# जंतर-मंतर पर बिना वर्दी वाले पुलिसकर्मियों से भिड़े नीट प्रदर्शनकारी, क्या कहता है आत्मरक्षा का कानून?

> नीट पेपर लीक मामले को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और सादी वर्दी वाले पुलिसकर्मियों के बीच हुई हिंसक झड़प ने आत्मरक्षा के अधिकार पर नई कानूनी बहस छेड़ दी है। कानूनी जानकारों का मानना है कि बिना पहचान बताए हमला करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ किया गया पलटवार अपराध नहीं, बल्कि बचाव माना जा सकता है।

**Type:** article · **Category:** बिहार · **Published:** 2026-07-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bihar/jantar-mantar-para-bina-vardi-vale-pulisakarmiyon-se-bhire-neet-pradarshanakari-kya-kahata-hai-atmaraksha-ka-kanuna-9769 · **Language:** Hindi
**Tags:** जंतर मंतर प्रदर्शन, नीट पेपर विवाद, दिल्ली पुलिस, आत्मरक्षा का अधिकार, सोनम वांगचुक, भारतीय न्याय संहिता

दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर बीते सोमवार से एक अत्यंत अभूतपूर्व और तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है, जहां पर्यावरणवादी सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया गया। नीट परीक्षा के पेपर से जुड़े विवाद को लेकर आयोजित यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन उस समय एक हिंसक और अराजक घटनाक्रम में तब्दील हो गया, जब सादी वर्दी में तैनात कुछ अज्ञात लोगों ने उग्र भीड़ पर अचानक लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। बिना पुलिस की वर्दी या किसी आधिकारिक पहचान चिह्न के इन लोगों द्वारा किए गए बल प्रयोग ने प्रदर्शनकारी छात्रों और नागरिकों को स्तब्ध कर दिया। अपना बचाव करने की कोशिश में, आक्रोशित भीड़ ने इन 'प्लेन क्लोज' (सादे कपड़ों वाले) लोगों पर पलटवार करना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि डंडे चलाने वाले ये हमलावर वास्तव में दिल्ली पुलिस के जवान हैं। इस पूरे हंगामे और मारपीट के बीच एक बेहद दिलचस्प पैटर्न देखने को मिला: जब भी प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ सादी वर्दी वाले किसी व्यक्ति को घेरकर पीटने लगती, तो वह व्यक्ति घबराकर तुरंत अपनी जेब से पुलिस का आधिकारिक आई-कार्ड निकालकर हवा में लहरा देता। आई-कार्ड देखते ही उग्र भीड़ का गुस्सा जादुई तरीके से शांत हो जाता और वे तुरंत उस पुलिसकर्मी को बिना कोई नुकसान पहुंचाए पीछे हट जाते। इस विचित्र घटना ने भारत में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान बिना पहचान वाले पुलिसकर्मियों के उपयोग, बल प्रयोग की सीमाओं और आम नागरिकों के आत्मरक्षा के अधिकारों को लेकर एक राष्ट्रव्यापी कानूनी बहस को जन्म दे दिया है।

## अज्ञात हमलावरों से बचाव और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो

नीट परीक्षा में हुई कथित भारी अनियमितताओं के खिलाफ न्याय की मांग कर रहे हजारों युवाओं पर जब अचानक बिना वर्दी वाले लोगों ने लाठीचार्ज किया, तो वहां मौजूद लोगों को सहज ही यह लगा कि कुछ असामाजिक तत्व या गुंडे उनके शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसक रूप देकर कुचलने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी जान बचाने की इसी सहज प्रवृत्ति के कारण भीड़ उग्र हो गई और स्थिति बेकाबू हो गई। इस पूरी घटना के कई खौफनाक और विचलित करने वाले वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर जंगल की आग की तरह फैल गए, जिन्होंने पुलिस की पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए। 21 जुलाई 2026 को माइक्रोब्लॉगिंग साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सौरभ नामक एक जागरूक यूजर ने एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला वीडियो साझा किया। इस वायरल फुटेज में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे बिना वर्दी वाले कुछ लोग निर्दयता से लाठियां बरसा रहे हैं और एक घबराया हुआ निहत्था लड़का खुद को बचाने के लिए वहां से बेतहाशा भाग रहा है। इसी बीच, पूरी पुलिस वर्दी पहने हुए एक अन्य अधिकारी जानबूझकर अपना पैर अड़ाकर उस तेजी से भागते हुए युवक को जमीन पर औंधे मुंह गिरा देता है। इस अमानवीय और क्रूर कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए सौरभ ने अपनी पोस्ट में लिखा कि पुलिस की वर्दी पहनने वालों को आदेश मानने और अपनी ड्यूटी निभाने के साथ-साथ थोड़ी मानवता भी अपने भीतर जरूर रखनी चाहिए। उन्होंने इस पूरी घटना को लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक करार दिया, जिसके बाद इंटरनेट पर आम जनता का गुस्सा फूट पड़ा।

