# लखीमपुर में मौसम के उतार-चढ़ाव से मवेशी बीमार, पशु चिकित्सा विभाग ने जारी की विशेष एडवाइजरी

> लखीमपुर में अचानक बदलते मौसम के कारण मवेशियों में बुखार और हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ गया है, जिससे पशु चिकित्सा विभाग ने पशुपालकों को विशेष सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं।

**Type:** article · **Category:** बिहार · **Published:** 2026-09-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bihar/lakhimpur-men-mausama-ke-utara-charhava-se-maveshi-bimara-pashu-chikitsa-vibhaga-ne-jari-ki-vishesha-edavaijari-33202 · **Language:** Hindi
**Tags:** लखीमपुर, पशुपालन, मौसम में बदलाव, पशु स्वास्थ्य, हीट स्ट्रेस, मवेशी रोग

लखीमपुर जिले में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का क्षेत्र स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। बदलते दौर में लगातार बढ़ती खेती की लागत और मानसून व मौसम की अनिश्चितताओं के कारण फसलों से होने वाली आय अस्थिर हो गई है। ऐसे में बड़ी संख्या में सीमांत और बड़े किसान अतिरिक्त और नियमित आमदनी के लिए दुग्ध उत्पादन और पशुपालन को एक भरोसेमंद जरिया मान रहे हैं। पशुपालन से होने वाली दैनिक आय किसानों को आर्थिक रूप से संबल प्रदान करती है। लेकिन बदलते मौसम के इस दौर में पशुओं की उचित देखभाल करना पशुपालकों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वर्तमान में लखीमपुर जिले के मौसम के मिजाज में लगातार अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिल रहा है, जो पशुओं के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर रहा है।

सुबह के समय वायुमंडल में अत्यधिक नमी और ठंडी हवाएं चलती हैं, जिससे वातावरण में ठंडक का अहसास होता है। इसके तुरंत बाद दोपहर में तेज और तीखी धूप निकल आती है, जिससे तापमान में अचानक भारी वृद्धि दर्ज की जाती है। इस विषम परिस्थिति के बीच जिले के कई हिस्सों में अचानक तेज बारिश भी हो रही है। मौसम में आ रहे इस अचानक और अनियंत्रित उतार-चढ़ाव का सीधा असर न केवल मनुष्यों पर बल्कि मूक पशुओं के स्वास्थ्य पर भी अत्यंत प्रतिकूल रूप से पड़ रहा है। सुबह की अत्यधिक नमी, दोपहर की झुलसाने वाली धूप और फिर अचानक होने वाली बारिश के इस चक्र के कारण पशुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है, जिससे वे बीमारियों की चपेट में आसानी से आ जाते हैं।

## बुखार और सुस्ती के लक्षणों पर रखें पैनी नजर
इस नाजुक परिस्थिति को देखते हुए राजकीय पशु चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ. हेमंत सिंह ने जिले के समस्त पशुपालकों को अत्यधिक सावधानी और सतर्कता बरतने की सलाह दी है। डॉ. हेमंत सिंह ने विस्तृत रूप से बताया कि इस समय मौसम में जिस तेजी से बदलाव हो रहा है, वह पशुओं के शरीर के जैविक संतुलन को बिगाड़ देता है। सुबह की ठंडक और दोपहर की गर्मी के इस दोहरे प्रभाव से पशुओं में संक्रमण और बुखार की समस्या सबसे अधिक देखी जा रही है। पशुपालकों को अपने मवेशियों की दिनचर्या और उनके व्यवहार पर लगातार और पैनी नजर रखनी होगी।

