# लखीमपुर खीरी समेत ग्रामीण इलाकों में बढ़ा थनैला रोग का जोखिम, पशुपालक इन उपायों से बचाएं दूध का उत्पादन

> बरसात और बदलते मौसम में दुधारू मवेशियों में मास्टाइटिस यानी थनैला रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है, जिससे दूध उत्पादन में 100 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। सही पशुशाला प्रबंधन और बचाव के उपायों से पशुपालक अपने मवेशियों को इस गंभीर बीमारी से सुरक्षित रख सकते हैं।

**Type:** article · **Category:** बिहार · **Published:** 2026-08-16 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bihar/lakhimpur-kheri-sameta-gramina-ilakon-men-barha-thanaila-roga-ka-jokhima-pashupalaka-ina-upayon-se-bachaen-dudha-ka-utpadana-17171 · **Language:** Hindi
**Tags:** थनैला रोग, मास्टाइटिस, पशुपालन, लखीमपुर खीरी, दूध उत्पादन, पशु स्वास्थ्य

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और उसके आसपास के तमाम ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में किसान दुधारू पशुओं का पालन पोषण करते हैं। खेती के साथ-साथ पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की अतिरिक्त आय का एक बेहद मजबूत और महत्वपूर्ण जरिया है। हालांकि, मानसून की बारिश और बदलते मौसम के दौरान मवेशियों में विभिन्न प्रकार की बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इन दिनों पशुपालकों के लिए सबसे गंभीर और चिंताजनक समस्या थनैला रोग यानी मास्टाइटिस बनकर सामने आ रही है। यह बीमारी दुधारू गायों और भैंसों के स्वास्थ्य के साथ-साथ दूध के कुल उत्पादन और उसकी गुणवत्ता पर सीधा और प्रतिकूल असर डालती है।

## थनैला रोग के शुरुआती लक्षण और दूध उत्पादन पर असर
थनैला रोग मुख्य रूप से मवेशियों के थन और अयन में होने वाला एक गंभीर संक्रमण है। जब यह बीमारी पशु को अपनी चपेट में लेती है, तो थन की एक या एक से अधिक गांठों में अचानक सूजन आने लगती है। प्रभावित हिस्सा असामान्य रूप से गर्म हो जाता है और उसमें अत्यधिक दर्द होने लगता है। इसके कारण दूध निकालते समय पशु काफी परेशानी महसूस करता है। थन में तेज दर्द होने की वजह से कई बार पशु दूध दुहने के दौरान पैर मारने की कोशिश करता है और ग्वाले को पास नहीं आने देता। इसके साथ ही दूध के स्वाभाविक रूप में भी बड़ा बदलाव आ जाता है।

इस बीमारी के कारण दूध का रंग बदल सकता है, वह पतला हो सकता है या उसमें थक्के नजर आने लगते हैं। यदि शुरुआती स्टेज में ही बीमारी के लक्षणों की पहचान कर तुरंत उपचार शुरू न कराया जाए, तो पशु की दूध देने की कुल क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है। थनैला रोग से पीड़ित पशु के दूध उत्पादन में 50 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक की भारी और सीधी कमी आ सकती है। गंभीर संक्रमण की स्थिति में पशु को ठीक होने में लंबा समय लगता है और पशुपालक को दवाइयों तथा डॉक्टर की सलाह पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।

## संक्रमण फैलने की मुख्य वजहें और जोखिम भरे कारक
थनैला मुख्य रूप से एक जीवाणु जनित यानी बैक्टीरिया से होने वाला रोग है। यह संक्रमण थन की नलिका के रास्ते पशु के शरीर के भीतर प्रवेश करता है। वर्षा ऋतु के दौरान पशुशालाओं और बाड़ों में जलजमाव, कीचड़ और अत्यधिक नमी के कारण तरह-तरह के बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीव बहुत तेजी से पनपने लगते हैं। इसके अलावा जिन बाड़ों में ताजी हवा और सूर्य की रोशनी की कमी होती है, वहां संक्रमण फैलने का जोखिम कई गुना अधिक हो जाता है।