## बिना बैज और सादे कपड़ों में लाठीचार्ज पर भड़का भारी आक्रोश

राष्ट्रीय राजधानी के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले वीआईपी इलाके में विरोध प्रदर्शन के दौरान बिना वर्दी और बिना किसी बैज वाले अज्ञात लोगों द्वारा देश भर से आए छात्रों को बेरहमी से पीटे जाने की इस घटना ने कानून व्यवस्था के पैरोकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी अचंभे में डाल दिया है। इस संवेदनशील मामले को लेकर एडवोकेट हंस चंदा ने सोशल मीडिया के माध्यम से दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारियों से सीधे तौर पर तीखे सवाल पूछे हैं। उन्होंने जंतर-मंतर पर भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब स्थिति को संभालने के लिए वहां पहले से ही 5000 सुरक्षा बल और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) की टुकड़ियां तैनात की गई थीं, तो फिर पुलिस के जवानों के साथ मिलकर बिना वर्दी वाले ये रहस्यमयी लोग युवाओं पर लाठियां क्यों बरसा रहे थे? उन्होंने अपनी पोस्ट में जोर देकर कहा कि पूरे देश की आम जनता और पीड़ित युवा आज यह जानना चाहते हैं कि ये अज्ञात हमलावर आखिर कौन हैं। उन्होंने पुलिस प्रशासन पर निशाना साधते हुए पूछा कि आखिर आला अधिकारी इस मामले पर एक औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सच्चाई बताने से क्यों कतरा रहे हैं। इसी तरह, प्रियांशु कुमार नामक एक अन्य नागरिक ने भी दिल्ली पुलिस से इस मामले में तत्काल और पारदर्शी स्पष्टीकरण की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रशासन को बिना किसी देरी के यह साफ करना चाहिए कि सादे कपड़ों में घूम-घूम कर, हाथों में लठ्ठ लेकर निहत्थे छात्रों को बुरी तरह पीटने वाले ये अज्ञात लड़के कौन हैं। इन चुभते हुए सवालों ने सादी वर्दी की आड़ में छिपे राज्य प्रायोजित बल प्रयोग को लेकर आम जनता के मन में बैठी गहरी चिंताओं और असुरक्षा की भावना को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।

## पूर्व पुलिस आयुक्त का बयान और 'प्लेन क्लोज' ऑपरेशन का असली मकसद

इस पूरे 'प्लेन क्लोज' विवाद के तकनीकी, प्रशासनिक और रणनीतिक पहलुओं को गहराई से समझने के लिए, दिल्ली में दशकों तक बड़े-बड़े हिंसक और राजनीतिक प्रदर्शनों को बेहद करीब से देखने और संभालने वाले दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ पूर्व पुलिस आयुक्त (सीपी) ने अपनी बेबाक राय सामने रखी। अपनी आधिकारिक पहचान गुप्त रखने की शर्त पर मीडिया से बात करते हुए, इस अनुभवी पूर्व अधिकारी ने स्पष्ट किया कि बड़े विरोध प्रदर्शनों में खुफिया तौर पर पुलिसकर्मियों का सादे कपड़ों में तैनात रहना कोई नई या अनोखी बात नहीं है। उन्होंने पुलिस की आंतरिक रणनीति का खुलासा करते हुए बताया कि किसी भी बड़े आंदोलन में खुफिया इनपुट जुटाने, असामाजिक तत्वों की पहचान करने और भीड़ के भीतर हो रही हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर गुपचुप नजर रखने के लिए 'प्लेन क्लोज' वाले कर्मियों की एक बहुत ही अलग और अहम भूमिका होती है। उन्होंने यह भी साफ किया कि दंगों, हिंसक झड़पों या आक्रामक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए ऐसा कोई भी लिखित कानूनी नियम मौजूद नहीं है जो पुलिस विभाग को अपने जवानों को सादे कपड़ों में तैनात होने से पूरी तरह रोकता हो। हालांकि, पूर्व सीपी ने जंतर-मंतर पर हुई लाठीचार्ज की घटना पर सख्त और स्पष्ट आपत्ति जताते हुए कहा कि अगर सादे कपड़ों में मौजूद कोई भी पुलिसकर्मी खुलेआम लाठी चला रहा है या लोगों को पीट रहा है, तो वह कृत्य पूरी तरह से आपत्तिजनक और विभागीय मर्यादा के खिलाफ है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि सादी वर्दी में जवानों की गुप्त तैनाती पहले भी कई बार होती रही है, लेकिन यह बात भी सौ फीसदी सच है कि उन्हें किसी भी परिस्थिति में सीधे तौर पर लाठी चलाने या बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। सोमवार को वास्तव में जमीन पर क्या घटना घटी, इस पर अपना कोई भी अंतिम फैसला सुनाने से बचते हुए पूर्व अधिकारी ने समझदारी दिखाते हुए कहा कि जब तक इस घटना की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट उनके सामने नहीं आती, तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर जोड़ा कि जब आप किसी भी बेकाबू हालात का सामना कर रहे होते हैं, तो अक्सर कोई भी बहुत कठोर (हार्ड एंड फास्ट) नियम पुस्तिका काम नहीं आती है; उस वक्त प्रशासन का पूरा फोकस सिर्फ और सिर्फ इस बात पर होता है कि किसी भी तरह से बिगड़ती हुई स्थिति को तुरंत कैसे नियंत्रित किया जाए।

