जंतर-मंतर और बिहार प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, अदालत ने जांच समिति के दायरे पर कही यह बात सुप्रीम कोर्ट में जंतर-मंतर और बिहार के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर तीखी बहस हुई। अदालत ने कहा कि सीधे निर्देश देने से जांच समिति का दायरा प्रभावित हो सकता है। नई दिल्ली के जंतर-मंतर और बिहार में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। इस दौरान वकील ने मांग की कि पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और महिला प्रदर्शनकारियों के कथित दुर्व्यवहार के मामलों में केवल जांच से काम नहीं चलेगा, बल्कि सख्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि यदि अदालत खुद ही इस मामले में सीधे जांच शुरू कर देगी और लगातार निर्देश जारी करेगी, तो इससे पहले से गठित जांच समिति के कामकाज पर असर पड़ सकता है। वकील ने रखी कड़ा संदेश देने की मांग सुनवाई के दौरान वकील गोपाल एस ने अदालत के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि उनकी बस एक ही गुजारिश है कि पुलिस तंत्र को एक कड़ा संदेश दिया जाना आवश्यक है। उन्होंने एक डीसीपी की ओर से दाखिल किए गए जवाब का हवाला देते हुए बताया कि पुलिस ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि कुछ पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में प्रदर्शन स्थल पर तैनात थे और उनके विरुद्ध कार्रवाई भी की जा चुकी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कई पुलिसकर्मियों ने अपनी वर्दी पर नाम या पहचान से जुड़े टैग नहीं लगाए हुए थे। वकील के अनुसार, बीते लगभग दो महीनों से लगातार यह मांग की जा रही है कि पुलिस यह स्पष्ट करे कि इन कथित घटनाओं के सामने आने के बाद उसने क्या कदम उठाए हैं। जिम्मेदारी तय करने और सबूत पेश करने की मांग मामले की पैरवी कर रहे वकील ने जोर देकर कहा कि यदि महिला प्रदर्शनकारियों के साथ किसी भी प्रकार का कथित दुर्व्यवहार और प्रताड़ना हुई है, तो उसकी सीधी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि संबंधित अधिकारियों को इस पूरे प्रकरण से जुड़े कार्रवाई के रिकॉर्ड और पुख्ता सबूत जनता तथा अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया जाए। उनका तर्क था कि केवल जांच समिति के भरोसे बैठने से उन मामलों में विलंब हो सकता है जहां पुलिसकर्मियों की सीधी संलिप्तता के वीडियो सामने आ चुके हैं। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी और समिति की भूमिका वकील की दليलों पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत को इस संवेदनशील मामले में बहुत ही सावधानी के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट खुद ही जांच के दायरे में उतर जाएगा और हर बात पर निर्देश देने लगेगा, तो इससे पहले से तय की गई जांच समिति के कार्यक्षेत्र और उसकी निष्पक्षता पर प्रभाव पड़ सकता है। अदालत का यह मानना था कि मूल रूप से उस समिति को ही इन तमाम मामलों की गहराई से छानबीन करने देनी चाहिए। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने इस बात से भी इनकार नहीं किया कि कुछ ऐसे गंभीर बिंदु हो सकते हैं जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि वकील अंतरिम व्यवस्था या तत्काल राहत से जुड़े कोई ठोस और व्यावहारिक सुझाव देते हैं, तो उन पर विचार किया जा सकता है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने भी अदालत के समक्ष यह पक्ष रखा कि किसी भी मामले में जल्दबाजी में आकर कोई भी कठोर कदम नहीं उठाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि जांच समिति अपनी रिपोर्ट में किसी भी अधिकारी को दोषी पाती है, तो उसके खिलाफ विधिवत कार्रवाई की जाएगी। उनका तर्क था कि जांच प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध मनमाने ढंग से कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए और पूरी प्रक्रिया को स्थापित तथ्यों तथा साक्ष्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा कि इस तरह के मामलों में किसी भी प्रकार की जल्दबाजी दिखाने और अनावश्यक सनसनी फैलाने की कोई आवश्यकता नहीं है। पेलेट गन से घायल लोगों के मुआवजे का मुद्दा इस सुनवाई के दौरान विरोध प्रदर्शनों के समय पेलेट गन के इस्तेमाल से घायल हुए लोगों को अंतरिम मुआवजा प्रदान किए जाने का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वस्त किया कि वह इस पहलू की पूरी गहराई से जांच करेंगे। वहीं दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कुछ विशेष पुलिस अधिकारियों से जुड़े कथित वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि इन घटनाओं की जांच बेशक समिति के स्तर पर हो सकती है, लेकिन यदि किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ प्रथम दृष्टया कार्रवाई करना जरूरी बनता है, तो उसे जांच पूरी होने तक टाला नहीं जाना चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश और आगे की प्रक्रिया सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से पहले दिए गए संरक्षण संबंधी आदेश का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत इस संबंध में पहले ही अपना आदेश पारित कर चुकी है और वह आदेश अपनी जगह प्रभावी रूप से जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे इस मामले से जुड़ी समस्त सामग्री जांच समिति के समक्ष अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करें। इसके अतिरिक्त, अदालत ने मामलों के बेहतर संचालन के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति किए जाने का भी निर्देश दिया। विरोध प्रदर्शनों के आयोजकों की जवाबदेही तय करने से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर अदालत ने कहा कि इन सभी संबंधित मामलों में नोटिस जारी किए जा रहे हैं और इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा नहीं आ रही है। इसका आप पर असर भारत में: यह मामला देश भर में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल के इस्तेमाल और नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी प्रक्रियाओं पर असर डाल सकता है। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई किस मामले से जुड़ी है? यह सुनवाई दिल्ली के जंतर-मंतर और बिहार में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित दुर्व्यवहार के मामलों से जुड़ी है। 2. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने क्या टिप्पणी की? मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि अदालत सीधे जांच शुरू कर देगी और निर्देश देने लगेगी, तो इससे पहले से बनाई गई जांच समिति का दायरा प्रभावित हो सकता है। 3. वकील ने अदालत के सामने क्या मुख्य मांग रखी? वकील ने पुलिस को कड़ा संदेश देने, महिला प्रदर्शनकारियों के कथित दुर्व्यवहार पर जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई का रिकॉर्ड पेश करने की मांग की। 4. पेलेट गन से घायल लोगों को लेकर क्या कहा गया? सुनवाई के दौरान प्रदर्शन में पेलेट गन से घायल हुए लोगों को अंतरिम मुआवजा देने का मुद्दा उठाया गया, जिस पर सॉलिसिटर जनरल ने इस पहलू की जांच करने की बात कही। https://trendkia.com/bihar/jantar-mantar-aur-bihar-pradarshan-mamle-mein-supreme-court-mein-sunwai-18084 TrendKia — Har trend, sabse pehle.