गंदा फर्श, दूषित पानी, दूध दुहने वाले व्यक्ति के अस्वच्छ हाथ और दूध निकालने के उपकरणों की साफ-सफाई न होना भी इस बीमारी को बढ़ावा देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दूध निकालने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद थन के सुराख लगभग 30 से 40 मिनट तक खुले रहते हैं। दूध दुहने के तुरंत बाद यदि पशु किसी गंदी, गीली या कीचड़ वाली जगह पर बैठ जाता है, तो जमीन पर मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया सीधे खुले सुराख के रास्ते अयन के अंदर पहुंच जाते हैं और मवेशी को संक्रमित कर देते हैं।

## बचाव के तरीके और पशुशाला प्रबंधन के उपाय
चिकित्सकों और विशेषज्ञों का मानना है कि थनैला रोग के उपचार पर निर्भर रहने से कहीं अधिक बेहतर इसका समय पर बचाव करना है। सही और सुनियोजित पशुशाला प्रबंधन ही इस बीमारी से बचाव का सबसे अचूक और कारगर रास्ता है। पशुपालकों को अपनी पशुशाला को हमेशा पूरी तरह साफ, सूखा और हवादार बनाए रखना चाहिए। नमी और हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए बाड़े के फर्श पर नियमित रूप से चूने का छिड़काव करना बहुत जरूरी है।

दूध निकालने के तुरंत बाद पशु को कम से कम 40 मिनट तक बैठने से रोकना चाहिए। इसके लिए सबसे आसान तरीका यह है कि दूध दुहते ही मवेशी के आगे ताजा हरा चारा या दाना रख दिया जाए। जब तक पशु खड़ा होकर चारा खाएगा, तब तक उसके थन के खुले सुराख प्राकृतिक रूप से अपने आप बंद हो जाएंगे। दूध निकालने से पहले और बाद में थन की अच्छी तरह सफाई करना भी आवश्यक है। यदि पशु में सूजन या दर्द का कोई भी लक्षण दिखे, तो बिना देरी किए तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** बारिश के मौसम में थनैला रोग के प्रसार से पशुपालकों के दूध उत्पादन और आय पर बुरा असर पड़ सकता है।

**लखीमपुर खीरी में:** स्थानीय किसान बाड़े की सफाई, चूने के छिड़काव और दूध दुहने के बाद 40 मिनट तक पशु को खड़ा रखकर नुकसान से बच सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. थनैला (मास्टाइटिस) रोग क्या है और यह मवेशियों को कैसे प्रभावित करता है?
थनैला रोग बैक्टीरिया के कारण होने वाला अयन का संक्रमण है, जो थन में सूजन और दर्द पैदा करता है तथा दूध की मात्रा व गुणवत्ता घटा देता है।

### 2. थनैला रोग के मुख्य शुरुआती लक्षण क्या हैं?
इसके मुख्य लक्षणों में थन में सूजन, गर्माहट, असहनीय दर्द, दूध दुहने के दौरान पशु का पैर मारना और दूध के रंग या गाढ़ेपन में बदलाव शामिल हैं।

### 3. दूध निकालने के बाद पशु को 40 मिनट तक खड़ा रखना क्यों आवश्यक है?
दूध दुहने के बाद थन के छिद्र 30 से 40 मिनट तक खुले रहते हैं; खड़ा रहने पर जमीन के बैक्टीरिया खुले सुराख के रास्ते अंदर नहीं जा पाते।

### 4. थनैला बीमारी से पशु के दूध उत्पादन में कितनी कमी आ सकती है?
यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो प्रभावित पशु का दूध उत्पादन 50 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक घट सकता है।

### 5. पशुशाला में बैक्टीरिया और नमी को खत्म करने के लिए क्या उपाय करना चाहिए?
बाड़े को पूरी तरह साफ, सूखा और हवादार रखें तथा नमी व बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए फर्श पर नियमित चूने का छिड़काव करें।

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