## भारतीय न्याय संहिता और हर नागरिक को मिला आत्मरक्षा का अधिकार

जंतर-मंतर पर हुए इस भयंकर बवाल और लाठीचार्ज के बाद पूरे देश में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह खड़ा हो गया है कि यदि सादी वर्दी में तैनात, बिना किसी नेमप्लेट या बैज वाला कोई पुलिसकर्मी किसी आम जनता पर अचानक हमला करता है, और उसके जवाब में अपनी जान बचाने के लिए जनता भी पलटवार करती है, तो क्या इस जवाबी कार्रवाई को ड्यूटी पर तैनात एक सरकारी पुलिस अधिकारी पर हमला माना जाएगा? देश के जाने-माने आपराधिक मामलों के वरिष्ठ वकीलों और कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरी घटना को सिर्फ पुलिस बनाम पब्लिक के नजरिए से नहीं, बल्कि एक आम नागरिक के आत्मरक्षा के मौलिक अधिकार के चश्मे से देखा जाना बेहद जरूरी है। भारत के संविधान और कानून की नजर में, इस देश के हर एक नागरिक को अपने शरीर और संपत्ति को बचाने का पूरा मौलिक अधिकार जन्म से ही प्राप्त है। यह महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार हाल ही में लागू की गई नई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में भी पूरी मजबूती के साथ उसी तरह मौजूद है, जिस तरह वह पुराने कानूनों यानी पूर्ववर्ती आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की विभिन्न धाराओं में शामिल था। यह नया कानून देश के प्रत्येक नागरिक को किसी भी अचानक हुए गैरकानूनी, अकारण और हिंसक हमले के खिलाफ 'प्राइवेट डिफेंस' (निजी आत्मरक्षा) का पूरा कानूनी अधिकार प्रदान करता है।

## लोकसेवक की पहचान न होना और कानून का एक बेहद अहम अपवाद

इस पूरे पेचीदा मामले में बीएनएस की नई धारा 37 (जो पहले पुरानी आईपीसी की मशहूर धारा 99 हुआ करती थी) का विस्तृत कानूनी विश्लेषण करना बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। इस धारा में दिए गए सामान्य कानूनी नियम के अनुसार, यदि कोई अधिकृत लोकसेवक (पब्लिक सर्वेंट) अपने पद का आधिकारिक और सद्भावनापूर्ण इस्तेमाल करते हुए कोई कानूनी कार्रवाई कर रहा है, तो आम नागरिक को उसके खिलाफ प्राइवेट डिफेंस का अधिकार आमतौर पर बिल्कुल भी नहीं मिलता है। लेकिन, इस सख्त कानून में एक बेहद स्पष्ट, तार्किक और नागरिकों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी साफ शब्दों में शामिल किया गया है। कानून कहता है कि एक लोकसेवक को मिलने वाली यह विशेष कानूनी सुरक्षा केवल तब तक ही लागू रहती है, जब तक कि पीड़ित व्यक्ति को यह अच्छी तरह से पता न हो, या उसे यह विश्वास करने का कोई ठोस कारण न मिल जाए कि उस पर हमला करने वाला व्यक्ति वास्तव में एक आधिकारिक पुलिसकर्मी या सरकार द्वारा नियुक्त लोकसेवक ही है। अब जरा कल्पना कीजिए कि सादी वर्दी पहने हुए कोई अंजान शख्स एकाएक भारी भीड़ से निकलकर किसी शांतिपूर्ण राहगीर या प्रदर्शनकारी पर जानलेवा डंडों से टूट पड़े और अपनी आधिकारिक पहचान या आईडी कार्ड भी उजागर न करे। ऐसी खौफनाक और जानलेवा स्थिति में, पीड़ित व्यक्ति सहित आसपास खड़े तमाम लोगों का यह सोचना बिल्कुल स्वाभाविक और मानवीय है कि वह हमलावर कोई खूंखार अपराधी, दंगाई या गुंडा है। कानून के जानकारों का स्पष्ट मत है कि ऐसी जानलेवा स्थिति उत्पन्न होने पर, भारत के किसी भी नागरिक को अपनी और अपने आसपास के लोगों की जान-माल की रक्षा करने के लिए कानूनी रूप से 'आत्मरक्षा का अधिकार' तुरंत प्रभाव से प्राप्त हो जाता है।

