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  "title": "क्या लगातार तनाव पुलिस को पहुंचा रहा है टूटने की कगार पर? बेगूसराय के मनोवैज्ञानिक ने बताया असली इलाज",
  "summary": "बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर शंकर का कहना है कि लगातार दबाव और नींद की कमी पुलिसकर्मियों का मानसिक संतुलन बिगाड़ देती है, और इसका हल नियमित जांच, काउंसलिंग और स्ट्रेस मैनेजमेंट है।",
  "content": "बिहार में भरत तिवारी नाम के युवक के एनकाउंटर ने एक बार फिर पूरी पुलिस व्यवस्था को कठघरे में ला खड़ा किया है। कुछ लोग एनकाउंटर के जरिए न्याय करने के इस तरीके पर सवाल उठा रहे हैं, तो कुछ इसे सामाजिक और राजनीतिक नजरिए से भी देख रहे हैं। इस युवक की मौत में पुलिसकर्मी की भूमिका से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, और इसी के साथ यह बहस फिर गरमा गई कि आखिर ऐसी पुलिस, ऐसे सिस्टम और ऐसे पुलिसकर्मियों का इलाज क्या है।\n\nफेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसी साइट्स पर इन दिनों सबसे ज्यादा पुलिसकर्मियों के दुर्व्यवहार के वीडियो ही देखने को मिलते हैं। इनमें से कई वीडियो तो इतने परेशान करने वाले होते हैं कि देखने वाले को विचलित कर देते हैं। एक के बाद एक ऐसे मामले सामने आने के बाद इस सवाल का जवाब ढूंढना जरूरी हो गया है। इसी पर बेगूसराय के चर्चित मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर शंकर ने कुछ अहम बातें रखीं। आर शंकर ने 150 देशों में मनोविज्ञान पर व्याख्यान दिए हैं, इस क्षेत्र में लंबा काम किया है और इसी विषय पर एक किताब भी लिख चुके हैं।\n\n21वीं सदी में सबसे ज्यादा दबाव झेलता विभाग\nआर शंकर का कहना है कि आज की 21वीं सदी में पुलिस उन विभागों में से एक है जो सबसे ज्यादा दबाव में काम करते हैं। समाज में जहां कहीं भी कोई समस्या खड़ी होती है, सबसे पहले पुलिस को ही वहां भेजा जाता है। लेकिन यह भूल जाना गलत है कि पुलिसकर्मी भी आम इंसान ही हैं। उनका भी परिवार है, बच्चे हैं और अपना एक सामाजिक जीवन है। लगातार बने रहने वाले तनाव के कारण कई बार इंसान पल भर में ऐसा फैसला कर बैठता है, जिसका उसे बाद में पछतावा होता है।\n\nउनके मुताबिक पुलिसकर्मियों को समय पर छुट्टी तक नहीं मिल पाती। परिवार के साथ पर्याप्त समय न बिता पाने और पारिवारिक जुड़ाव कमजोर होने से उनका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसके अलावा लगातार ड्यूटी की वजह से उन्हें पूरी नींद भी नसीब नहीं होती। आर शंकर कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति ठीक से नहीं सोता, तो अगले दिन उसके मस्तिष्क की कार्यक्षमता काफी घट जाती है। ऐसी हालत में उसकी याददाश्त, फैसले लेने की क्षमता और व्यवहार, तीनों पर असर पड़ सकता है।\n\nमानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच क्यों जरूरी है\nआर शंकर का मानना है कि सबसे पहली जरूरत यह है कि पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच हो। वे कहते हैं कि मस्तिष्क प्रकृति की सबसे जटिल और उन्नत रचना है, फिर भी अब तक इसे पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। यही वजह है कि कई पुलिसकर्मी तनाव, फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन जैसी दिक्कतों से जूझते हैं।\n\nफ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन को अलग-अलग स्थिति बताते हुए उन्होंने समझाया कि जब किसी व्यक्ति की उम्मीदों और हकीकत के बीच बड़ा फासला आ जाता है, तो उसमें फ्रस्ट्रेशन पैदा होता है। वहीं डिप्रेशन में पहुंचा व्यक्ति उदास रहने लगता है, उसकी नींद और भूख गड़बड़ा जाती है, और उसे सही फैसले लेने तथा सामान्य ढंग से पेश आने में मुश्किल होने लगती है।