यदि किसी मवेशी के शरीर का तापमान बढ़ा हुआ महसूस हो, वह सामान्य दिनों की अपेक्षा काफी सुस्त दिखाई दे, या फिर वह अचानक से चारा खाना कम कर दे और पानी पीने में भी रुचि न दिखाए, तो इसे एक गंभीर चेतावनी संकेत माना जाना चाहिए। अक्सर पशुपालक इन शुरुआती लक्षणों को सामान्य मौसमी आलस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे पशु की स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है। इसके अतिरिक्त, यदि पशु के व्यवहार में कोई अचानक बदलाव आता है, जैसे कि वह झुंड से अलग रहने लगे, चारा खाने के प्रति बिल्कुल भी रुचि न दिखाए या लगातार एक ही स्थान पर सुस्त होकर बैठा रहे, तो पशुपालक को बिना किसी देरी के तुरंत स्थानीय सरकारी पशु चिकित्सालय से संपर्क कर डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।

## दोपहर की तेज धूप से मवेशियों का बचाव अनिवार्य
पशु चिकित्सक डॉ. हेमंत सिंह ने पशुओं को दोपहर के समय होने वाली तेज और चुभती धूप से बचाने की विशेष आवश्यकता पर बल दिया है। हालांकि सुबह के समय ठंडक महसूस होती है, लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, धूप की तीव्रता और तापमान दोनों ही खतरनाक स्तर तक बढ़ जाते हैं। ऐसे संवेदनशील समय में पशुओं को खुले मैदान या बिना छाया वाले स्थानों पर लगातार धूप में बांधकर रखना उनके स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक और जानलेवा साबित हो सकता है।

डॉ. हेमंत सिंह ने विस्तार से समझाया कि लगातार तेज धूप और अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहने से पशुओं में हीट स्ट्रेस यानी गर्मी जनित तनाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जब कोई पशु हीट स्ट्रेस की चपेट में आता है, तो वह अत्यंत बेचैन हो जाता है, उसकी धड़कनें तेज हो जाती हैं और वह तेजी से हांफने लगता है। इस स्थिति में पशु के मुंह से अत्यधिक लार भी बहने लगती है। यदि इस स्थिति में पशुपालक द्वारा तुरंत ध्यान न दिया जाए और पशु को छायादार व ठंडी जगह पर न ले जाया जाए, तो मवेशी की हालत बेहद गंभीर हो सकती है जो अंततः उसके लिए प्राणघातक भी साबित हो सकती है।

## शुद्ध पेयजल, स्वच्छता और पोषक चारे का प्रबंधन
इस बदलते और अनिश्चित मौसम में पशुओं के शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए शुद्ध और पर्याप्त मात्रा में पानी पिलाना सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण आवश्यकता है। डॉ. हेमंत सिंह ने पशुपालकों को विशेष रूप से निर्देशित किया है कि वे इस संक्रमण काल के दौरान मवेशियों को दिन में कम से कम दो से तीन बार साफ, ताजा और शीतल पेयजल अवश्य उपलब्ध कराएं। विशेष रूप से दोपहर की गर्मी के दौरान पानी की उपलब्धता में किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।

इसके साथ ही, पशुओं के रहने वाले स्थान यानी पशुशाला की साफ-सफाई और वहां की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना अनिवार्य है। वर्षा के कारण पशुशाला में होने वाली कीचड़ और नमी को तुरंत साफ करना चाहिए, क्योंकि गीले फर्श पर खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपते हैं जो पशुओं के खुरों और त्वचा में संक्रमण फैला सकते हैं। इसके अतिरिक्त, पशुओं को दिए जाने वाले चारे की गुणवत्ता पर भी कड़ा नियंत्रण होना चाहिए। बारिश के पानी से भीगा हुआ, पुराना या फफूंद लगा हुआ चारा खिलाने से मवेशियों के पेट में गंभीर टॉक्सिक इंफेक्शन यानी विषाक्तता हो सकती है, जिससे वे गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं। इसलिए हमेशा सूखे, साफ और सुरक्षित स्थान पर रखे गए चारे का ही उपयोग करें।

## इसका आप पर असर
मौसम के इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर पशुपालकों की दैनिक आय और उनके मवेशियों के जीवन पर पड़ता है।