## पुलिस की एफआईआर, विभागीय दलीलें और कानूनी कार्यवाही की जटिलताएं

भारत में अक्सर यह देखा गया है कि इस तरह की हिंसक घटनाओं और पुलिस-पब्लिक टकराव के तुरंत बाद, पुलिस प्रशासन अपने अधिकारियों के बचाव की मुद्रा में आते हुए आम नागरिकों पर बेहद सख्त और गंभीर धाराओं में कई एफआईआर दर्ज कर लेता है। ऐसे मामलों में पुलिस आमतौर पर प्रदर्शनकारियों पर सरकारी काम में बाधा डालने, ड्यूटी पर तैनात लोकसेवक पर जानलेवा हमला करने और सुनियोजित तरीके से बलवा (दंगा) करने जैसे गंभीर आपराधिक आरोप लगाती है। अदालत में पुलिस का मुख्य तर्क हमेशा यही होता है कि उनके जवानों को बिगड़ती कानून-व्यवस्था बनाए रखने या भीड़ के बीच से महत्वपूर्ण खुफिया इनपुट जुटाने के लिए विशेष रणनीति के तहत सादे कपड़ों में तैनात किया गया था। हालांकि, देश के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी नागरिक के खिलाफ सिर्फ एक एफआईआर दर्ज कर लेना ही पूरे मामले का अंत नहीं होता है। जब यह पूरा विवाद पुलिस स्टेशन से निकलकर अदालत के कटघरे में पहुंचता है, तो अभियोजन पक्ष (पुलिस) के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। पुलिस को अदालत में यह बात ठोस सबूतों के साथ साबित करनी ही होगी कि क्या सादी वर्दी वाले उस पुलिसकर्मी ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज या बल प्रयोग शुरू करने से ठीक पहले अपनी आधिकारिक पहचान स्पष्ट रूप से जाहिर की थी या नहीं। पुलिस भले ही अपने रिकॉर्ड में इसे 'ऑन-ड्यूटी अधिकारी पर आपराधिक बल का प्रयोग' मानकर एकतरफा मामला दर्ज कर ले, लेकिन अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद घटनाओं का क्रम और वीडियो साक्ष्य ही अंतिम फैसला तय करते हैं।

## आई-कार्ड लहराना और अदालत में जनता का सबसे बड़ा कानूनी बचाव

दिल्ली के प्रतिष्ठित पटियाला हाउस कोर्ट में वकालत करने वाले अनुभवी एडवोकेट राहुल सिंह इस पूरे विवाद और पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण और बारीक कानूनी दृष्टिकोण पेश करते हैं। वह विस्तार से समझाते हैं कि कोई भी अदालत जब इस तरह के आपराधिक मामले की सुनवाई करती है, तो वह सबसे पहले 'मेंस रिया' यानी आरोपी व्यक्ति की आपराधिक नीयत (क्रिमिनल इंटेंट) पर सबसे पैनी और बारीक नजर रखती है। राहुल सिंह के विश्लेषण के अनुसार, जंतर-मंतर की हिंसक घटना के जो ढेरों वीडियो फुटेज सामने आए हैं, उनमें अगर यह बात शीशे की तरह साफ दिखाई दे रही है कि जैसे ही भारी भीड़ से घिरे एक पुलिसकर्मी ने अपनी जान बचाने के लिए घबराकर अपनी जेब से अपना आई-कार्ड निकाला, भीड़ ने उसे मारना-पीटना तुरंत बंद कर दिया और बिना कोई नुकसान पहुंचाए खुद ही पीछे हट गई। सिंह का मानना है कि यही एक वीडियो फुटेज अदालत के भीतर आम जनता को सजा से बचाने का सबसे बड़ा और अभेद्य सबूत बनेगा। यह कृत्य इस बात का एकदम प्रत्यक्ष और अकाट्य प्रमाण है कि आम जनता या छात्रों का किसी पुलिस बल पर हमला करने का कोई भी पूर्व नियोजित इरादा नहीं था, बल्कि वे केवल उस वक्त खुद को कुछ अज्ञात और हिंसक हमलावरों से बचाने का प्रयास कर रहे थे। आई-कार्ड देखते ही उस सादे कपड़ों वाले पुलिसकर्मी को एकदम सुरक्षित छोड़ देना यह पूरी तरह साबित करता है कि उनका इरादा कानून अपने हाथ में लेना नहीं था, बल्कि वह विशुद्ध रूप से अपनी जान बचाने के लिए उठाया गया आत्मरक्षा का एक स्वाभाविक कदम था।

## सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग की कड़ी गाइडलाइंस की अनदेखी

जंतर-मंतर की इस पूरी घटना ने एक बार फिर देश में अटके पड़े पुलिस सुधारों और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा भीड़ नियंत्रण के अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह पूरा मामला सीधे तौर पर भारत के सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा समय-समय पर जारी किए गए सख्त निर्देशों और गाइडलाइंस की ओर इशारा करता है, जिनकी इस मामले में कथित तौर पर धज्जियां उड़ाई गईं। इन दोनों ही सर्वोच्च संस्थाओं ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि पुलिस की कोई भी कार्रवाई पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए और नागरिकों पर किया जाने वाला बल प्रयोग हमेशा आनुपातिक और अंतिम विकल्प होना चाहिए। जब सादी वर्दी में खुफिया जानकारी जुटाने के लिए भेजे गए जवान ही अचानक अपने हाथों में लाठियां लेकर शांतिपूर्ण भीड़ पर टूट पड़ें, तो यह न केवल देश की शीर्ष अदालतों की गाइडलाइंस का सीधा उल्लंघन है, बल्कि यह कदम स्थिति को शांत करने के बजाय एक भयंकर अराजकता और अविश्वास के माहौल में धकेलने का काम करता है। कानून के वरिष्ठ जानकारों का साफ मानना है कि इन संवैधानिक दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना ही एकमात्र ऐसा रास्ता है, जो यह सुनिश्चित कर सकता है कि भविष्य में आम नागरिकों के आत्मरक्षा के अधिकारों और पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी के बीच ऐसा खतरनाक और हिंसक टकराव दोबारा कभी न हो।

## इसका आप पर असर
- **संपूर्ण भारत में:** यदि आप किसी भी विरोध प्रदर्शन में शामिल होते हैं और अचानक सादे कपड़ों में कोई अज्ञात व्यक्ति आप पर हमला करता है, तो बिना आईडी देखे आप आत्मरक्षा के अधिकार का उपयोग कर सकते हैं।
- **दिल्ली में:** जंतर-मंतर जैसे क्षेत्रों में होने वाले आगामी प्रदर्शनों में शामिल होने वाले लोगों और छात्रों को पुलिस की 'प्लेन क्लोज' कार्यप्रणाली को लेकर अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता होगी।

## सवाल-जवाब

### 1. जंतर-मंतर पर सोमवार को क्या हुआ था?
नीट पेपर मामले को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान सादी वर्दी में तैनात पुलिसकर्मियों ने लाठीचार्ज किया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने आत्मरक्षा में उन पर पलटवार किया।

### 2. दिल्ली में यह विरोध प्रदर्शन किसने आयोजित किया था?
यह विशाल प्रदर्शन पर्यावरणवादी सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।

### 3. क्या आम जनता को पुलिस के खिलाफ आत्मरक्षा का अधिकार है?
बीएनएस की धारा 37 के अनुसार, यदि कोई पुलिसकर्मी बिना आईडी कार्ड दिखाए सादे कपड़ों में अचानक हमला करता है, तो आम नागरिक अपनी रक्षा के लिए बल प्रयोग कर सकता है।

### 4. आईडी कार्ड देखने के बाद हमला रोक देने का कानूनी मतलब क्या है?
अदालती कार्यवाही में यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत माना जाता है कि जनता की नीयत पुलिस पर हमला करने की नहीं थी, बल्कि वे केवल खुद को अज्ञात हमलावरों से बचा रहे थे।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._