\n\nपहचान कर काउंसलिंग की हो व्यवस्था\nआर शंकर के मुताबिक ऐसे पुलिसकर्मियों की पहचान कर उनकी काउंसलिंग कराई जानी चाहिए। उनका मानना है कि पुलिस व्यवस्था में तनाव प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक असरदार ढांचा खड़ा करने की जरूरत है। वे साफ करते हैं कि सिर्फ योग कर लेना या दौड़ लगा लेना ही स्ट्रेस मैनेजमेंट नहीं है। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि तनाव असल में है क्या, मस्तिष्क पर उसका असर कैसे पड़ता है, और हर व्यक्ति के हिसाब से उसका समाधान कैसे निकाला जाए।\n\nपश्चिमी देशों की तरह भारत में भी हो ठोस इंतजाम\nउन्होंने यह भी बताया कि कई पश्चिमी देशों में मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच, काउंसलिंग और स्ट्रेस मैनेजमेंट की व्यवस्था पहले से मौजूद है। भारत में भी ऐसी व्यवस्था को और ज्यादा प्रभावी बनाने की जरूरत है। पुलिसकर्मियों को समय पर छुट्टी, पर्याप्त आराम, पूरी नींद, परिवार के साथ वक्त और नियमित मानसिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण मिलना चाहिए। आर शंकर का कहना है कि अगर ऐसा ढांचा खड़ा कर लिया जाए, तो पुलिस व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा बेहतर और असरदार बन सकती है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: अगर पुलिस में नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच और काउंसलिंग की व्यवस्था बनती है, तो आम नागरिकों को कम तनावग्रस्त और ज्यादा संतुलित व्यवहार वाले पुलिसकर्मियों से सामना करना पड़ेगा, जिससे थानों में लोगों का अनुभव बेहतर हो सकता है।\n• बेगूसराय/बिहार में: यहां की पुलिस व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच यह चर्चा स्थानीय थानों में तैनात कर्मियों के काम के दबाव और छुट्टी जैसे मुद्दों को सामने लाती है, जो सीधे जिले के लोगों के साथ पुलिस के बर्ताव को प्रभावित करते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भरत तिवारी मामला क्या है?\nबिहार में भरत तिवारी नाम के युवक के एनकाउंटर ने पुलिस व्यवस्था और इस तरह न्याय करने के तरीके पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।\n\n2. इस मामले में मनोवैज्ञानिक की राय क्यों ली गई?\nलगातार पुलिस दुर्व्यवहार के मामले सामने आने के बाद यह सवाल उठा कि ऐसी व्यवस्था का इलाज क्या है, और इसी पर बेगूसराय के मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर शंकर ने अपनी राय दी।\n\n3. आर शंकर के मुताबिक पुलिस के गलत फैसलों की बड़ी वजह क्या है?\nउनके अनुसार लगातार तनाव, समय पर छुट्टी न मिलना, परिवार से कम जुड़ाव और पूरी नींद न मिलना मिलकर पुलिसकर्मियों का मानसिक संतुलन बिगाड़ देते हैं।\n\n4. फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन में क्या फर्क बताया गया?\nफ्रस्ट्रेशन तब पैदा होता है जब उम्मीदों और हकीकत के बीच बड़ा फासला आ जाता है, जबकि डिप्रेशन में व्यक्ति उदास रहता है और उसकी नींद, भूख तथा फैसले लेने की क्षमता प्रभावित होती है।\n\n5. आर शंकर ने समाधान के तौर पर क्या सुझाव दिए?\nउन्होंने पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच, पहचान कर काउंसलिंग, और एक असरदार स्ट्रेस मैनेजमेंट व्यवस्था बनाने की बात कही।\n\n6. क्या योग और दौड़ को ही स्ट्रेस मैनेजमेंट माना जा सकता है?\nनहीं, उनके मुताबिक सिर्फ योग या दौड़ काफी नहीं है; यह समझना जरूरी है कि तनाव क्या है, मस्तिष्क पर उसका असर कैसे होता है और हर व्यक्ति के हिसाब से उसका हल कैसे निकले।\n\n7. आर शंकर कौन हैं?\nवे बेगूसराय के चर्चित मनोवैज्ञानिक हैं, जिन्होंने 150 देशों में मनोविज्ञान पर व्याख्यान दिए हैं और इसी विषय पर एक किताब भी लिखी है।",
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  "category": "बिहार",
  "publishedAt": "2026-06-25",
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    "पुलिस मानसिक स्वास्थ्य",
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