- **पशुपालकों के लिए:** बदलते मौसम में मवेशियों के बीमार होने से उनकी दूध उत्पादन क्षमता काफी कम हो सकती है। इसके कारण डेयरी व्यवसाय से जुड़े परिवारों को सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
- **स्वास्थ्य और उपचार:** पशुओं में बुखार या हीट स्ट्रेस के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने से बीमारी जानलेवा बन सकती है। डॉक्टर से समय पर परामर्श न लेने पर इलाज का खर्च और पशु हानि का जोखिम काफी बढ़ जाएगा।
- **चारे का प्रबंधन:** मवेशियों को नमी युक्त या फफूंद लगा हुआ चारा खिलाने से पेट में गंभीर संक्रमण हो सकता है। सुरक्षित और सूखे चारे का उपयोग करके आप अपने पशुओं को गंभीर बीमारियों से बचा सकते हैं।
- **लखीमपुर में:** लखीमपुर क्षेत्र के किसानों के लिए पशुपालन आजीविका का मुख्य सहारा है। यहाँ के पशुपालकों को अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए स्थानीय सरकारी अस्पतालों से संपर्क में रहना होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
मवेशियों में अचानक स्वास्थ्य संकट बढ़ने का मुख्य कारण वातावरण में तेजी से होने वाला तापमान परिवर्तन और अनुचित रख-रखाव है। दिन और रात के तापमान में भारी अंतर होने से पशुओं का शरीर बाहरी वातावरण के अनुकूल सामंजस्य नहीं बिठा पाता है। इसके चलते उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और वे संक्रमण के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।

- **तापमान का उतार-चढ़ाव:** सुबह के समय अत्यधिक ठंड और नमी के बाद दोपहर में अचानक तेज धूप निकल रही है। तापमान के इस तीव्र बदलाव के कारण मवेशियों की शारीरिक प्रणाली प्रभावित होती है और वे मौसमी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।
- **सीधी धूप और हीट स्ट्रेस:** दोपहर के समय मवेशियों को बिना किसी छायादार आश्रय के खुले में बांधा जा रहा है। अत्यधिक गर्मी और सीधी धूप के संपर्क में रहने से मवेशियों का शरीर खुद को ठंडा रखने में विफल हो जाता है, जिससे वे हीट स्ट्रेस के शिकार हो जाते हैं।
- **चारे में नमी और दूषण:** अप्रत्याशित बारिश के कारण पशुओं का चारा भीग जाता है और उसमें फंगस लग जाती है। ऐसा दूषित चारा खाने से पशुओं के पाचन तंत्र में गंभीर जीवाणु संक्रमण फैल जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. लखीमपुर में बदलते मौसम का पशुओं पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
बदलते मौसम के कारण मवेशियों में बुखार और हीट स्ट्रेस (गर्मी का तनाव) जैसी स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

### 2. पशुओं में बुखार होने के मुख्य लक्षण क्या हैं?
मवेशियों के शरीर का तापमान बढ़ना, सुस्त होना, चारा कम खाना और पानी कम पीना बुखार के प्रमुख लक्षण हैं।

### 3. हीट स्ट्रेस (गर्मी का तनाव) होने पर पशु क्या लक्षण दिखाते हैं?
हीट स्ट्रेस की चपेट में आने पर पशु अत्यधिक बेचैन हो जाता है और तेजी से हांफने लगता है।

### 4. बदलते मौसम में मवेशियों को पानी कितनी बार पिलाना चाहिए?
पशुपालकों को अपने मवेशियों को दिन में कम से कम दो से तीन बार पर्याप्त साफ और ताजा पानी पिलाना चाहिए।

### 5. बारिश के भीगे चारे से पशुओं को क्या नुकसान हो सकता है?
भीगे हुए या फफूंद लगे चारे को खाने से पशुओं के पेट में गंभीर संक्रमण और पाचन संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।

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