार बताते हैं कि पुराने ढर्रे पर खेती करने वाले किसानों को अब तक यही लगता आया है कि खेत में हमेशा 3 से 4 सेंटीमीटर पानी बना रहना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि खेत की सतह पर लगातार करीब डेढ़ इंच पानी का भराव जरूरी समझा जाता रहा है। पुराने दौर में जब प्राकृतिक जलस्रोत भरपूर थे, तब इस व्यवस्था से काम चल जाता था। परंतु मौजूदा दौर में हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम का चक्र गड़बड़ा चुका है और खेतों में हर वक्त इतना पानी खड़ा रख पाना अब मुमकिन नहीं रह गया है। हमारे चारों तरफ प्राकृतिक जल संसाधनों की उपलब्धता में भारी गिरावट आई है, जिससे पुरानी पद्धति को जारी रखना खेती के भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।\n\nप्रति व्यक्ति घटता जल भंडार और आधुनिक तकनीक की दरकार\nउपलब्ध जल संसाधनों की स्थिति पर बात करते हुए जितेंद्र कुमार ने बताया कि वर्तमान समय में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1600 क्यूबिक मीटर दर्ज की गई है। आने वाले दिनों में यह आंकड़ा और तेजी से गिरकर महज 1400 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति रह जाने का अनुमान है। लगातार घटते इस जलस्तर के बीच पारंपरिक तरीके से पानी बहाकर की जाने वाली खेती को लंबे समय तक जारी नहीं रखा जा सकता। ऐसे गंभीर संकट से निपटने के लिए अब आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का सहारा लेना अनिवार्य हो गया है। आधुनिक कृषि यंत्र और सिंचाई इंडिकेटर जैसे साधन अब उपलब्ध हो चुके हैं, जो खेत में पानी की वास्तविक नमी और जरूरत को सटीक रूप से मापते हैं। इन यंत्रों की मदद से किसान बिना वजह खेतों को डुबोए रखने के बजाय जरूरत के हिसाब से नपी-तुली सिंचाई कर सकते हैं, जिससे पानी की बर्बादी रुकेगी और पैदावार भी सुरक्षित रहेगी।\n\nइसका आप पर असर\nधान की खेती में अंधाधुंध पानी के इस्तेमाल और गिरते भूजल स्तर का सीधा असर किसानों की लागत और भविष्य में पानी की उपलब्धता पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: घटते भूजल स्तर के बीच देश भर के किसानों को कम पानी की खपत वाली तकनीकों और वैकल्पिक सिंचाई उपकरणों को अपनाना होगा। ऐसा न करने पर भविष्य में सिंचाई की बढ़ती लागत और पानी की कमी से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है।\n• बिहार में: जहानाबाद सहित पूरे बिहार के किसानों को पारंपरिक डेढ़ इंच पानी भरने के नियम को छोड़कर सिंचाई इंडिकेटर जैसे आधुनिक यंत्रों की मदद लेनी होगी। समय रहते वैज्ञानिक सलाह अपनाने से किसान न सिर्फ पानी की भारी बर्बादी रोक पाएंगे बल्कि बोरवेल सूखने के जोखिम से भी बचेंगे।\n• लागत और बचत पर असर: आवश्यकतानुसार नपी-तुली सिंचाई करने से डीजल और बिजली से चलने वाले पंप सेटों का खर्च काफी घट जाएगा। इससे किसानों की प्रति एकड़ उत्पादन लागत घटेगी और सीमित पानी में भी भरपूर पैदावार मिल सकेगी।\n• जल संरक्षण की दिशा में: प्रति व्यक्ति पानी की घटती उपलब्धता को देखते हुए आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रसार ग्रामीण इलाकों में जल सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करके इन यंत्रों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण ले सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nधान की फसल में पानी की भारी बर्बादी और उससे जुड़े संकट के पीछे सदियों पुरानी भ्रांतियां, जल उपभोग के चौंकाने वाले आंकड़े और तेजी से गहराता पर्यावरणीय असंतुलन मुख्य वजह हैं।\n\n• पारंपरिक मान्यताओं का असर: ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से यह धारणा रही है कि धान के खेत में हर समय 3 से 4 सेंटीमीटर यानी करीब डेढ़ इंच पानी भरा रहना जरूरी है। इसी सोच के चलते किसान खेतों में लगातार नलकूप चलाकर पानी भरते रहे हैं, जबकि वैज्ञानिक रूप से इतने जलभराव की आवश्यकता नहीं होती।\n• फसल का भारी जल पदचिह्न: कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक किलोग्राम धान पैदा करने में ही 3000 से 5000 लीटर पानी लग जाता है। इतने विशाल जल उपभोग की जानकारी न होने के कारण किसान बिना किसी नाप-जोख के अंधाधुंध सिंचाई करते चले आ रहे हैं।\n• जलवायु परिवर्तन और गिरता जलस्तर: जलवायु में आ रहे तेज बदलावों के चलते प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी घट रहा है और प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1600 से गिरकर 1400 क्यूबिक मीटर रह जाने का अनुमान है। इस दोहरी चुनौती के कारण अब खेतों में हर वक्त पानी खड़ा रख पाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो चुका है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. एक किलोग्राम धान उगाने में कुल कितना पानी खर्च होता है?\nकृषि विज्ञान केंद्र के कृषि यंत्र विशेषज्ञ इंजीनियर जितेंद्र कुमार के अनुसार एक किलो धान पैदा करने में 3000 लीटर से लेकर 5000 लीटर तक पानी की खपत होती है।\n\n2. धान की खेती को लेकर पारंपरिक सोच क्या रही है?\nपारंपरिक मान्यता के अनुसार धान के खेत में हमेशा 3 से 4 सेंटीमीटर यानी लगभग डेढ़ इंच पानी भरा रहना जरूरी माना जाता रहा है।\n\n3. मौजूदा समय में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता कितनी दर्ज की गई है?\nवर्तमान समय में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1600 क्यूबिक मीटर है, जिसके घटकर 1400 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति रह जाने का अनुमान है।\n\n4. धान में पानी की बर्बादी रोकने के लिए विशेषज्ञ ने क्या समाधान सुझाया है?\nविशेषज्ञ ने गिरते जलस्तर से निपटने के लिए आधुनिक मशीनों और खेत में पानी का स्तर मापने वाले सिंचाई इंडिकेटर यंत्रों के इस्तेमाल की सलाह दी है।",
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  "category": "बिहार",
  "publishedAt": "2026-10-02",
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